इख़्तिलाफ़ के मुसल्लेमा उसूल

इख़्तिलाफ़ के मुसल्लेमा उसूल

दो या दो से ज़्यादा समझदार लोगों का एक साथ रहते हुए रायों में इख़्तिलाफ़ होना उतना ही फ़ितरी है जितना की अल्लाह की इस कायनात में इन्सानों का शक्ल व सूरत में, आदत व अतवार में, रंग और बोली वग़ैरा में मुख़्तलिफ़ होना। हर शख़्स का किसी चीज़ को देखने, परखने, सोचने और उससे नतीजा निकालने का अन्दाज़ दूसरे से मिलते-जुलते (Resemblance) होने के बावजूद भी मुख़्तलिफ़ होता है, क्योंकि हर इन्सान की उम्र, तालीम, तज्रिबा, महारत और समझ का लेवल अलग होता है, इस बुनियाद पर हर शख़्स जुदागाना राय रखता है। घर में क्या पकेगा? घर में किस कम्पनी का सामान आएगा, घर के दरवाज़े किस क़िस्म के और परदे किस रंग के लगेंगे? बेटी या बेटे के रिश्ते में किसको हाँ करना है और किसको ना बोलना है? शादी की तारीख़ क्या हो? बच्चे को किस स्कूल में दाख़िल कराया जाए और किस कोचिंग में तैयारी कराई जाए? वग़ैरा रोज़मर्रा के ऐसे इशूज़ हैं जिनमें सगे रिश्तों के दरम्यान इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। यानी रायों का इख़्तिलाफ़ हमारी समाजी और घरेलु ज़िन्दगी का अहम हिस्सा ही नहीं, बल्कि हमारी तामीर और तरक़्क़ी के लिये बेहद ज़रूरी है। अगर ये इख़्तिलाफ़ न पाया जाए तो इन्सान की ज़िन्दगी में तरक़्क़ी रुक जाएगी।

लेकिन अक्सर देखा ये गया है कि इख़्तिलाफ़ नाम का ये टूल हमारे मुआशरे में अक्सर नुक़सान का बाइस बना हुआ है। इसी इख़्तिलाफ़ नाम के टूल को इस्तेमाल करके दुनिया तरक़्क़ी करती चली जा रही है और हम इस टूल को अपने ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे दरम्यान ये ‘इख़्तिलाफ़’ कब मुख़ालिफ़त में बदलकर दुश्मनी की हद को पहुँच जाता है इसका पता हमें उस वक़्त चलता है जब हम बहुत कुछ गँवा चुके होते हैं, बल्कि अक्सर तो पता भी नहीं चल पाता है और हम इन्तिशार व इफ़्तिराक़ का शिकार होकर तबाह होते रहते हैं। इसीलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहाँ जिन बातों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता था वो आज मुख़ालिफ़त की मोटी और मज़बूत दीवारों में तब्दील हो चुका है जिससे हमारे यहाँ सबसे पहले तो शिआ और सुन्नी नाम के मज़बूत आहनी दीवारों वाले ऐसे दो मज़ाहिब वुजूद में आए कि इनको भेद पाना क़ियामत तक शायद मुमकिन न हो, फिर फ़ुक़हा के दरम्यान बाबरकत इख़्तिलाफ़ात ने जब मुख़ालिफ़त की शक्ल इख़्तियार की तो चार ऐसे जुदागाना मसलक वुजूद में आए जिन्होंने मज़ीद मुसलमानों की सलाहियतों को मज़बूत सलाख़ों वाली क़ैद में मुक़ैयद करके रख दिया। इन इख़्तिलाफ़ात की नौइयतों को समझाने और इनकी हक़ीक़त को वाज़ेह करने के लिये फिर जितनी भी जमाअतें वुजूद में आती गईं, उन्होंने भी एक ख़ास वक़्त में पहुँचकर मुख़ालिफ़त का चोला पहन लिया और फिर वही मज़बूत दीवारों वाली क़ैद मुसलमानों की तक़दीर बन गई।

अगर हम मुसलमानों के दरम्यान नफ़रतों को मिटाकर इत्तिहाद की फ़िज़ा देखना चाहते हैं तो हमें इस वक़्त इत्तिहाद से ज़्यादा इख़्तिलाफ़ के आदाब सीखने की सख़्त ज़रूरत है। अगर हम मुसलमानों की सूरते-हाल को बेहतर करना चाहते हैं तो हमें इस बात को ज़रूर समझना होगा कि इख़्तिलाफ़ एक ऐसा टूल है जिसको इस्तेमाल करके हम तरक़्क़ी के रास्ते तय कर सकते हैं, मगर ये उसी वक़्त मुमकिन हो सकता है जबकि हम हर वक़्त इस बात से अलर्ट रहें कि हमारे दरम्यान का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में न बदलने पाए। इसके लिये ज़रूरी है कि हम इख़्तिलाफ़ के कुछ मुसल्लेमा उसूलों की पुख़्तगी के साथ पाबन्दी करें।

