किसकी है ये ज़मीन?

किसकी है ये ज़मीन?

अंबियाई दावत को अंबियाई तरीक़े से पहुँचाने की ज़रूरत है।

हम मुसलमान चूँकि अंबियाई मिशन रखनेवाली एक उम्मत हैं। इस ऐतिबार से हमारी दावत भी अंबियाई होनी चाहिये और हमारा उस्लूब व लहजा भी और इसी के साथ मौक़ा व महल भी दुरुस्त होना चाहिये। (16:125)

क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि तमाम अंबिया की दावत ये थी कि “ऐ मेरी क़ौम के भाइयो! एक अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है।” (7:59, 65, 73, 85; 11:50, 61, 84; 29:16) इस पुकार में बात को देखिये कितनी सटीक और उस्लूब में कितनी नर्मी और लचक है।

अंबिया कहते थे कि “तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वो तो सिर्फ़ बन्दे हैं, जैसे तुम बन्दे हो। इनसे दुआएँ माँग देखो, ये तुम्हारी दुआओं का जवाब दें अगर इनके बारे में तुम्हारे ख़याल सही हैं।” (07:194) इस बात में देखेंगे तो मालूम होगा कि अपनी बात को दलील के उस्लूब में रखा गया है।

अंबिया कहते थे कि अल्लाह का फ़रमान है कि उसकी इबादत ही इन्सानों के लिये सीधा रास्ता है “मेरी ही बन्दगी करो, यही सीधा रास्ता है?” (36:61)

“अल्लाह मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी तो तुम उसकी बन्दगी करो। यही सीधी राह है।” (19:36) इस बात में महसूस किया जा सकता है कि ख़ैरख़ाही का जज़्बा उबल पड़ रहा है।

अंबिया की ये दावत इसलिये भी थी कि चूँकि तमाम इन्सान उसी एक ख़ुदा के बन्दे हैं लिहाज़ा उन्हें उसी की बन्दगी करनी चाहिये। यही वो तरीक़ा है जिसके ज़रिए इस दुनिया की ज़िन्दगी में अम्नो-सलामती क़ायम हो सकती है और आख़िरत में भी कामयाबी हासिल हो सकती है।

“ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो और आख़िरत के दिन के उम्मीदवार रहो, और ज़मीन में बिगाड़ फैलानेवाले बनकर ज़्यादतियाँ न करते फिरो।” (29:36)

यक़ीनन अंबिया की इस दावत पर उन लोगों को तकलीफ़ होती थी जो लोगों से अपनी बन्दगी कराते थे। वो इस दावत पर जल-भुन जाते थे और अंबिया को हर तरह से इस दावत से रोकने की कोशिश करते थे। वो कहते थे कि ये मुल्क हमारा है लिहाज़ा बन्दगी हमारी करो। क़ुरआन कहता है कि

“एक दिन फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, “लोगो, क्या मिस्र की बादशाही मेरी नहीं है और ये नहरें मेरे नीचे नहीं बह रही हैं? क्या तुम लोगों को नज़र नहीं आता?” (43:51)

जब ये समाज में अपनी बड़ाई का डंका बजाने वाले लोग अपनी बड़ाई पर क़ायम रहते तब अंबिया अपनी क़ौम के लोगों को समझाते हुए कहते कि

“अल्लाह से मदद माँगो और सब्र करो, ज़मीन अल्लाह की है, अपने बन्दों में से जिसको चाहता है उसका वारिस बना देता है, और आख़िरी कामयाबी उन्हीं के लिये है जो उससे डरते हुए काम करें।” (07:128)

कहो, “ऐ अल्लाह! मुल्क के मालिक! तू जिसे चाहे हुकूमत दे और जिससे चाहे छीन ले। जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसको चाहे रुसवा कर दे, भलाई तेरे इख़्तियार में है। बेशक तुझे हर चीज़ पर क़ुदरत हासिल है।” (03:26)

