ज़वाल की शिकार क़ौमें
— — —
हक़ीक़त ये है कि किसी नज़रिये और फ़िक्र पर वुजूद में आनेवाली क़ौमें अपने शुरूआती ज़माने में हिम्मत, मेहनत और जाँफ़िशानी से काम लेकर अपने लिये बुलन्द मक़ाम पैदा करती हैं और तरक़्क़ी की मंज़िलें तय करती हैं। फिर आने वाली नस्लें अपने असलाफ़ (पूर्वजों) के हासिल किये हुए बुलन्द मक़ामात से चिमटे रहने की कोशिश करती हैं, लेकिन चूँकि न वो हिम्मत और मेहनत होती है और न वो जाँफ़िशानी इसलिये वो मक़ाम ज़्यादा दिनों तक उनके पास बाक़ी नहीं रहता। धीरे-धीरे पस्ती का शिकार हो जाती हैं।
फिर उस बुलन्द मक़ाम की आरज़ू तो उन के दिलों में चुटकियाँ लेती रहती है लेकिन उन की पस्त हिम्मतें और टूटे हुए हौसले किसी क़ुरबानी के लिये उन्हें आमादा नहीं करते। अब वो इस फ़िराक़ में लग जाती हैं कि बुज़ुर्गों की अज़मत का ताज भी उन के सर पर रहे और उन्हें करना भी कुछ न पड़े। बल्कि कोई जादू या कोई रुक़िया (मन्त्र) ऐसा हाथ लग जाए जिसके ज़रिए वो अपना खोया हुआ मक़ाम हासिल करने में कामयाब हो जाएँ। लेकिन अफ़सोस! कि ख़ुदा की इस कायनात में न तो बुज़ुर्गों के गुणगान से खोया हुआ मक़ाम हासिल होता है और न ही जादू और मन्त्र-जाप से कोई क़ौम तरक़्क़ी हासिल करती है।