(1) किसी भी राय को इख़्तियार करने से पहले इत्मीनान कर लें कि जो राय हम इख़्तियार करने जा रहे हैं वो हमारी समझ के मुताबिक़ दुरुस्त हैं, लेकिन इसमें ग़लती का इमकान भी उतना ही मौजूद है जितना इस राय के सही होने का। अगर हमारी राय ग़लत साबित हो तो फ़ौरन उससे रुजू कर लें। यक़ीन जानिये ये काम है तो बहुत मुश्किल लेकिन इससे रूह को बहुत सुकून मिलेगा।

(2) ज़रूरी नहीं है कि जिस राय को हम दुरुस्त मानते हैं उसको हर हाल में ज़ाहिर करना ज़रूरी ही है। कभी-कभी ये भी होता है कि हमारे सामने वाले की राय भी उतनी ही दुरुस्त है जितनी की हमारी, भले ही चाहे वो आपस में टकराती नज़र आती हो। इस सूरत में हमारे अन्दर इख़्तिलाफ़ के बावजूद बाहम एक-दूसरे के साथ रहने और ख़ुश-उस्लूबी के साथ रहने का हुनर आएगा। और इस प्रैक्टिस को करने का नतीजा ये निकलेगा कि या तो वो अपनी राय से रुजू कर लेगा या हम, या अगर इख़लास कारफ़रमा हो तो फिर दोनों की रायों से एक तीसरी ख़ैर की ऐसी राह हमवार होगी जो दोनों के दरम्यान ताल्लुक़ात को मज़बूत कर देगी।

(3) हमारी राय जो भी हो उसको पेश करने का अन्दाज़ ये तय करेगा कि हमारी बात सुनी जाएगी या रद्द कर दी जाएगी। मुमकिन है हमारी राय बहुत मुफ़ीद हो लेकिन हमारा अन्दाज़े-पेशकश इतना जारिहाना और लहजा इतना तन्ज़िया हो कि हमारी क़ीमती राय को कोई ऐतिबार के क़ाबिल ही न समझे और यूँ लोग हमारी क़ीमती राय से महरूम होकर रह जाएँगे। इसके मुक़ाबले में अगर कोई दूसरा शख़्स एक तबाहकुन राय रखता है लेकिन उसका अन्दाज़े-पेशकश इतना दिलकश है कि वो दिलों पर असर कर जाता है तो लोग उस राय से मुतास्सिर हो जाते हैं। लिहाज़ा याद रखें कि हमारा अपनी राय को पेश करने का अन्दाज़ भी कभी-कभी इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

(4) याद रखिये कि हमारी सही राय की क़द्र तभी की जाएगी जबकि हम दूसरे की ग़लत राय का भी एहतिराम करना जानते हैं। दूसरे की राय का एहतिराम बिलकुल उसी तरह किया जाना चाहिये जिस तरह एक इन्सान का एहतिराम किया जाता है। किसी की राय पर तंज़ करना और उसे हक़ीर समझकर रद्द करना इख़्तिलाफ़ का सलीक़ा नहीं बल्कि मुख़ालिफ़त को जन्म देता है।

(5) रायों का इख़्तिलाफ़ उस वक़्त भी मुख़ालिफ़त का रंग इख़्तियार कर लेता है जबकि हम दूसरे को बहस में हराकर और उसकी ज़बान बन्द करके उसे अपनी राय के मनवाने पर मजबूर करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके हम उस वक़्त तो उससे जीत सकते हैं मगर याद रखें कि वहीँ मुख़ालिफ़त का बीज बोया जा चुका होता है जिसकी फ़सल हमें मुस्तक़बिल क़रीब में ज़रूर काटनी पड़ेगी।

(6) ज़रूरी नहीं है कि दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान उसी वक़्त फ़ैसला करना ज़रूरी है, बल्कि इस सूरत में इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदलने से रोकने का बेहतरीन तरीक़ा ये है कि महफ़िल को ख़ुश-उस्लूबी के साथ बरख़ास्त कर दिया जाए और दोनों को अपनी रायों पर ग़ौर करने का मौक़ा दिया जाए। इस दौरान आपस में एक-दूसरे को समझने का मौक़ा दिया जाए, अगर इसके बावजूद भी कोई फ़ैसला न हो तो दोनों को अपनी राय पर क़ायम रहते हुए दोनों को एक-दूसरे की रायों का एहतिराम करना चाहिये कि ये भी एक तरह के हौसले की बात है। ये कोई मामूली बात नहीं है।

