न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
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मतलब
इस शेर में ग़ालिब ने ख़ुदा की हस्ती के बारे में बताया कि उस हस्ती का वुजूद हमेशा से है। इस हमेशगी का इन्सान सिर्फ़ तसव्वुर ही कर सकता है कि जब कुछ नहीं था तब ख़ुदा की हस्ती का वुजूद था। फिर इस बात को भी समझ लेना चाहिये कि उस हस्ती का वुजूद कायनात के वुजूद का भी मोहताज नहीं था। अगर ये कायनात वुजूद में न आती तो भी ख़ुदा की हस्ती का वुजूद होता। ग़ालिब का इशारा इस तरफ़ है कि इन्सान इस बहस में न पड़े कि ख़ुदा की हस्ती कितनी पुरानी है या वो है या नहीं है, बल्कि उसके लिये बड़ा मसला ख़ुद के वुजूद को समझना है। और इन्सान के वुजूद की हक़ीक़त इस होने से ही जुड़ी हुई है। यानी इन्सान जब अपने आपको कोई बड़ी चीज़ समझ लेता है तो वो ख़ुद ही अपने वुजूद को ज़ीरो कर देता है लेकिन अगर वो अपने आपको बड़ी चीज़ न समझे बल्कि अपने-आपको न होने के बराबर समझे तो वो कायनात की अज़ीम हस्ती बन जाता है, बल्कि ख़ुदा का नुमाइन्दा और उसका हिस्सा बन जाता है।
इस शेर का एक दूसरा मतलब ये भी लिया गया है कि ख़ुदा तो हमेशा से था, हमेशा से है और हमेशा रहेगा। अब मसला मेरी हस्ती का है। चूँकि मैं एक शुऊर रखनेवाली हस्ती हूँ इसलिये ये “मैं” के शुऊर ने ही मुझे डुबो दिया यानी इस मैं के शुऊर ने मुझे इम्तिहान में डाल दिया, वगरना “मैं” न होता यानी एक शुऊर रखनेवाली हस्ती न होता तो कायनात में क्या फ़र्क़ पड़ता? कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।