Aazadi aur Ghulami

Aazadi aur Ghulami

आज़ादी और ग़ुलामी

आज़ादी इन्सान की फ़ितरी ख़ाहिश और दिल की आवाज़ है। हर इन्सान आज़ाद रहना चाहता है, आज़ादी से सोचना चाहता है, आज़ादी से खाना और पहनना चाहता है। लेकिन क्या हक़ीक़त में इन्सान आज़ाद है? ज़रा सोचिये

क्या इन्सान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी का तरीक़ा इस्तेमाल करके पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी से किसी जगह पैदा होने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हमेशा ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हवा में मौजूद गेसों के अलावा किसी और तरह की गैस इस्तेमाल करके ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान अपने जिस्म के हिस्सों से अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम ले सकता है? मसलन क्या इन्सान कान के बजाय आँख से देखने के लिये आज़ाद है? नाक का काम कान से और हाथ का काम पाँव से लेने के लिये आज़ाद है?

*यक़ीनन नहीं*

इसका मतलब ये हुआ कि इन्सान पैदाइशी तौर पर किसी हस्ती का ग़ुलाम ही पैदा हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे इन्सान के अन्दर शुऊर डेवेलप होता है फ़ितरी तौर पर उसके अन्दर आज़ादी की ख़ाहिश अँगड़ाई लेने लगती है।

जिस हस्ती ने उसे पैदा किया और अपने कुछ ज़ाब्तों का पाबन्द बनाया था उसी हस्ती ने दूसरे तमाम जानवरों को भी पैदा होने, साँस लेने और एक दिन मर जाने के ज़ाब्ते का पाबन्द और ग़ुलाम बनाकर आज़ाद छोड़ दिया।

*लेकिन,*

इन्सान के साथ ऐसा नहीं किया। उसे दूसरे तमाम जानवरों से अलग एक ऊँचा मक़ाम अता किया। और वो मक़ाम था समझ और शुऊर का मक़ाम। ये शुऊर उसे इसलिये दिया गया कि वो सही और ग़लत में तमीज़ करके अपने मक़ाम को बुलन्द कर सके। इन्सान ने जब अपने शुऊर का इस्तेमाल शुरू किया तो वो इस नतीजे पर पहुँचा कि उसे एक जगह मिलकर (समाज बनाकर) रहना चाहिये और उसके लिये कुछ ज़ाब्ते और क़ानून बनाने चाहियें ताकि जानवरों की तरह जो जहाँ चाहे मुँह मारता और लड़ता-भिड़ता न फिरे बल्कि अगर किसी के साथ ग़लत हो रहा है तो उसे इन्साफ़ दिलाया जा सके ताकि समाज में शान्ति और सलामती बरक़रार रहे। अगर ज़िन्दगी की दौड़ में कोई पीछे रह जा रहा है तो उसे सहारा देकर आगे लाया जा सके ताकि समाज में बराबरी क़ायम हो सके और सबको कम से कम (इज़्ज़त और हिफ़ाज़त के साथ जीने, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के) बुनियादी हुक़ूक़ मिलते रहें।

शुऊर के इस तक़ाज़े को पूरा करने के लिये पैदा करनेवाली हस्ती ने इंसान को गाइड किया और बताया कि तुम्हें समाज ही के लिये पैदा किया गया है और तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा करने का उसी तरह इन्तिज़ाम किया है जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिये हवा, पानी और दूसरी ज़रूरतों का। और वो इन्तिज़ाम ये है कि हम मुकम्मल हिदायतनामा (The Complete guidance) भेज रहे हैं अगर इस इस गाइडेंस की पैरवी करते रहोगे तो समाज में शान्ति और सलामती के साथ रहते रहोगे। (क़ुरआन 20 : 123) लेकिन इन्सान ने अपने ऊपर ज़्यादती की और उस गाइडेंस को नज़र-अन्दाज़ करके जो ताक़तवर था उसने ख़ुद ही लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बनाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने मिलकर उस ज़ालिम शख़्स से बढ़कर ताक़त जुटाई और फिर उन्होंने भी दूसरे कुछ लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना लिया।