(7) दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान अगर हमारी राय को क़बूले-आम हासिल हो गया हो तो इस पर फ़ख़्र करने और शेख़ी बघारने की ज़रूरत नहीं है कि हमने कोई मैदान जीत लिया है, बल्कि जिसकी राय कमज़ोर पड़ गई है उसकी इज़्ज़ते-नफ़्स का ख़्याल रखें और मुनासिब तरीक़े से उसकी तारीफ़ करें और इस बात के लिये उसको मोटिवेट करें कि वो उन लोगों से बहुत बुलन्द है जो अपनी कोई राय रखते ही नहीं हैं बल्कि दूसरों की रायों पर ही तकिया किये रहते हैं।

(😎 हमारी राय मज़बूत है या कमज़ोर दोनों सूरतों में अपने से दूसरे की राय पर किसी क़िस्म की ग़ीबत या लगाई-बुझाई करके हम इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकते हैं।

(9) अगर इख़्तिलाफ़ दो लोगों के दरम्यान का है तो उसे उसी हद तक रखें वहीँ तक डिस्कशन करें, किसी तीसरे को या तमाम लोगों को उसमें इन्वॉल्व न करें। हमेशा याद रखें कि हमारी तरह और लोग भी अपना एक ज़ेहन व दिमाग़ रखते हैं। हमारी राय के ख़िलाफ़ वाली बात मानकर लोग गुमराह हो जाएँगे इस बात की ज़िम्मेदारी हम पर न तो अल्लाह ने डाली है, न रसूल ने। लिहाज़ा पुर-अम्न रहें और जब मुनासिब मौक़ा मअलूम हो तो अपनी राय का इज़हार कर दें। इससे उम्मीद है कि राय का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में तब्दील नहीं होगा।

(10) इख़्तिलाफ़ किसी से भी हो, किसी भी नौइयत का हो, इससे आपस के ताल्लुक़ात में खिंचाव कम-ज़र्फ़ी की अलामत है। इख़्तिलाफ़ के बावजूद अगर कोई दूसरा फ़रीक़ आपसे मिलना या बात करना चाहता है तो इस बुनियाद पर उसे हारा हुआ समझकर उसे हक़ीर जानना इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

हमेशा याद रखें कि

فَــلَا تَتَّبِعُوا الْہَوٰٓی اَنْ تَعْدِلُوْا

तुम ख़ाहिशे-नफ़्स के पीछे न पड़ो, कहीं ऐसा न हो कि तुम हक़ ही से दूर हो जाओ। (निसा : 135)

लिहाज़ा

فَاعْتَبِرُوْا یٰٓا اُولِی الْاَبْصَارِ

ऐ बसीरत की निगाह रखनेवालो इबरत हासिल करो। (हश्र : 2)

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

Hindi

दो या दो से ज़्यादा समझदार लोगों का एक साथ रहते हुए रायों में इख़्तिलाफ़ होना उतना ही फ़ितरी है जितना की अल्लाह की इस कायनात में इन्सानों का शक्ल व सूरत में, आदत व अतवार में, रंग और बोली वग़ैरा में मुख़्तलिफ़ होना। हर शख़्स का किसी चीज़ को देखने, परखने, सोचने और उससे नतीजा निकालने का अन्दाज़ दूसरे से मिलते-जुलते (Resemblance) होने के बावजूद भी मुख़्तलिफ़ होता है, क्योंकि हर इन्सान की उम्र, तालीम, तज्रिबा, महारत और समझ का लेवल अलग होता है, इस बुनियाद पर हर शख़्स जुदागाना राय रखता है। घर में क्या पकेगा? घर में किस कम्पनी का सामान आएगा, घर के दरवाज़े किस क़िस्म के और परदे किस रंग के लगेंगे? बेटी या बेटे के रिश्ते में किसको हाँ करना है और किसको ना बोलना है? शादी की तारीख़ क्या हो? बच्चे को किस स्कूल में दाख़िल कराया जाए और किस कोचिंग में तैयारी कराई जाए? वग़ैरा रोज़मर्रा के ऐसे इशूज़ हैं जिनमें सगे रिश्तों के दरम्यान इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। यानी रायों का इख़्तिलाफ़ हमारी समाजी और घरेलु ज़िन्दगी का अहम हिस्सा ही नहीं, बल्कि हमारी तामीर और तरक़्क़ी के लिये बेहद ज़रूरी है। अगर ये इख़्तिलाफ़ न पाया जाए तो इन्सान की ज़िन्दगी में तरक़्क़ी रुक जाएगी।