ख़ुदा के मुक़ाबले में बड़े बनने वाले लोगों से अंबिया कहते कि अल्लाह फ़रमाता है :

“हमने तुम्हें ज़मीन में इख़्तियार के साथ बसाया और तुम्हारे लिये यहाँ ज़िन्दगी का सामान जुटाया।” (07:10) इसका मतलब ये नहीं है कि तुम लोगों को अपना ग़ुलाम बना लो और उनसे अपनी बन्दगी कराने लगो, बल्कि सही बात ये है कि हमने ज़मीन पर तुम्हें अपने नायब की हैसियत दी है वो भी इसलिये कि हम देखना चाहते हैं कि अच्छे अमल करते हो या बिगाड़ पैदा करते हो :

“फिर हमने तुमको ज़मीन में उनकी जगह दी है, ताकि देखें कि तुम कैसे काम करते हो।” (10:14)

फिर अंबिया लोगों को ये बताते हैं कि अगर तुमने लोगों के दरम्यान अद्ल क़ायम किया, समाज में अम्नो-सलामती को बहाल रखा तो हम तुम्हें इनाम के तौर पर ऐसी जन्नतें देंगे जिनमें हर तरह का सामाने-ऐश-व-आराम होगा। लेकिन अगर तुमने हमारी ज़मीन पर बिगाड़ पैदा किया तो इस दुनिया में भी तबाही मची रहेगी और मरने के बाद की ज़िन्दगी में आग तुम्हारा मुक़द्दर बन जाएगी जिससे तुम कभी निकाले नहीं जाओगे।

लिहाज़ा इस ज़मीन पर न तो अपनी बड़ाई क़ायम करने की कोशिश करना और न ही इस ज़मीन पर बदअमनी फैलाने की कोशिश करना क्योंकि ये ज़मीन न तुम्हारी है न हमारी बल्कि ये ज़मीन उस ख़ुदा की है जिसने इस कायनात को बनाया है।

इससे बढ़कर और क्या फ़िक्रो-अमल का इन्क़िलाब।

पादशाहों की नहीं, अल्लाह की है ये ज़मीं।।

यक़ीन जानिये अंबियाई दावत का उस्लूब ये हरगिज़ नहीं है कि जिसको दावत दी जा रही है उसे तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया जाए, हज़ारों का मजमा इकठ्ठा करके स्टेज पर खड़े होकर और सीना तानकर ज़बानों को चुप कर दिया जाए और ताली पिटवा दी जाए। ये उस्लूब इस मुल्के-अज़ीज़ हिन्दुस्तान में और भी ज़्यादा नुक़सानदेह उस वक़्त हो जाता है जबकि यहाँ एक गरोह पिछले लगभग सौ बरसों से मुल्क की बड़ी अक्सरियत के सामने ये साबित करने में बड़ी हद तक कामयाब है कि भारत की ये धरती हिन्दुओं की है। चूँकि ये देव-भूमि है इसलिये ये धरती उनके लिये पवित्र और पूजनीय है और इस धरती पर बसने वालों पर शासन करने का अधिकार केवल उनका है। मुसलमान चूँकि बाहर से आए और उन्होंने इस देव-भूमि पर आक्रमण करके इसको अपमानित और अपवित्र किया है इसलिये हमको जब भी अवसर मिलेगा हम इस देव भूमि के शील की रक्षा करेंगे और उस अपमान का बदला लेंगे और उसी पुरानी व्यवस्था को बहाल करेंगे जो यहाँ की सनातन व्यवस्था रही है। अब वो गरोह पूरी मज़बूती के साथ इक़्तिदार में मौजूद है।

