Pyarey Nabi k Pyarey Sathi

Pyarey Nabi k Pyarey Sathi

प्यारे नबी के प्यारे साथी

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प्यारे नबी (सल्ल) ने अपने साथियों को निरा सूफ़ी और दरवेश नहीं बनाया, इन्हें राहिबों और जोगियों के साँचे में नहीं ढाला, जो समाज और समाजी ज़िन्दगी से भागकर ग़ारों और खोहों में पनाह ले लेते हैं। बल्कि उन्हें जरी और बेबाक, बाशुऊर और बसीरतमंद, ख़ुद्दार और ग़य्यूर, ज़हीन और होशियार, एक्टिव और मुतहर्रिक और तेज़ चलनेवाला बनाया। ऐसा भी नहीं था कि इन्हें सिर्फ़ दुनिया को फ़तह करने और हुक्मरानी करने के लिये तैयार किया गया था। बल्कि इन्हें इसलिये तैयार किया गया था कि ये लोग ख़ुद भी ख़ुदा से डरने वाले हों और अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की मर्ज़ी को पूरा करने की कोशिश भी करें। इसीलिये ये दिनों के ग़ाज़ी भी थे और रातों के नमाज़ी भी। मज़लूमों की हिमायत करने का हौसला भी रखते थे और ज़ालिमों का हाथ पकड़ने की जुरअत भी। हक़ के साथियों के लिये इन्तिहाई नर्म-व-शफ़ीक़ थे तो हक़ के मुख़ालिफ़ों के लिये आहिनी दीवार भी।

The beloved Prophet ﷺ did not mold his companions into mere Sufis and ascetics,
Nor did he shape them into monks or mystics who flee from society and seek refuge in caves and secluded retreats.

Rather, he ﷺ nurtured them into individuals who were:

Bold and courageous,

Conscious and insightful,

Dignified and self-respecting,

Intelligent, alert, active, and dynamic.

It was not that they were prepared merely to conquer the world or rule over people,
But rather, they were trained to be God-fearing,
and to strive to establish the will of Allah on the earth.

That is why they were:

Warriors by day, and devout worshippers by night,

They dared to support the oppressed,
and the audacity to restrain the oppressor.

They were:

Extremely gentle and compassionate toward the allies of truth,

Yet as firm as iron walls against the enemies of truth.

پیارے نبی ﷺ نے اپنے صحابہ کرام کو محض صوفی اور درویش نہیں بنایا،
نہ ہی انہیں راہبوں اور جوگیوں کے سانچے میں ڈھالا
جو معاشرے اور سماجی زندگی سے کٹ کر غاروں اور کھوہوں میں پناہ لے لیتے ہیں۔

بلکہ آپ ﷺ نے انہیں:

جرأت مند اور بے باک،

باشعور اور بصیرت مند،

خوددار اور غیرت مند،

ذہین، ہوشیار، فعال اور متحرک انسان بنایا۔

ایسا بھی نہیں تھا کہ انہیں صرف دنیا کو فتح کرنے یا حکومت قائم کرنے کے لیے تیار کیا گیا ہو،
بلکہ انہیں اس لیے تیار کیا گیا تھا کہ وہ خود بھی اللہ سے ڈرنے والے ہوں
اور اللہ کی زمین پر اللہ کی مرضی کو نافذ کرنے کی سعی کرنے والے ہوں۔

اسی لیے وہ:

دن کے مجاہد (غازی) تھے اور رات کے نمازی،

مظلوموں کے مددگار تھے اور ظالموں کا ہاتھ روکنے والے۔

وہ:

