क़ुरआन के मुताले से ये बात मालूम होती है कि ईमान के बग़ैर कोई शख़्स जन्नत में नहीं जा सकता। ईमान के बग़ैर अगर कोई शख़्स नेक अमल भी करता है तो उसके उन नेक आमाल का बदला दुनिया में ही दे दिया जाएगा, आख़िरत में उसके इन नेक आमाल का कोई अज्र नहीं मिलेगा, क्योंकि उसने आख़िरत में अज्र पाने की ग़रज़ से नेक अमल किये ही नहीं थे।
क़ुरआन ही के मुताले से ये बात भी मालूम होती है कि ईमान दो तरह का होता है। एक क़ानूनी ईमान और दूसरा हक़ीक़ी ईमान। क़ानूनी हैसियत से हर वो शख़्स “मुसलमान” है जो कालिमा तैयबा का ज़बानी इक़रार करे और दीन की ज़रूरी बातों का इनकार न करे; लेकिन इस माना में जो शख़्स “मुस्लिम” कहलाता है उसकी हैसियत इससे ज़्यादा कुछ नहीं कि वो इस्लाम के दायरे में दाख़िल है। हम उसको काफ़िर नहीं कह सकते, न वो हक़ देने से इनकार कर सकते हैं जो इस्लाम का सिर्फ़ इक़रार कर लेने से उसको मुस्लिम सोसाइटी में हासिल होते हैं। लेकिन जान लेना चाहिये कि ये असल इस्लाम नहीं है बल्कि इस्लाम की सरहद में दाख़िल होने का परवाना है। इसकी हैसियत ऐसी है जैसे किसी को ड्राइविंग लाइसेंस दे दिया गया हो। लेकिन हम सब जानते हैं कि किसी को ड्राइविंग लाइसेंस हासिल हो जाने का मतलब ये नहीं है कि अब वो सड़क के नियमों का पालन नहीं करेगा। लाइसेंस के बग़ैर तो कोई शख़्स गाड़ी लेकर सड़क पर चलने का इख़्तियार ही नहीं रखता। लेकिन लाइसेंस के साथ सड़क पर गाड़ी लेकर अगर कोई चलता है तो उससे ये उम्मीद की जाती है कि वो सड़क के नियमों का ज़रूर पालन करेगा। अब अगर वो सड़क के नियमों को तोड़ता है तो उस पर जुर्माना लगेगा। और बहुत ज़्यादा नियमों को तोड़ने की सूरत में तो उसका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। लिहाज़ा क़ानूनी क़िस्म का इस्लाम तो बस इस बात का सुबूत है कि उसके साथ दुनिया में मुसलमानों जैसा रवैया इख़्तियार किया जाएगा जब तक कि उसके अपने मुस्तक़िल रवैये से उसके लाइसेंस रद्द होने यानी इस्लाम से फिर जाने की सूरत न पैदा हो गई हो।
दूसरी क़िस्म का ईमान हक़ीक़ी ईमान है जो दिल से इक़रार करने और अमल से ज़ाहिर करने का नाम है।
असल ईमान ये है कि पूरे के पूरे तौर पर इताअत में आ जाएँ; पूरी तरह सरेंडर कर देना कि तुम्हारा ज़ेहन इस्लाम के साँचे में ढल जाए। तुम्हारा तरीक़े-फ़िक्र वही हो, जो क़ुरआन का तरीक़े-फ़िक्र है। ज़िन्दगी और उसके तमाम मामलों पर तुम्हारी नज़र वही हो, जो क़ुरआन की नज़र है। तुम ज़िंदगी के मामलात उसी मैयार के मुताबिक़ तय करो जो क़ुरआन ने इख़्तियार किया है, तुम्हारा इनफ़िरादी और इज्तिमाई नस्बुल-ऐन वही हो, जो क़ुरआन ने पेश किया है। तुम अपनी ज़िन्दगी के हर शोबे में मुख़्तलिफ़ तरीक़ों को छोड़कर एक तरीक़ा उसी मैयारे-इन्तिख़ाब की बिना पर मुंतख़ब करो, जो क़ुरआन और तरीक़े-मुहम्मदी की हिदायत से तुमको मिला है। अगर तुम्हारा ज़ेहन उस चीज़ को क़बूल करता है और तुम अपनी नफ़्सियात को क़ुरआनी नफ़्सियात के साथ मिला लेते हो, तो फिर ज़िन्दगी के मामले में भी तुम्हारा रास्ता उस रास्ते से अलग नहीं हो सकता जिसे क़ुरआन मोमिनीन का रास्ता कहता है।