ज़रा सोचिये कि जो गरोह इस अज़्म और इरादे के साथ इक़्तिदार में आया है अगर उसके सामने ये कहा जाए कि “ये मुल्क सबसे पहले मुसलमानों का है।” तो इस बात को ठण्डे पेटों कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? जिस मुल्क की अक्सरियत की बड़ी अक्सरियत के दिमाग़ों में बात बिठा दी गई हो कि इस मुल्क में मुसलमान आक्रमणकारी हैं, इन्होंने हमारी मात्रभूमि का चीर-हरण किया है।” उनके सामने दावा करते हुए अगर ये कहा जाए कि “ये मुल्क जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है।” तो इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? ये बात तो उनके नज़दीक बिलकुल वैसी ही है जैसे किसी के घर में घुसकर पूरी अकड़ के साथ ये कहा जाए कि ये घर जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा भी है। ज़ाहिर है जिस तरह वो घर वाला इस बात को एक मिनट के लिये भी बर्दाश्त नहीं करेगा उसी तरह उन बातों का रिएक्शन होना भी फ़ितरी है, जिससे हक़ बात के उनके दिलों तक पहुँचने के तमाम रास्ते बन्द ही हो जाएँगे।

याद रखना चाहिये अंबियाई दावत तो दिलों को जीतकर बहुत ही नर्म अन्दाज़ में एक-एक शख़्स तक पहुँचकर दी जा सकती है। यक़ीन जानिये ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमान सिर्फ़ अपने मिज़ाज को नर्म, किरदार को आला और मक़सद को अज़ीम कर लें तो मुल्क की बड़ी तादाद को अपना गरवीदा बना सकते हैं, जिससे अंबियाई मिशन के अगले मरहले के लिये रास्ता हमवार हो सकता है, जो कि समाज में अम्नो-सलामती के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली तक जा पहुँचता है। इस्लामी नज़रिये से बुनियादी तौर पर न तो इस्लाम का ये दावा है कि ये मुल्क इन (सो-कॉल्ड) मुसलमानों का है और इसमें इनका भी उतना ही हिस्सा है जितना तुम्हारा है। बल्कि इस्लाम की दावत दर-अस्ल ये है कि ये मुल्क और ये पूरी ज़मीन उसी एक अल्लाह की है, जिसने इसे पैदा किया। इस मुल्क का इन्तिज़ाम चलाने का सबसे ज़्यादा हक़ उस गरोह को है जो उस ख़ुदा को हाकिम मानकर सबसे पहले ख़ुद उसका फ़रमाँबरदार हो और फिर समाज में अम्नो-सलामती की बहाली के लिये आगे आए। जो इन्सानों के दरम्यान किसी क़िस्म का भेदभाव न करे बल्कि अद्लो-इन्साफ़ क़ायम करे और किसी भी एक पक्ष का पक्षधर न हो

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अंबियाई दावत को अंबियाई तरीक़े से पहुँचाने की ज़रूरत है।

हम मुसलमान चूँकि अंबियाई मिशन रखनेवाली एक उम्मत हैं। इस ऐतिबार से हमारी दावत भी अंबियाई होनी चाहिये और हमारा उस्लूब व लहजा भी और इसी के साथ मौक़ा व महल भी दुरुस्त होना चाहिये। (16:125)

क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि तमाम अंबिया की दावत ये थी कि “ऐ मेरी क़ौम के भाइयो! एक अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है।” (7:59, 65, 73, 85; 11:50, 61, 84; 29:16) इस पुकार में बात को देखिये कितनी सटीक और उस्लूब में कितनी नर्मी और लचक है।

अंबिया कहते थे कि “तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वो तो सिर्फ़ बन्दे हैं, जैसे तुम बन्दे हो। इनसे दुआएँ माँग देखो, ये तुम्हारी दुआओं का जवाब दें अगर इनके बारे में तुम्हारे ख़याल सही हैं।” (07:194) इस बात में देखेंगे तो मालूम होगा कि अपनी बात को दलील के उस्लूब में रखा गया है।

