प्यारे नबी के प्यारे साथी
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प्यारे नबी (सल्ल) ने अपने साथियों को निरा सूफ़ी और दरवेश नहीं बनाया, इन्हें राहिबों और जोगियों के साँचे में नहीं ढाला, जो समाज और समाजी ज़िन्दगी से भागकर ग़ारों और खोहों में पनाह ले लेते हैं। बल्कि उन्हें जरी और बेबाक, बाशुऊर और बसीरतमंद, ख़ुद्दार और ग़य्यूर, ज़हीन और होशियार, एक्टिव और मुतहर्रिक और तेज़ चलनेवाला बनाया। ऐसा भी नहीं था कि इन्हें सिर्फ़ दुनिया को फ़तह करने और हुक्मरानी करने के लिये तैयार किया गया था। बल्कि इन्हें इसलिये तैयार किया गया था कि ये लोग ख़ुद भी ख़ुदा से डरने वाले हों और अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की मर्ज़ी को पूरा करने की कोशिश भी करें। इसीलिये ये दिनों के ग़ाज़ी भी थे और रातों के नमाज़ी भी। मज़लूमों की हिमायत करने का हौसला भी रखते थे और ज़ालिमों का हाथ पकड़ने की जुरअत भी। हक़ के साथियों के लिये इन्तिहाई नर्म-व-शफ़ीक़ थे तो हक़ के मुख़ालिफ़ों के लिये आहिनी दीवार भी।