लेकिन अक्सर देखा ये गया है कि इख़्तिलाफ़ नाम का ये टूल हमारे मुआशरे में अक्सर नुक़सान का बाइस बना हुआ है। इसी इख़्तिलाफ़ नाम के टूल को इस्तेमाल करके दुनिया तरक़्क़ी करती चली जा रही है और हम इस टूल को अपने ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे दरम्यान ये ‘इख़्तिलाफ़’ कब मुख़ालिफ़त में बदलकर दुश्मनी की हद को पहुँच जाता है इसका पता हमें उस वक़्त चलता है जब हम बहुत कुछ गँवा चुके होते हैं, बल्कि अक्सर तो पता भी नहीं चल पाता है और हम इन्तिशार व इफ़्तिराक़ का शिकार होकर तबाह होते रहते हैं। इसीलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहाँ जिन बातों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता था वो आज मुख़ालिफ़त की मोटी और मज़बूत दीवारों में तब्दील हो चुका है जिससे हमारे यहाँ सबसे पहले तो शिआ और सुन्नी नाम के मज़बूत आहनी दीवारों वाले ऐसे दो मज़ाहिब वुजूद में आए कि इनको भेद पाना क़ियामत तक शायद मुमकिन न हो, फिर फ़ुक़हा के दरम्यान बाबरकत इख़्तिलाफ़ात ने जब मुख़ालिफ़त की शक्ल इख़्तियार की तो चार ऐसे जुदागाना मसलक वुजूद में आए जिन्होंने मज़ीद मुसलमानों की सलाहियतों को मज़बूत सलाख़ों वाली क़ैद में मुक़ैयद करके रख दिया। इन इख़्तिलाफ़ात की नौइयतों को समझाने और इनकी हक़ीक़त को वाज़ेह करने के लिये फिर जितनी भी जमाअतें वुजूद में आती गईं, उन्होंने भी एक ख़ास वक़्त में पहुँचकर मुख़ालिफ़त का चोला पहन लिया और फिर वही मज़बूत दीवारों वाली क़ैद मुसलमानों की तक़दीर बन गई।

अगर हम मुसलमानों के दरम्यान नफ़रतों को मिटाकर इत्तिहाद की फ़िज़ा देखना चाहते हैं तो हमें इस वक़्त इत्तिहाद से ज़्यादा इख़्तिलाफ़ के आदाब सीखने की सख़्त ज़रूरत है। अगर हम मुसलमानों की सूरते-हाल को बेहतर करना चाहते हैं तो हमें इस बात को ज़रूर समझना होगा कि इख़्तिलाफ़ एक ऐसा टूल है जिसको इस्तेमाल करके हम तरक़्क़ी के रास्ते तय कर सकते हैं, मगर ये उसी वक़्त मुमकिन हो सकता है जबकि हम हर वक़्त इस बात से अलर्ट रहें कि हमारे दरम्यान का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में न बदलने पाए। इसके लिये ज़रूरी है कि हम इख़्तिलाफ़ के कुछ मुसल्लेमा उसूलों की पुख़्तगी के साथ पाबन्दी करें।

(1) किसी भी राय को इख़्तियार करने से पहले इत्मीनान कर लें कि जो राय हम इख़्तियार करने जा रहे हैं वो हमारी समझ के मुताबिक़ दुरुस्त हैं, लेकिन इसमें ग़लती का इमकान भी उतना ही मौजूद है जितना इस राय के सही होने का। अगर हमारी राय ग़लत साबित हो तो फ़ौरन उससे रुजू कर लें। यक़ीन जानिये ये काम है तो बहुत मुश्किल लेकिन इससे रूह को बहुत सुकून मिलेगा।

(2) ज़रूरी नहीं है कि जिस राय को हम दुरुस्त मानते हैं उसको हर हाल में ज़ाहिर करना ज़रूरी ही है। कभी-कभी ये भी होता है कि हमारे सामने वाले की राय भी उतनी ही दुरुस्त है जितनी की हमारी, भले ही चाहे वो आपस में टकराती नज़र आती हो। इस सूरत में हमारे अन्दर इख़्तिलाफ़ के बावजूद बाहम एक-दूसरे के साथ रहने और ख़ुश-उस्लूबी के साथ रहने का हुनर आएगा। और इस प्रैक्टिस को करने का नतीजा ये निकलेगा कि या तो वो अपनी राय से रुजू कर लेगा या हम, या अगर इख़लास कारफ़रमा हो तो फिर दोनों की रायों से एक तीसरी ख़ैर की ऐसी राह हमवार होगी जो दोनों के दरम्यान ताल्लुक़ात को मज़बूत कर देगी।