अंबिया कहते थे कि अल्लाह का फ़रमान है कि उसकी इबादत ही इन्सानों के लिये सीधा रास्ता है “मेरी ही बन्दगी करो, यही सीधा रास्ता है?” (36:61)

“अल्लाह मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी तो तुम उसकी बन्दगी करो। यही सीधी राह है।” (19:36) इस बात में महसूस किया जा सकता है कि ख़ैरख़ाही का जज़्बा उबल पड़ रहा है।

अंबिया की ये दावत इसलिये भी थी कि चूँकि तमाम इन्सान उसी एक ख़ुदा के बन्दे हैं लिहाज़ा उन्हें उसी की बन्दगी करनी चाहिये। यही वो तरीक़ा है जिसके ज़रिए इस दुनिया की ज़िन्दगी में अम्नो-सलामती क़ायम हो सकती है और आख़िरत में भी कामयाबी हासिल हो सकती है।

“ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो और आख़िरत के दिन के उम्मीदवार रहो, और ज़मीन में बिगाड़ फैलानेवाले बनकर ज़्यादतियाँ न करते फिरो।” (29:36)

यक़ीनन अंबिया की इस दावत पर उन लोगों को तकलीफ़ होती थी जो लोगों से अपनी बन्दगी कराते थे। वो इस दावत पर जल-भुन जाते थे और अंबिया को हर तरह से इस दावत से रोकने की कोशिश करते थे। वो कहते थे कि ये मुल्क हमारा है लिहाज़ा बन्दगी हमारी करो। क़ुरआन कहता है कि

“एक दिन फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, “लोगो, क्या मिस्र की बादशाही मेरी नहीं है और ये नहरें मेरे नीचे नहीं बह रही हैं? क्या तुम लोगों को नज़र नहीं आता?” (43:51)

जब ये समाज में अपनी बड़ाई का डंका बजाने वाले लोग अपनी बड़ाई पर क़ायम रहते तब अंबिया अपनी क़ौम के लोगों को समझाते हुए कहते कि

“अल्लाह से मदद माँगो और सब्र करो, ज़मीन अल्लाह की है, अपने बन्दों में से जिसको चाहता है उसका वारिस बना देता है, और आख़िरी कामयाबी उन्हीं के लिये है जो उससे डरते हुए काम करें।” (07:128)

कहो, “ऐ अल्लाह! मुल्क के मालिक! तू जिसे चाहे हुकूमत दे और जिससे चाहे छीन ले। जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसको चाहे रुसवा कर दे, भलाई तेरे इख़्तियार में है। बेशक तुझे हर चीज़ पर क़ुदरत हासिल है।” (03:26)

ख़ुदा के मुक़ाबले में बड़े बनने वाले लोगों से अंबिया कहते कि अल्लाह फ़रमाता है :

“हमने तुम्हें ज़मीन में इख़्तियार के साथ बसाया और तुम्हारे लिये यहाँ ज़िन्दगी का सामान जुटाया।” (07:10) इसका मतलब ये नहीं है कि तुम लोगों को अपना ग़ुलाम बना लो और उनसे अपनी बन्दगी कराने लगो, बल्कि सही बात ये है कि हमने ज़मीन पर तुम्हें अपने नायब की हैसियत दी है वो भी इसलिये कि हम देखना चाहते हैं कि अच्छे अमल करते हो या बिगाड़ पैदा करते हो :

“फिर हमने तुमको ज़मीन में उनकी जगह दी है, ताकि देखें कि तुम कैसे काम करते हो।” (10:14)

फिर अंबिया लोगों को ये बताते हैं कि अगर तुमने लोगों के दरम्यान अद्ल क़ायम किया, समाज में अम्नो-सलामती को बहाल रखा तो हम तुम्हें इनाम के तौर पर ऐसी जन्नतें देंगे जिनमें हर तरह का सामाने-ऐश-व-आराम होगा। लेकिन अगर तुमने हमारी ज़मीन पर बिगाड़ पैदा किया तो इस दुनिया में भी तबाही मची रहेगी और मरने के बाद की ज़िन्दगी में आग तुम्हारा मुक़द्दर बन जाएगी जिससे तुम कभी निकाले नहीं जाओगे।

