जुमे के ख़ुत्बे में मौलाना तक़रीर फ़रमा रहे थे कि “मदारिस इस्लाम के क़िले हैं”
ये सुनकर एक साहब ने कहा कि “मदारिस मज़बूत क़िले तो हैं मगर इस्लाम के नहीं बल्कि अपने-अपने मसलकों और मकतबे-फ़िक्र के।”
अब तक तो मैं यही मानता था कि मिम्बर से जो बात कही जाती है वो सही ही होती होगी, मगर बात के इस टकराव ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया।
आप भी सोचिये ज़रा कि किसकी बात ज़्यादा सही है?
यहीं से सोचते-सोचते मेरा ज़ेहन यूनिवर्सिटीज़ की तरफ़ भी गया और ज़ेहन में सवाल कौंध गया कि “बेशक हमारी यूनिवर्सिटीज़ ने मुसलमानों को तो बहुत कुछ दिया है, इस्लाम को क्या दिया?”
क्या इस तरह का सवाल आपके ज़ेहन में भी आया है?
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