(3) हमारी राय जो भी हो उसको पेश करने का अन्दाज़ ये तय करेगा कि हमारी बात सुनी जाएगी या रद्द कर दी जाएगी। मुमकिन है हमारी राय बहुत मुफ़ीद हो लेकिन हमारा अन्दाज़े-पेशकश इतना जारिहाना और लहजा इतना तन्ज़िया हो कि हमारी क़ीमती राय को कोई ऐतिबार के क़ाबिल ही न समझे और यूँ लोग हमारी क़ीमती राय से महरूम होकर रह जाएँगे। इसके मुक़ाबले में अगर कोई दूसरा शख़्स एक तबाहकुन राय रखता है लेकिन उसका अन्दाज़े-पेशकश इतना दिलकश है कि वो दिलों पर असर कर जाता है तो लोग उस राय से मुतास्सिर हो जाते हैं। लिहाज़ा याद रखें कि हमारा अपनी राय को पेश करने का अन्दाज़ भी कभी-कभी इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

(4) याद रखिये कि हमारी सही राय की क़द्र तभी की जाएगी जबकि हम दूसरे की ग़लत राय का भी एहतिराम करना जानते हैं। दूसरे की राय का एहतिराम बिलकुल उसी तरह किया जाना चाहिये जिस तरह एक इन्सान का एहतिराम किया जाता है। किसी की राय पर तंज़ करना और उसे हक़ीर समझकर रद्द करना इख़्तिलाफ़ का सलीक़ा नहीं बल्कि मुख़ालिफ़त को जन्म देता है।

(5) रायों का इख़्तिलाफ़ उस वक़्त भी मुख़ालिफ़त का रंग इख़्तियार कर लेता है जबकि हम दूसरे को बहस में हराकर और उसकी ज़बान बन्द करके उसे अपनी राय के मनवाने पर मजबूर करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके हम उस वक़्त तो उससे जीत सकते हैं मगर याद रखें कि वहीँ मुख़ालिफ़त का बीज बोया जा चुका होता है जिसकी फ़सल हमें मुस्तक़बिल क़रीब में ज़रूर काटनी पड़ेगी।

(6) ज़रूरी नहीं है कि दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान उसी वक़्त फ़ैसला करना ज़रूरी है, बल्कि इस सूरत में इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदलने से रोकने का बेहतरीन तरीक़ा ये है कि महफ़िल को ख़ुश-उस्लूबी के साथ बरख़ास्त कर दिया जाए और दोनों को अपनी रायों पर ग़ौर करने का मौक़ा दिया जाए। इस दौरान आपस में एक-दूसरे को समझने का मौक़ा दिया जाए, अगर इसके बावजूद भी कोई फ़ैसला न हो तो दोनों को अपनी राय पर क़ायम रहते हुए दोनों को एक-दूसरे की रायों का एहतिराम करना चाहिये कि ये भी एक तरह के हौसले की बात है। ये कोई मामूली बात नहीं है।

(7) दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान अगर हमारी राय को क़बूले-आम हासिल हो गया हो तो इस पर फ़ख़्र करने और शेख़ी बघारने की ज़रूरत नहीं है कि हमने कोई मैदान जीत लिया है, बल्कि जिसकी राय कमज़ोर पड़ गई है उसकी इज़्ज़ते-नफ़्स का ख़्याल रखें और मुनासिब तरीक़े से उसकी तारीफ़ करें और इस बात के लिये उसको मोटिवेट करें कि वो उन लोगों से बहुत बुलन्द है जो अपनी कोई राय रखते ही नहीं हैं बल्कि दूसरों की रायों पर ही तकिया किये रहते हैं।

(😎 हमारी राय मज़बूत है या कमज़ोर दोनों सूरतों में अपने से दूसरे की राय पर किसी क़िस्म की ग़ीबत या लगाई-बुझाई करके हम इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकते हैं।

