जिस तरह सूरज के ग़ुरूब होने की सूरत में अँधेरा छा जाता है और फिर उस अँधेरे को दूर करने के लिये हमें चाँद की ज़रूरत पेश आती है जो कि ख़ुद सूरज की रौशनी से ही रौशन रहता है। और जब चाँद की भी रौशनी न हो तो हम ख़ुद अपने दिये रौशन करते हैं जिनकी हैसियत वक़्ती और आरज़ी होती है। ज़रा सोचिये अगर सूरज दुनिया में मौजूद ही न हो तो दुनिया के अँधेरे को क्या किसी चराग़ से दूर किया जा सकता है? हरगिज़ नहीं। क्योंकि अगर सूरज ही न हो तो दुनिया में रौशनी का तसव्वुर ही न हो, न चाँद में रौशनी हो और न हमारे दियों में रौशनी मुमकिन हो।
उसी तरह हक़ीक़ी इल्म (Devine guidence) न होने की सूरत में दिल की दुनिया में अँधेरा छा जाता है, फिर उस अँधेरे को दूर करने के लिये उसी हक़ीक़ी इल्म की रौशनी से रौशन चिराग़ (रसूल की सीरत) की ज़रूरत पेश आती है। और जब वो रौशनी भी मुयस्सर न हो तो हम अपने-अपने महदूद इल्म के छोटे-छोटे दिये रौशन कर लेते हैं, जिनकी हैसियत वक़्ती और आरज़ी होती है।
ज़रा सोचिये कि अगर दुनिया में वो हक़ीक़ी इल्म (Devine guidance) ही मौजूद न हो या उसे हम यकसर नज़र-अन्दाज़ कर दें तो दिल की दुनिया के अँधेरे को क्या किसी चराग़ से दूर किया जा सकता है? हरगिज़ नहीं। क्योंकि अगर हक़ीक़ी इल्म (Devine guidance) ही मौजूद न हो तो रसूल की सीरत (चाँद) में भी रौशनी न हो और नतीजतन हमारे इल्मी क़ुमक़ुमें का टिमटिमाना भी मुमकिन न हो।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि जिस तरह सूरज की रौशनी से दुनिया रौशन रहती है उसी तरह दिल की दुनिया को भी हक़ीक़ी इल्म की रौशनी से मुनव्वर रखें ताकि सीरते-रसूल की रौशनी से भी भरपूर फ़ायदा उठाया जा सके और अपनी अक़्ल के क़ुमक़ुमों को भी रौशनी मुयस्सर आती रहे।
مَاۤ اٰتٰىکُمُ الرَّسُوۡلُ فَخُذُوۡہُ ٭ وَ مَا نَہٰىکُمۡ عَنۡہُ فَانۡتَہُوۡا
जो कुछ रसूल तुम्हें दे वो ले लो और जिस चीज़ से वो रोक दे उससे रुक जाओ। (क़ुरआन 59:7)