जिस तरह दीमक लकड़ी को खाकर मिट्टी में तब्दील कर देती है;
उसी तरह दिल में बुग़्ज़ और हसद वो दीमक है जो इन्सान की नेकियों को खाकर उसकी शख़्सियत को ख़ाक में तब्दील कर देती है,
लिहाज़ा जिस तरह लकड़ी को दीमक से बचाने के लिये एंटी-टर्माइट ट्रीटमेंट की ज़रूरत होती है, उसी तरह इन्सान की शख़्सियत को दीमक से बचाने के लिये दुनिया से बे-रग़बती जैसे एंटी मेट्रियलिस्टिक ट्रीटमेंट की ज़रूरत होती है।
जिस तरह (चिनबेरी या देवदार जैसी) कुछ लकड़ियाँ (जिनमें मेलियाटॉक्सिन नाम का कीटनाशक पाया जाता है) ऐसी भी हैं जिनको दीमक लगती ही नहीं है;
उसी तरह कुछ नेकियाँ (जिनमें इख़लास और लिल्लाहियत जैसा रिया-नाशक तत्व पाया जाता) ऐसी भी हैं जिनमें दीमक लगती ही नहीं है।
मालूम हुआ कि अगर हम कोई भी नेकी सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह के लिये और आख़िरत में बदले के हुसूल के लिये करें तो हमारी नेकियों में हसद और बुग़्ज़ जैसी किसी भी क़िस्म की दीमक लगेगी ही नहीं और अगर ख़ुदा न ख़ास्ता इस लिल्लाहियत में कमी हो जाए तो दुनिया से बे-रग़बती और बे-नियाज़ी जैसे एंटी-मेट्रियलिस्टिक ट्रीटमेंट के ज़रिए उस दीमक को फ़ौरन हटा देना चाहिये ताकि हमारी एक-एक नेकी दुनिया में नतीजा-ख़ेज़ी और आख़िरत में ख़ुदा की रज़ा के हुसूल के लिये मुकम्मल तौर पर महफ़ूज़ रह सके।