(9) अगर इख़्तिलाफ़ दो लोगों के दरम्यान का है तो उसे उसी हद तक रखें वहीँ तक डिस्कशन करें, किसी तीसरे को या तमाम लोगों को उसमें इन्वॉल्व न करें। हमेशा याद रखें कि हमारी तरह और लोग भी अपना एक ज़ेहन व दिमाग़ रखते हैं। हमारी राय के ख़िलाफ़ वाली बात मानकर लोग गुमराह हो जाएँगे इस बात की ज़िम्मेदारी हम पर न तो अल्लाह ने डाली है, न रसूल ने। लिहाज़ा पुर-अम्न रहें और जब मुनासिब मौक़ा मअलूम हो तो अपनी राय का इज़हार कर दें। इससे उम्मीद है कि राय का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में तब्दील नहीं होगा।

(10) इख़्तिलाफ़ किसी से भी हो, किसी भी नौइयत का हो, इससे आपस के ताल्लुक़ात में खिंचाव कम-ज़र्फ़ी की अलामत है। इख़्तिलाफ़ के बावजूद अगर कोई दूसरा फ़रीक़ आपसे मिलना या बात करना चाहता है तो इस बुनियाद पर उसे हारा हुआ समझकर उसे हक़ीर जानना इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

हमेशा याद रखें कि

فَــلَا تَتَّبِعُوا الْہَوٰٓی اَنْ تَعْدِلُوْا

तुम ख़ाहिशे-नफ़्स के पीछे न पड़ो, कहीं ऐसा न हो कि तुम हक़ ही से दूर हो जाओ। (निसा : 135)

लिहाज़ा

فَاعْتَبِرُوْا یٰٓا اُولِی الْاَبْصَارِ

ऐ बसीरत की निगाह रखनेवालो इबरत हासिल करो। (हश्र : 2)

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

दो या दो से ज़्यादा समझदार लोगों का एक साथ रहते हुए रायों में इख़्तिलाफ़ होना उतना ही फ़ितरी है जितना की अल्लाह की इस कायनात में इन्सानों का शक्ल व सूरत में, आदत व अतवार में, रंग और बोली वग़ैरा में मुख़्तलिफ़ होना। हर शख़्स का किसी चीज़ को देखने, परखने, सोचने और उससे नतीजा निकालने का अन्दाज़ दूसरे से मिलते-जुलते (Resemblance) होने के बावजूद भी मुख़्तलिफ़ होता है, क्योंकि हर इन्सान की उम्र, तालीम, तज्रिबा, महारत और समझ का लेवल अलग होता है, इस बुनियाद पर हर शख़्स जुदागाना राय रखता है। घर में क्या पकेगा? घर में किस कम्पनी का सामान आएगा, घर के दरवाज़े किस क़िस्म के और परदे किस रंग के लगेंगे? बेटी या बेटे के रिश्ते में किसको हाँ करना है और किसको ना बोलना है? शादी की तारीख़ क्या हो? बच्चे को किस स्कूल में दाख़िल कराया जाए और किस कोचिंग में तैयारी कराई जाए? वग़ैरा रोज़मर्रा के ऐसे इशूज़ हैं जिनमें सगे रिश्तों के दरम्यान इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। यानी रायों का इख़्तिलाफ़ हमारी समाजी और घरेलु ज़िन्दगी का अहम हिस्सा ही नहीं, बल्कि हमारी तामीर और तरक़्क़ी के लिये बेहद ज़रूरी है। अगर ये इख़्तिलाफ़ न पाया जाए तो इन्सान की ज़िन्दगी में तरक़्क़ी रुक जाएगी।

लेकिन अक्सर देखा ये गया है कि इख़्तिलाफ़ नाम का ये टूल हमारे मुआशरे में अक्सर नुक़सान का बाइस बना हुआ है। इसी इख़्तिलाफ़ नाम के टूल को इस्तेमाल करके दुनिया तरक़्क़ी करती चली जा रही है और हम इस टूल को अपने ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे दरम्यान ये ‘इख़्तिलाफ़’ कब मुख़ालिफ़त में बदलकर दुश्मनी की हद को पहुँच जाता है इसका पता हमें उस वक़्त चलता है जब हम बहुत कुछ गँवा चुके होते हैं, बल्कि अक्सर तो पता भी नहीं चल पाता है और हम इन्तिशार व इफ़्तिराक़ का शिकार होकर तबाह होते रहते हैं। इसीलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहाँ जिन बातों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता था वो आज मुख़ालिफ़त की मोटी और मज़बूत दीवारों में तब्दील हो चुका है जिससे हमारे यहाँ सबसे पहले तो शिआ और सुन्नी नाम के मज़बूत आहनी दीवारों वाले ऐसे दो मज़ाहिब वुजूद में आए कि इनको भेद पाना क़ियामत तक शायद मुमकिन न हो, फिर फ़ुक़हा के दरम्यान बाबरकत इख़्तिलाफ़ात ने जब मुख़ालिफ़त की शक्ल इख़्तियार की तो चार ऐसे जुदागाना मसलक वुजूद में आए जिन्होंने मज़ीद मुसलमानों की सलाहियतों को मज़बूत सलाख़ों वाली क़ैद में मुक़ैयद करके रख दिया। इन इख़्तिलाफ़ात की नौइयतों को समझाने और इनकी हक़ीक़त को वाज़ेह करने के लिये फिर जितनी भी जमाअतें वुजूद में आती गईं, उन्होंने भी एक ख़ास वक़्त में पहुँचकर मुख़ालिफ़त का चोला पहन लिया और फिर वही मज़बूत दीवारों वाली क़ैद मुसलमानों की तक़दीर बन गई।