लिहाज़ा इस ज़मीन पर न तो अपनी बड़ाई क़ायम करने की कोशिश करना और न ही इस ज़मीन पर बदअमनी फैलाने की कोशिश करना क्योंकि ये ज़मीन न तुम्हारी है न हमारी बल्कि ये ज़मीन उस ख़ुदा की है जिसने इस कायनात को बनाया है।

इससे बढ़कर और क्या फ़िक्रो-अमल का इन्क़िलाब।

पादशाहों की नहीं, अल्लाह की है ये ज़मीं।।

यक़ीन जानिये अंबियाई दावत का उस्लूब ये हरगिज़ नहीं है कि जिसको दावत दी जा रही है उसे तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया जाए, हज़ारों का मजमा इकठ्ठा करके स्टेज पर खड़े होकर और सीना तानकर ज़बानों को चुप कर दिया जाए और ताली पिटवा दी जाए। ये उस्लूब इस मुल्के-अज़ीज़ हिन्दुस्तान में और भी ज़्यादा नुक़सानदेह उस वक़्त हो जाता है जबकि यहाँ एक गरोह पिछले लगभग सौ बरसों से मुल्क की बड़ी अक्सरियत के सामने ये साबित करने में बड़ी हद तक कामयाब है कि भारत की ये धरती हिन्दुओं की है। चूँकि ये देव-भूमि है इसलिये ये धरती उनके लिये पवित्र और पूजनीय है और इस धरती पर बसने वालों पर शासन करने का अधिकार केवल उनका है। मुसलमान चूँकि बाहर से आए और उन्होंने इस देव-भूमि पर आक्रमण करके इसको अपमानित और अपवित्र किया है इसलिये हमको जब भी अवसर मिलेगा हम इस देव भूमि के शील की रक्षा करेंगे और उस अपमान का बदला लेंगे और उसी पुरानी व्यवस्था को बहाल करेंगे जो यहाँ की सनातन व्यवस्था रही है। अब वो गरोह पूरी मज़बूती के साथ इक़्तिदार में मौजूद है।

ज़रा सोचिये कि जो गरोह इस अज़्म और इरादे के साथ इक़्तिदार में आया है अगर उसके सामने ये कहा जाए कि “ये मुल्क सबसे पहले मुसलमानों का है।” तो इस बात को ठण्डे पेटों कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? जिस मुल्क की अक्सरियत की बड़ी अक्सरियत के दिमाग़ों में बात बिठा दी गई हो कि इस मुल्क में मुसलमान आक्रमणकारी हैं, इन्होंने हमारी मात्रभूमि का चीर-हरण किया है।” उनके सामने दावा करते हुए अगर ये कहा जाए कि “ये मुल्क जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है।” तो इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? ये बात तो उनके नज़दीक बिलकुल वैसी ही है जैसे किसी के घर में घुसकर पूरी अकड़ के साथ ये कहा जाए कि ये घर जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा भी है। ज़ाहिर है जिस तरह वो घर वाला इस बात को एक मिनट के लिये भी बर्दाश्त नहीं करेगा उसी तरह उन बातों का रिएक्शन होना भी फ़ितरी है, जिससे हक़ बात के उनके दिलों तक पहुँचने के तमाम रास्ते बन्द ही हो जाएँगे।

