अगर किसी शख़्स ने अपने पेड़ की जड़ों को ख़ुद ही काट डाला हो तो क्या वो-
-उस पेड़ की ठण्डी छाँव से फ़ायदा उठा पाएगा?
-उस पेड़ के मीठे और रसीले फलों का लुत्फ़ उठा पाएगा?
-उस पेड़ की शाख़ों और पत्तों को सूखने और टूटने से बचा पाएगा?
अगर नहीं, तो सोचिये
जब हम मुसलमानों ने इस्लाम की जड़ों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ा चला रखा हो, तो क्या हम-
-इस्लामी निज़ामे-रहमत की ठण्डी छाँव से फ़ायदा उठा पाएँगे?
-इस्लामी किरदार और अख़लाक़ के रसीले फलों का लुत्फ़ उठा पाएँगे?
-हिजाब, क़ुर्बानी, क़ानूने-निकाह व तलाक़ और इबादतगाहों जैसे एहकामात और
शुआइरे-इस्लाम (नुमा शाख़ों और पत्तियों) को सूखने और टूटने से बचा पाएँगे?
हरगिज़ नहीं, हरगिज़ नहीं।
तो आइये हम सब मुसलमान मिलकर सबसे पहले इस्लाम की जड़ों को मज़बूत करें-
-अपने अक़ीदों को सही तौर से समझें,
-अपने अख़लाक़ व किरदार को क़ुरआन के साँचे में ढालें,
-इस्लामी एहकामात पर बिना किसी ख़ौफ़ और डर के अमल करें
ताकि
इस्लाम का निज़ामे-रहमत होना हम ख़ुद साबित कर सकें और फिर तमाम इन्सानियत को इसके साये से फ़ायदा उठाने और अख़लाक़ व किरदार के रसीले फलों से लुत्फ़-अन्दोज़ होने का मौक़ा फ़राहम कर सकें।
फिर इस शजरे-तैयबा की शाख़ों को काटना तो बहुत दूर की बात इसकी तरफ़ मैली आँख से देखने की भी हिम्मत नहीं कर पाएगा। न धर्म संसद बिठाकर और न ही क़ानून बनाकर।