अगर हम मुसलमानों के दरम्यान नफ़रतों को मिटाकर इत्तिहाद की फ़िज़ा देखना चाहते हैं तो हमें इस वक़्त इत्तिहाद से ज़्यादा इख़्तिलाफ़ के आदाब सीखने की सख़्त ज़रूरत है। अगर हम मुसलमानों की सूरते-हाल को बेहतर करना चाहते हैं तो हमें इस बात को ज़रूर समझना होगा कि इख़्तिलाफ़ एक ऐसा टूल है जिसको इस्तेमाल करके हम तरक़्क़ी के रास्ते तय कर सकते हैं, मगर ये उसी वक़्त मुमकिन हो सकता है जबकि हम हर वक़्त इस बात से अलर्ट रहें कि हमारे दरम्यान का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में न बदलने पाए। इसके लिये ज़रूरी है कि हम इख़्तिलाफ़ के कुछ मुसल्लेमा उसूलों की पुख़्तगी के साथ पाबन्दी करें।

(1) किसी भी राय को इख़्तियार करने से पहले इत्मीनान कर लें कि जो राय हम इख़्तियार करने जा रहे हैं वो हमारी समझ के मुताबिक़ दुरुस्त हैं, लेकिन इसमें ग़लती का इमकान भी उतना ही मौजूद है जितना इस राय के सही होने का। अगर हमारी राय ग़लत साबित हो तो फ़ौरन उससे रुजू कर लें। यक़ीन जानिये ये काम है तो बहुत मुश्किल लेकिन इससे रूह को बहुत सुकून मिलेगा।

(2) ज़रूरी नहीं है कि जिस राय को हम दुरुस्त मानते हैं उसको हर हाल में ज़ाहिर करना ज़रूरी ही है। कभी-कभी ये भी होता है कि हमारे सामने वाले की राय भी उतनी ही दुरुस्त है जितनी की हमारी, भले ही चाहे वो आपस में टकराती नज़र आती हो। इस सूरत में हमारे अन्दर इख़्तिलाफ़ के बावजूद बाहम एक-दूसरे के साथ रहने और ख़ुश-उस्लूबी के साथ रहने का हुनर आएगा। और इस प्रैक्टिस को करने का नतीजा ये निकलेगा कि या तो वो अपनी राय से रुजू कर लेगा या हम, या अगर इख़लास कारफ़रमा हो तो फिर दोनों की रायों से एक तीसरी ख़ैर की ऐसी राह हमवार होगी जो दोनों के दरम्यान ताल्लुक़ात को मज़बूत कर देगी।

(3) हमारी राय जो भी हो उसको पेश करने का अन्दाज़ ये तय करेगा कि हमारी बात सुनी जाएगी या रद्द कर दी जाएगी। मुमकिन है हमारी राय बहुत मुफ़ीद हो लेकिन हमारा अन्दाज़े-पेशकश इतना जारिहाना और लहजा इतना तन्ज़िया हो कि हमारी क़ीमती राय को कोई ऐतिबार के क़ाबिल ही न समझे और यूँ लोग हमारी क़ीमती राय से महरूम होकर रह जाएँगे। इसके मुक़ाबले में अगर कोई दूसरा शख़्स एक तबाहकुन राय रखता है लेकिन उसका अन्दाज़े-पेशकश इतना दिलकश है कि वो दिलों पर असर कर जाता है तो लोग उस राय से मुतास्सिर हो जाते हैं। लिहाज़ा याद रखें कि हमारा अपनी राय को पेश करने का अन्दाज़ भी कभी-कभी इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