याद रखना चाहिये अंबियाई दावत तो दिलों को जीतकर बहुत ही नर्म अन्दाज़ में एक-एक शख़्स तक पहुँचकर दी जा सकती है। यक़ीन जानिये ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमान सिर्फ़ अपने मिज़ाज को नर्म, किरदार को आला और मक़सद को अज़ीम कर लें तो मुल्क की बड़ी तादाद को अपना गरवीदा बना सकते हैं, जिससे अंबियाई मिशन के अगले मरहले के लिये रास्ता हमवार हो सकता है, जो कि समाज में अम्नो-सलामती के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली तक जा पहुँचता है। इस्लामी नज़रिये से बुनियादी तौर पर न तो इस्लाम का ये दावा है कि ये मुल्क इन (सो-कॉल्ड) मुसलमानों का है और इसमें इनका भी उतना ही हिस्सा है जितना तुम्हारा है। बल्कि इस्लाम की दावत दर-अस्ल ये है कि ये मुल्क और ये पूरी ज़मीन उसी एक अल्लाह की है, जिसने इसे पैदा किया। इस मुल्क का इन्तिज़ाम चलाने का सबसे ज़्यादा हक़ उस गरोह को है जो उस ख़ुदा को हाकिम मानकर सबसे पहले ख़ुद उसका फ़रमाँबरदार हो और फिर समाज में अम्नो-सलामती की बहाली के लिये आगे आए। जो इन्सानों के दरम्यान किसी क़िस्म का भेदभाव न करे बल्कि अद्लो-इन्साफ़ क़ायम करे और किसी भी एक पक्ष का पक्षधर न हो

अंबियाई दावत को अंबियाई तरीक़े से पहुँचाने की ज़रूरत है।

हम मुसलमान चूँकि अंबियाई मिशन रखनेवाली एक उम्मत हैं। इस ऐतिबार से हमारी दावत भी अंबियाई होनी चाहिये और हमारा उस्लूब व लहजा भी और इसी के साथ मौक़ा व महल भी दुरुस्त होना चाहिये। (16:125)

क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि तमाम अंबिया की दावत ये थी कि “ऐ मेरी क़ौम के भाइयो! एक अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है।” (7:59, 65, 73, 85; 11:50, 61, 84; 29:16) इस पुकार में बात को देखिये कितनी सटीक और उस्लूब में कितनी नर्मी और लचक है।

अंबिया कहते थे कि “तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वो तो सिर्फ़ बन्दे हैं, जैसे तुम बन्दे हो। इनसे दुआएँ माँग देखो, ये तुम्हारी दुआओं का जवाब दें अगर इनके बारे में तुम्हारे ख़याल सही हैं।” (07:194) इस बात में देखेंगे तो मालूम होगा कि अपनी बात को दलील के उस्लूब में रखा गया है।

अंबिया कहते थे कि अल्लाह का फ़रमान है कि उसकी इबादत ही इन्सानों के लिये सीधा रास्ता है “मेरी ही बन्दगी करो, यही सीधा रास्ता है?” (36:61)

“अल्लाह मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी तो तुम उसकी बन्दगी करो। यही सीधी राह है।” (19:36) इस बात में महसूस किया जा सकता है कि ख़ैरख़ाही का जज़्बा उबल पड़ रहा है।

अंबिया की ये दावत इसलिये भी थी कि चूँकि तमाम इन्सान उसी एक ख़ुदा के बन्दे हैं लिहाज़ा उन्हें उसी की बन्दगी करनी चाहिये। यही वो तरीक़ा है जिसके ज़रिए इस दुनिया की ज़िन्दगी में अम्नो-सलामती क़ायम हो सकती है और आख़िरत में भी कामयाबी हासिल हो सकती है।

“ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो और आख़िरत के दिन के उम्मीदवार रहो, और ज़मीन में बिगाड़ फैलानेवाले बनकर ज़्यादतियाँ न करते फिरो।” (29:36)

यक़ीनन अंबिया की इस दावत पर उन लोगों को तकलीफ़ होती थी जो लोगों से अपनी बन्दगी कराते थे। वो इस दावत पर जल-भुन जाते थे और अंबिया को हर तरह से इस दावत से रोकने की कोशिश करते थे। वो कहते थे कि ये मुल्क हमारा है लिहाज़ा बन्दगी हमारी करो। क़ुरआन कहता है कि

