जिस तरह आग लकड़ी को जलाकर राख में तब्दील कर देती है;
उसी तरह ग़ुस्सा इन्सान की शख़्सियत को जलाकर राख बना देता है।
लिहाज़ा जिस तरह लकड़ी को आग से बचाने के लिये फ़्लेम रिटार्डेंट पेंट और कोटिंग्स (additives based on phosphorus or nitrogen compounds) की ज़रूरत होती है, उसी तरह ग़ुस्से की तबाहकारियों से बचाने के लिये इन्सान को सब्र और मामला-फ़हमी जैसे फ़्लेम रिटार्डेंट पेंट और कोटिंग्स की ज़रूरत होती है।
जिस तरह कभी-कभी लकड़ी में आग लगाने की सख़्त ज़रूरत पेश आती ही है ताकि उस आग से एनर्जी हासिल की जा सके और उससे कुछ पकाने और गलाने का काम लिया जा सके। (आग से ये काम उसी वक़्त तक लिया जा सकता है जिस वक़्त तक आग कण्ट्रोल में है);
उसी तरह कभी-कभी इन्सान को ग़ुस्सा आना भी ज़रूरी है, ताकि उससे एनर्जी हासिल की जा सके और बातिल को गलाने और ज़ेर करने का काम लिया जा सके। मगर ये काम भी उसी वक़्त तक लिया जा सकता है जब तक इन्सान के अन्दर ग़ुस्सा कण्ट्रोल हालत में है।
मालूम हुआ कि इन्सान को ग़ुस्सा आना एक फ़ितरी अमल है, मगर एक तो हमेशा नहीं आना चाहिये और दूसरे जब भी आए वो ज़रूरत के वक़्त आए और इस तरह आए कि उसे कण्ट्रोल किया जाता रहे ताकि उससे ज़ुल्म के ख़ात्मे जैसा कोई पॉज़िटिव काम लिया जा सके।