जिस तरह ज़मीन को कामयाब और बेहतरीन बनाने के लिए उसे झाड़-झंकाड़ से पाक किया जाता है, ये ज़मीन का तज़किया है।
जिस तरह एक बेहतरीन फ़सल उगाने के लिए उसे खरपतवार (ग़ैर-ज़रूरी घास) से पाक किया जाता है, ये फ़सल का तज़किया है।
जिस तरह पेड़ की नश्व-व-नुमा (बढ़ोतरी और विकास) के लिए उसमें काँट-छाँट की जाती है, ये पेड़ का तज़किया है।
जिस तरह किसी मशीन से बेहतर काम लेने के लिए उसकी सफ़ाई-सुथराई (Overhauling) की जाती है, ये मशीन का तज़किया है।
और जिस तरह माल में बढ़ोतरी करने के लिए ज़कात अदा की जाती है, ये माल का तज़किया है।
उसी तरह जिस्म से बेहतर काम लेने और उसको तन्दुरुस्त रखने के लिए रोज़े की शक्ल में ज़कात अदा की जाती है, ये जिस्म का तज़किया है।
प्यारे नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, “हर चीज़ की एक ज़कात है और जिस्म की ज़कात रोज़ा है।” (हदीस:इब्ने-माजा : 1745)
इसका मतलब ये हुआ कि जिस्म सिर्फ़ खाते-पीते रहने ही से तन्दुरुस्त और तवाना नहीं होता, बल्कि इसके लिए ज़रूरी है कि कभी-कभी इसको खाने-पीने से रोका जाए। इससे भी जिस्म तन्दुरुस्त और तवाना होगा।
ये हदीस उन लोगों के लिए लम्हाए-फ़िक्रिया है जो रमज़ान के महीने में क़िस्म-क़िस्म के पकवान खा-खा कर अपना वज़न बढ़ा लेते हैं लेकिन कोई ताक़त हासिल नहीं करते।
“कामयाब हो गया वो जिसने अपने नफ़्स का तज़किया किया
और नामुराद हो गया वो जिसने उसको दबा दिया।”
(सूरा-91 अश-शम्स, आयत-9,10)