“एक दिन फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, “लोगो, क्या मिस्र की बादशाही मेरी नहीं है और ये नहरें मेरे नीचे नहीं बह रही हैं? क्या तुम लोगों को नज़र नहीं आता?” (43:51)

जब ये समाज में अपनी बड़ाई का डंका बजाने वाले लोग अपनी बड़ाई पर क़ायम रहते तब अंबिया अपनी क़ौम के लोगों को समझाते हुए कहते कि

“अल्लाह से मदद माँगो और सब्र करो, ज़मीन अल्लाह की है, अपने बन्दों में से जिसको चाहता है उसका वारिस बना देता है, और आख़िरी कामयाबी उन्हीं के लिये है जो उससे डरते हुए काम करें।” (07:128)

कहो, “ऐ अल्लाह! मुल्क के मालिक! तू जिसे चाहे हुकूमत दे और जिससे चाहे छीन ले। जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसको चाहे रुसवा कर दे, भलाई तेरे इख़्तियार में है। बेशक तुझे हर चीज़ पर क़ुदरत हासिल है।” (03:26)

ख़ुदा के मुक़ाबले में बड़े बनने वाले लोगों से अंबिया कहते कि अल्लाह फ़रमाता है :

“हमने तुम्हें ज़मीन में इख़्तियार के साथ बसाया और तुम्हारे लिये यहाँ ज़िन्दगी का सामान जुटाया।” (07:10) इसका मतलब ये नहीं है कि तुम लोगों को अपना ग़ुलाम बना लो और उनसे अपनी बन्दगी कराने लगो, बल्कि सही बात ये है कि हमने ज़मीन पर तुम्हें अपने नायब की हैसियत दी है वो भी इसलिये कि हम देखना चाहते हैं कि अच्छे अमल करते हो या बिगाड़ पैदा करते हो :

“फिर हमने तुमको ज़मीन में उनकी जगह दी है, ताकि देखें कि तुम कैसे काम करते हो।” (10:14)

फिर अंबिया लोगों को ये बताते हैं कि अगर तुमने लोगों के दरम्यान अद्ल क़ायम किया, समाज में अम्नो-सलामती को बहाल रखा तो हम तुम्हें इनाम के तौर पर ऐसी जन्नतें देंगे जिनमें हर तरह का सामाने-ऐश-व-आराम होगा। लेकिन अगर तुमने हमारी ज़मीन पर बिगाड़ पैदा किया तो इस दुनिया में भी तबाही मची रहेगी और मरने के बाद की ज़िन्दगी में आग तुम्हारा मुक़द्दर बन जाएगी जिससे तुम कभी निकाले नहीं जाओगे।

लिहाज़ा इस ज़मीन पर न तो अपनी बड़ाई क़ायम करने की कोशिश करना और न ही इस ज़मीन पर बदअमनी फैलाने की कोशिश करना क्योंकि ये ज़मीन न तुम्हारी है न हमारी बल्कि ये ज़मीन उस ख़ुदा की है जिसने इस कायनात को बनाया है।