حق والوں کے لیے نہایت نرم اور شفیق،

اور حق کے مخالفین کے لیے آہنی دیوار ثابت ہوتے تھے۔

Hindi

प्यारे नबी के प्यारे साथी

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प्यारे नबी (सल्ल) ने अपने साथियों को निरा सूफ़ी और दरवेश नहीं बनाया, इन्हें राहिबों और जोगियों के साँचे में नहीं ढाला, जो समाज और समाजी ज़िन्दगी से भागकर ग़ारों और खोहों में पनाह ले लेते हैं। बल्कि उन्हें जरी और बेबाक, बाशुऊर और बसीरतमंद, ख़ुद्दार और ग़य्यूर, ज़हीन और होशियार, एक्टिव और मुतहर्रिक और तेज़ चलनेवाला बनाया। ऐसा भी नहीं था कि इन्हें सिर्फ़ दुनिया को फ़तह करने और हुक्मरानी करने के लिये तैयार किया गया था। बल्कि इन्हें इसलिये तैयार किया गया था कि ये लोग ख़ुद भी ख़ुदा से डरने वाले हों और अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की मर्ज़ी को पूरा करने की कोशिश भी करें। इसीलिये ये दिनों के ग़ाज़ी भी थे और रातों के नमाज़ी भी। मज़लूमों की हिमायत करने का हौसला भी रखते थे और ज़ालिमों का हाथ पकड़ने की जुरअत भी। हक़ के साथियों के लिये इन्तिहाई नर्म-व-शफ़ीक़ थे तो हक़ के मुख़ालिफ़ों के लिये आहिनी दीवार भी।

The beloved Prophet ﷺ did not mold his companions into mere Sufis and ascetics,
Nor did he shape them into monks or mystics who flee from society and seek refuge in caves and secluded retreats.

Rather, he ﷺ nurtured them into individuals who were:

Bold and courageous,

Conscious and insightful,

Dignified and self-respecting,

Intelligent, alert, active, and dynamic.

It was not that they were prepared merely to conquer the world or rule over people,
But rather, they were trained to be God-fearing,
and to strive to establish the will of Allah on the earth.

That is why they were:

Warriors by day, and devout worshippers by night,

They dared to support the oppressed,
and the audacity to restrain the oppressor.

They were:

Extremely gentle and compassionate toward the allies of truth,

Yet as firm as iron walls against the enemies of truth.

پیارے نبی ﷺ نے اپنے صحابہ کرام کو محض صوفی اور درویش نہیں بنایا،
نہ ہی انہیں راہبوں اور جوگیوں کے سانچے میں ڈھالا
جو معاشرے اور سماجی زندگی سے کٹ کر غاروں اور کھوہوں میں پناہ لے لیتے ہیں۔

بلکہ آپ ﷺ نے انہیں:

جرأت مند اور بے باک،

باشعور اور بصیرت مند،

خوددار اور غیرت مند،

ذہین، ہوشیار، فعال اور متحرک انسان بنایا۔

ایسا بھی نہیں تھا کہ انہیں صرف دنیا کو فتح کرنے یا حکومت قائم کرنے کے لیے تیار کیا گیا ہو،
بلکہ انہیں اس لیے تیار کیا گیا تھا کہ وہ خود بھی اللہ سے ڈرنے والے ہوں
اور اللہ کی زمین پر اللہ کی مرضی کو نافذ کرنے کی سعی کرنے والے ہوں۔

اسی لیے وہ:

دن کے مجاہد (غازی) تھے اور رات کے نمازی،

مظلوموں کے مددگار تھے اور ظالموں کا ہاتھ روکنے والے۔

وہ:

حق والوں کے لیے نہایت نرم اور شفیق،

اور حق کے مخالفین کے لیے آہنی دیوار ثابت ہوتے تھے۔

प्यारे नबी के प्यारे साथी

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प्यारे नबी (सल्ल) ने अपने साथियों को निरा सूफ़ी और दरवेश नहीं बनाया, इन्हें राहिबों और जोगियों के साँचे में नहीं ढाला, जो समाज और समाजी ज़िन्दगी से भागकर ग़ारों और खोहों में पनाह ले लेते हैं। बल्कि उन्हें जरी और बेबाक, बाशुऊर और बसीरतमंद, ख़ुद्दार और ग़य्यूर, ज़हीन और होशियार, एक्टिव और मुतहर्रिक और तेज़ चलनेवाला बनाया। ऐसा भी नहीं था कि इन्हें सिर्फ़ दुनिया को फ़तह करने और हुक्मरानी करने के लिये तैयार किया गया था। बल्कि इन्हें इसलिये तैयार किया गया था कि ये लोग ख़ुद भी ख़ुदा से डरने वाले हों और अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की मर्ज़ी को पूरा करने की कोशिश भी करें। इसीलिये ये दिनों के ग़ाज़ी भी थे और रातों के नमाज़ी भी। मज़लूमों की हिमायत करने का हौसला भी रखते थे और ज़ालिमों का हाथ पकड़ने की जुरअत भी। हक़ के साथियों के लिये इन्तिहाई नर्म-व-शफ़ीक़ थे तो हक़ के मुख़ालिफ़ों के लिये आहिनी दीवार भी।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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