(4) याद रखिये कि हमारी सही राय की क़द्र तभी की जाएगी जबकि हम दूसरे की ग़लत राय का भी एहतिराम करना जानते हैं। दूसरे की राय का एहतिराम बिलकुल उसी तरह किया जाना चाहिये जिस तरह एक इन्सान का एहतिराम किया जाता है। किसी की राय पर तंज़ करना और उसे हक़ीर समझकर रद्द करना इख़्तिलाफ़ का सलीक़ा नहीं बल्कि मुख़ालिफ़त को जन्म देता है।

(5) रायों का इख़्तिलाफ़ उस वक़्त भी मुख़ालिफ़त का रंग इख़्तियार कर लेता है जबकि हम दूसरे को बहस में हराकर और उसकी ज़बान बन्द करके उसे अपनी राय के मनवाने पर मजबूर करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके हम उस वक़्त तो उससे जीत सकते हैं मगर याद रखें कि वहीँ मुख़ालिफ़त का बीज बोया जा चुका होता है जिसकी फ़सल हमें मुस्तक़बिल क़रीब में ज़रूर काटनी पड़ेगी।

(6) ज़रूरी नहीं है कि दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान उसी वक़्त फ़ैसला करना ज़रूरी है, बल्कि इस सूरत में इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदलने से रोकने का बेहतरीन तरीक़ा ये है कि महफ़िल को ख़ुश-उस्लूबी के साथ बरख़ास्त कर दिया जाए और दोनों को अपनी रायों पर ग़ौर करने का मौक़ा दिया जाए। इस दौरान आपस में एक-दूसरे को समझने का मौक़ा दिया जाए, अगर इसके बावजूद भी कोई फ़ैसला न हो तो दोनों को अपनी राय पर क़ायम रहते हुए दोनों को एक-दूसरे की रायों का एहतिराम करना चाहिये कि ये भी एक तरह के हौसले की बात है। ये कोई मामूली बात नहीं है।

(7) दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान अगर हमारी राय को क़बूले-आम हासिल हो गया हो तो इस पर फ़ख़्र करने और शेख़ी बघारने की ज़रूरत नहीं है कि हमने कोई मैदान जीत लिया है, बल्कि जिसकी राय कमज़ोर पड़ गई है उसकी इज़्ज़ते-नफ़्स का ख़्याल रखें और मुनासिब तरीक़े से उसकी तारीफ़ करें और इस बात के लिये उसको मोटिवेट करें कि वो उन लोगों से बहुत बुलन्द है जो अपनी कोई राय रखते ही नहीं हैं बल्कि दूसरों की रायों पर ही तकिया किये रहते हैं।

(😎 हमारी राय मज़बूत है या कमज़ोर दोनों सूरतों में अपने से दूसरे की राय पर किसी क़िस्म की ग़ीबत या लगाई-बुझाई करके हम इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकते हैं।

(9) अगर इख़्तिलाफ़ दो लोगों के दरम्यान का है तो उसे उसी हद तक रखें वहीँ तक डिस्कशन करें, किसी तीसरे को या तमाम लोगों को उसमें इन्वॉल्व न करें। हमेशा याद रखें कि हमारी तरह और लोग भी अपना एक ज़ेहन व दिमाग़ रखते हैं। हमारी राय के ख़िलाफ़ वाली बात मानकर लोग गुमराह हो जाएँगे इस बात की ज़िम्मेदारी हम पर न तो अल्लाह ने डाली है, न रसूल ने। लिहाज़ा पुर-अम्न रहें और जब मुनासिब मौक़ा मअलूम हो तो अपनी राय का इज़हार कर दें। इससे उम्मीद है कि राय का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में तब्दील नहीं होगा।

(10) इख़्तिलाफ़ किसी से भी हो, किसी भी नौइयत का हो, इससे आपस के ताल्लुक़ात में खिंचाव कम-ज़र्फ़ी की अलामत है। इख़्तिलाफ़ के बावजूद अगर कोई दूसरा फ़रीक़ आपसे मिलना या बात करना चाहता है तो इस बुनियाद पर उसे हारा हुआ समझकर उसे हक़ीर जानना इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।

हमेशा याद रखें कि

فَــلَا تَتَّبِعُوا الْہَوٰٓی اَنْ تَعْدِلُوْا

तुम ख़ाहिशे-नफ़्स के पीछे न पड़ो, कहीं ऐसा न हो कि तुम हक़ ही से दूर हो जाओ। (निसा : 135)

लिहाज़ा

فَاعْتَبِرُوْا یٰٓا اُولِی الْاَبْصَارِ

ऐ बसीरत की निगाह रखनेवालो इबरत हासिल करो। (हश्र : 2)

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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