“मैं हूँ”
मैं हूँ का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपने होने का वो पॉज़िटिव सेन्स डेवेलप करता है, जिससे इन्सान न सिर्फ़ अपने-आपको बना, सँवार और उभार सकता है, बल्कि अपने-आपको ख़ुद अपने क़ाबिल और दुनिया के क़ाबिल भी बना सकता है।
जबकि “मैं ही हूँ” का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपने होने का वो नेगेटिव सेन्स डेवेलप करता है, जिससे इन्सान न सिर्फ़ दूसरों की नफ़ी (Negate) करता है, बल्कि अपने-आपको भी पूरी तरह से डुबो देता और बर्बाद कर लेता है।
“मैं बहुत अहम हूँ”
“मैं बहुत अहम हूँ” का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपनी अहमियत का वो पॉज़िटिव सेन्स डेवेलप करता है कि मुझे अपनी सारी तवज्जोह अपने ऊपर लगानी चाहिये। अपना तज़किया यानी अपने-आपको डेवेलप करना चाहिये। ये यक़ीन इन्सान को न सिर्फ़ शुक्र के जज़्बे से भर देता है, बल्कि बहुत कुछ कर जाने का हौसला भी पैदा करता है और नित नया कर गुज़रने का जुनून भी। इस यक़ीन के डेवेलप होने से इन्सान लोगों का सिर्फ़ हरदिल-अज़ीज़ ही नहीं बनता, बल्कि तरक़्क़ी की बहुत-सी मंज़िलें तय करता चला जाता है।
“मैं ही अहम हूँ”
इसके बरख़िलाफ़ “मैं ही अहम हूँ” का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपनी अहमियत का वो नेगेटिव सेन्स डेवलप करता है कि दूसरों को सारी तवज्जोह मेरे ही ऊपर लगानी चाहिये। ये सेन्स इन्सान को न सिर्फ़ अपने क़रीबी लोगों से हसद और नफ़रत के जज़्बे से भर देता है, बल्कि उसे मनफ़ियत (Negativity) का शिकार भी बना देता है। इस सेन्स के डेवलप होने से इन्सान दूसरों की नज़रों ही में नहीं गिरता, बल्कि ख़ुद अपनी ही नज़रों में भी गिरने लगता है और पस्तियों की अथाह गहराइयों में गिरता चला जाता है।
“मैं कर सकता हूँ”
“मैं कर सकता हूँ” का यक़ीन इन्सान के अन्दर कुछ कर गुज़रने का वो पॉज़िटिव कॉन्फ़िडेंस पैदा करता है, जिससे इन्सान के लिये बड़े से बड़ा काम भी आसान हो जाता है और टीम में रहकर नामुवाफ़िक़ हालात में भी कोऑपरेशन के साथ काम करने का लुत्फ़ उठा लेता है। इस यक़ीन के डेवेलप होने से न सिर्फ़ ये कि हर मुश्किल काम को अंजाम देने के लिये इन्सान के ज़ेहन में सोचने-समझने की सलाहियत पैदा होती है, बल्कि नए अंदाज़ से काम को अंजाम देने के ideas भी आने लगते हैं और इन्सान अपनी सोई हुई सलाहियतों को बेदार और नित नई सलाहियतों को परवान चढ़ाने लगता है।
“मैं ही कर सकता हूँ”
इसके बरख़िलाफ़ “मैं ही कर सकता हूँ” का यक़ीन इन्सान के अन्दर ‘ओवर कॉन्फ़िडेंस’ पैदा करता है, जिससे इन्सान अपने काम को महारत के साथ कर तो देता है मगर टीम में रहकर कोऑपरेशन के साथ काम करने के लुत्फ़ से महरूम ही रहता है। इस सेन्स के डेवेलप होने से इन्सान न सिर्फ़ घमण्ड का शिकार होकर टूट जाता है, बल्कि वो अपने ही पिंदार में क़ैद होकर रह जाता है, जिससे नए ideas आने बन्द हो जाते हैं और इन्सान ख़ुद ही अपनी तमाम तर सलाहियतों का गाला घोंटकर उन्हें फ़ना के घाट उतार देता है।
लिहाज़ा “मैं हूँ”, “मैं बहुत अहम हूँ” और “मैं कर सकता हूँ” ये वो पॉज़िटिव ख़ूबियाँ हैं जिनकी हक़ीक़त को समझकर इख़्तियार करने से न सिर्फ़ एक इन्सान की शख़्सियत परवान चढ़ती है बल्कि पूरे समाज को इन ख़ूबियों से फ़ायदा पहुँच सकता है।
इसके बरख़िलाफ़ “मैं ही हूँ”, “मैं ही अहम हूँ” और “मैं ही कर सकता हूँ” ये वो नेगेटिव ख़सलतें हैं जिनको जितना जल्द मुमकिन हो छोड़ देना चाहिये जिससे एक इन्सान ही नहीं बल्कि पूरे समाज को तबाह व बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।
याद रखिये अपने आपसे मुहब्बत करना हमें ज़िन्दगी में आगे बढ़ाता है और सिर्फ़ अपने ही आपसे मुहब्बत करना हमें दूसरों की नज़रों में इस क़द्र ज़लील करता है कि एक दिन हम ख़ुद ही अपनी नज़रों में ज़लील हो जाते हैं।