इससे बढ़कर और क्या फ़िक्रो-अमल का इन्क़िलाब।

पादशाहों की नहीं, अल्लाह की है ये ज़मीं।।

यक़ीन जानिये अंबियाई दावत का उस्लूब ये हरगिज़ नहीं है कि जिसको दावत दी जा रही है उसे तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया जाए, हज़ारों का मजमा इकठ्ठा करके स्टेज पर खड़े होकर और सीना तानकर ज़बानों को चुप कर दिया जाए और ताली पिटवा दी जाए। ये उस्लूब इस मुल्के-अज़ीज़ हिन्दुस्तान में और भी ज़्यादा नुक़सानदेह उस वक़्त हो जाता है जबकि यहाँ एक गरोह पिछले लगभग सौ बरसों से मुल्क की बड़ी अक्सरियत के सामने ये साबित करने में बड़ी हद तक कामयाब है कि भारत की ये धरती हिन्दुओं की है। चूँकि ये देव-भूमि है इसलिये ये धरती उनके लिये पवित्र और पूजनीय है और इस धरती पर बसने वालों पर शासन करने का अधिकार केवल उनका है। मुसलमान चूँकि बाहर से आए और उन्होंने इस देव-भूमि पर आक्रमण करके इसको अपमानित और अपवित्र किया है इसलिये हमको जब भी अवसर मिलेगा हम इस देव भूमि के शील की रक्षा करेंगे और उस अपमान का बदला लेंगे और उसी पुरानी व्यवस्था को बहाल करेंगे जो यहाँ की सनातन व्यवस्था रही है। अब वो गरोह पूरी मज़बूती के साथ इक़्तिदार में मौजूद है।

ज़रा सोचिये कि जो गरोह इस अज़्म और इरादे के साथ इक़्तिदार में आया है अगर उसके सामने ये कहा जाए कि “ये मुल्क सबसे पहले मुसलमानों का है।” तो इस बात को ठण्डे पेटों कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? जिस मुल्क की अक्सरियत की बड़ी अक्सरियत के दिमाग़ों में बात बिठा दी गई हो कि इस मुल्क में मुसलमान आक्रमणकारी हैं, इन्होंने हमारी मात्रभूमि का चीर-हरण किया है।” उनके सामने दावा करते हुए अगर ये कहा जाए कि “ये मुल्क जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है।” तो इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? ये बात तो उनके नज़दीक बिलकुल वैसी ही है जैसे किसी के घर में घुसकर पूरी अकड़ के साथ ये कहा जाए कि ये घर जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा भी है। ज़ाहिर है जिस तरह वो घर वाला इस बात को एक मिनट के लिये भी बर्दाश्त नहीं करेगा उसी तरह उन बातों का रिएक्शन होना भी फ़ितरी है, जिससे हक़ बात के उनके दिलों तक पहुँचने के तमाम रास्ते बन्द ही हो जाएँगे।

याद रखना चाहिये अंबियाई दावत तो दिलों को जीतकर बहुत ही नर्म अन्दाज़ में एक-एक शख़्स तक पहुँचकर दी जा सकती है। यक़ीन जानिये ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमान सिर्फ़ अपने मिज़ाज को नर्म, किरदार को आला और मक़सद को अज़ीम कर लें तो मुल्क की बड़ी तादाद को अपना गरवीदा बना सकते हैं, जिससे अंबियाई मिशन के अगले मरहले के लिये रास्ता हमवार हो सकता है, जो कि समाज में अम्नो-सलामती के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली तक जा पहुँचता है। इस्लामी नज़रिये से बुनियादी तौर पर न तो इस्लाम का ये दावा है कि ये मुल्क इन (सो-कॉल्ड) मुसलमानों का है और इसमें इनका भी उतना ही हिस्सा है जितना तुम्हारा है। बल्कि इस्लाम की दावत दर-अस्ल ये है कि ये मुल्क और ये पूरी ज़मीन उसी एक अल्लाह की है, जिसने इसे पैदा किया। इस मुल्क का इन्तिज़ाम चलाने का सबसे ज़्यादा हक़ उस गरोह को है जो उस ख़ुदा को हाकिम मानकर सबसे पहले ख़ुद उसका फ़रमाँबरदार हो और फिर समाज में अम्नो-सलामती की बहाली के लिये आगे आए। जो इन्सानों के दरम्यान किसी क़िस्म का भेदभाव न करे बल्कि अद्लो-इन्साफ़ क़ायम करे और किसी भी एक पक्ष का पक्षधर न हो

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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