आज़ादी और ग़ुलामी
आज़ादी इन्सान की फ़ितरी ख़ाहिश और दिल की आवाज़ है। हर इन्सान आज़ाद रहना चाहता है, आज़ादी से सोचना चाहता है, आज़ादी से खाना और पहनना चाहता है। लेकिन क्या हक़ीक़त में इन्सान आज़ाद है? ज़रा सोचिये
क्या इन्सान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ है?
क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी का तरीक़ा इस्तेमाल करके पैदा हुआ है?
क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी से किसी जगह पैदा होने के लिये आज़ाद है?
क्या इन्सान हमेशा ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?
क्या इन्सान हवा में मौजूद गेसों के अलावा किसी और तरह की गैस इस्तेमाल करके ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?
क्या इन्सान अपने जिस्म के हिस्सों से अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम ले सकता है? मसलन क्या इन्सान कान के बजाय आँख से देखने के लिये आज़ाद है? नाक का काम कान से और हाथ का काम पाँव से लेने के लिये आज़ाद है?
*यक़ीनन नहीं*
इसका मतलब ये हुआ कि इन्सान पैदाइशी तौर पर किसी हस्ती का ग़ुलाम ही पैदा हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे इन्सान के अन्दर शुऊर डेवेलप होता है फ़ितरी तौर पर उसके अन्दर आज़ादी की ख़ाहिश अँगड़ाई लेने लगती है।
जिस हस्ती ने उसे पैदा किया और अपने कुछ ज़ाब्तों का पाबन्द बनाया था उसी हस्ती ने दूसरे तमाम जानवरों को भी पैदा होने, साँस लेने और एक दिन मर जाने के ज़ाब्ते का पाबन्द और ग़ुलाम बनाकर आज़ाद छोड़ दिया।
*लेकिन,*
इन्सान के साथ ऐसा नहीं किया। उसे दूसरे तमाम जानवरों से अलग एक ऊँचा मक़ाम अता किया। और वो मक़ाम था समझ और शुऊर का मक़ाम। ये शुऊर उसे इसलिये दिया गया कि वो सही और ग़लत में तमीज़ करके अपने मक़ाम को बुलन्द कर सके। इन्सान ने जब अपने शुऊर का इस्तेमाल शुरू किया तो वो इस नतीजे पर पहुँचा कि उसे एक जगह मिलकर (समाज बनाकर) रहना चाहिये और उसके लिये कुछ ज़ाब्ते और क़ानून बनाने चाहियें ताकि जानवरों की तरह जो जहाँ चाहे मुँह मारता और लड़ता-भिड़ता न फिरे बल्कि अगर किसी के साथ ग़लत हो रहा है तो उसे इन्साफ़ दिलाया जा सके ताकि समाज में शान्ति और सलामती बरक़रार रहे। अगर ज़िन्दगी की दौड़ में कोई पीछे रह जा रहा है तो उसे सहारा देकर आगे लाया जा सके ताकि समाज में बराबरी क़ायम हो सके और सबको कम से कम (इज़्ज़त और हिफ़ाज़त के साथ जीने, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के) बुनियादी हुक़ूक़ मिलते रहें।
शुऊर के इस तक़ाज़े को पूरा करने के लिये पैदा करनेवाली हस्ती ने इंसान को गाइड किया और बताया कि तुम्हें समाज ही के लिये पैदा किया गया है और तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा करने का उसी तरह इन्तिज़ाम किया है जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिये हवा, पानी और दूसरी ज़रूरतों का। और वो इन्तिज़ाम ये है कि हम मुकम्मल हिदायतनामा (The Complete guidance) भेज रहे हैं अगर इस इस गाइडेंस की पैरवी करते रहोगे तो समाज में शान्ति और सलामती के साथ रहते रहोगे। (क़ुरआन 20 : 123) लेकिन इन्सान ने अपने ऊपर ज़्यादती की और उस गाइडेंस को नज़र-अन्दाज़ करके जो ताक़तवर था उसने ख़ुद ही लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बनाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने मिलकर उस ज़ालिम शख़्स से बढ़कर ताक़त जुटाई और फिर उन्होंने भी दूसरे कुछ लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना लिया।
अब दुनिया में दो ही तरह के ज़ाब्ते हैं
*एक
उस हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्ते जिसका इन्सान पैदाइशी ग़ुलाम है और ज़िन्दगी के बहुत-से मामलों में वो हमेशा उसी का ग़ुलाम है।
*दूसरे
इन्सानों (किसी एक इन्सान के या इन्सानों के गरोहों) के बनाए हुए ज़ाब्ते, जिन्हें किसी तौर पर भी इस बात का हक़ नहीं था कि अपने ही जैसे इन्सानों को ग़ुलाम बनाएँ।
इस तरह हम कह सकते हैं कि
इन्सान पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है और उसे ग़ुलाम रहकर ही ज़िन्दगी गुज़ारनी है।
बस तय ये करना है कि ग़ुलामी करनी किसकी है?
पैदाइशी तौर पर जिसका ग़ुलाम है उसके मोहकम उसूलों और ज़ाब्तों की?
या फिर
अपने ही जैसे इन्सानों के बनाए हुए नाक़िस और टेम्पोरेरी क़ानूनों की?
ग़ौर से देखेंगे तो मालूम होगा कि-
इन्सानों के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ज़्यादा वसीअ-व-कुशादा है और आज़ादी का दायरा बहुत महदूद है। जबकि
पैदा करनेवाली हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ही महदूद और आज़ादी का दायरा बहुत कुशादा है।
ज़िन्दगी का सही और दुरुस्त फ़लसफ़ा यही है कि इन्सान अपनी शुऊरी ज़िन्दगी में उसी हस्ती की ग़ुलामी को तस्लीम करे जिसका वो पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है ताकि हक़ीक़ी आज़ादी से लुत्फ़-अन्दोज़ हो सके और उन अपने ही जैसे इन्सानों की ग़ुलामी से जितना जल्द हो सके दस्त-बरदार हो जाए जिन्होंने उसे आज़ादी का झूटा झाँसा देकर नाहक़ अपना और अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना रखा है।
लिहाज़ा आज़ादी का सही तसव्वुर ये है कि इन्सान बहुत-से इन्सानों की ग़ुलामी से आज़ाद हो लेकिन ये उसी वक़्त मुमकिन है जबकि इन्सान उस हस्ती का ग़ुलाम बनकर रहना तस्लीम कर ले जिसने उसे पैदा किया है।
ये एक सजदा जिसे तू गराँ समझता है।
हज़ार सजदे से देता है आदमी को नजात।।