अब दुनिया में दो ही तरह के ज़ाब्ते हैं

*एक 😘 उस हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्ते जिसका इन्सान पैदाइशी ग़ुलाम है और ज़िन्दगी के बहुत-से मामलों में वो हमेशा उसी का ग़ुलाम है।

*दूसरे 😘 इन्सानों (किसी एक इन्सान के या इन्सानों के गरोहों) के बनाए हुए ज़ाब्ते, जिन्हें किसी तौर पर भी इस बात का हक़ नहीं था कि अपने ही जैसे इन्सानों को ग़ुलाम बनाएँ।

इस तरह हम कह सकते हैं कि

इन्सान पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है और उसे ग़ुलाम रहकर ही ज़िन्दगी गुज़ारनी है।

बस तय ये करना है कि ग़ुलामी करनी किसकी है?

पैदाइशी तौर पर जिसका ग़ुलाम है उसके मोहकम उसूलों और ज़ाब्तों की?

या फिर

अपने ही जैसे इन्सानों के बनाए हुए नाक़िस और टेम्पोरेरी क़ानूनों की?

ग़ौर से देखेंगे तो मालूम होगा कि-

इन्सानों के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ज़्यादा वसीअ-व-कुशादा है और आज़ादी का दायरा बहुत महदूद है। जबकि

पैदा करनेवाली हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ही महदूद और आज़ादी का दायरा बहुत कुशादा है।

ज़िन्दगी का सही और दुरुस्त फ़लसफ़ा यही है कि इन्सान अपनी शुऊरी ज़िन्दगी में उसी हस्ती की ग़ुलामी को तस्लीम करे जिसका वो पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है ताकि हक़ीक़ी आज़ादी से लुत्फ़-अन्दोज़ हो सके और उन अपने ही जैसे इन्सानों की ग़ुलामी से जितना जल्द हो सके दस्त-बरदार हो जाए जिन्होंने उसे आज़ादी का झूटा झाँसा देकर नाहक़ अपना और अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना रखा है।

लिहाज़ा आज़ादी का सही तसव्वुर ये है कि इन्सान बहुत-से इन्सानों की ग़ुलामी से आज़ाद हो लेकिन ये उसी वक़्त मुमकिन है जबकि इन्सान उस हस्ती का ग़ुलाम बनकर रहना तस्लीम कर ले जिसने उसे पैदा किया है।

ये एक सजदा जिसे तू गराँ समझता है।

हज़ार सजदे से देता है आदमी को नजात।।

آزادی انسان کی فطری خواہش اور دل کی صدا ہے۔
ہر انسان آزاد رہنا چاہتا ہے، آزادی سے سوچنا چاہتا ہے، آزادی سے کھانا اور پہننا چاہتا ہے۔

لیکن سوال یہ ہے: کیا حقیقت میں انسان آزاد ہے؟
ذرا سوچیے…

کیا انسان اپنی مرضی سے پیدا ہوا ہے؟
کیا انسان نے اپنی مرضی کا طریقہ استعمال کر کے خود کو وجود میں لایا ہے؟
کیا انسان اپنی مرضی سے کسی خاص جگہ پیدا ہونے کے لیے آزاد ہے؟
کیا انسان ہمیشہ زندہ رہنے کے لیے آزاد ہے؟
کیا انسان ہوا میں موجود گیسوں کے علاوہ کسی اور قسم کی گیس استعمال کر کے زندہ رہنے کے قابل ہے؟
کیا انسان اپنے جسم کے اعضا سے اپنی مرضی کے مطابق کام لے سکتا ہے؟
مثلاً کیا انسان آنکھ کی بجائے کان سے دیکھنے کے لیے آزاد ہے؟ یا ناک کا کام کان سے اور ہاتھ کا کام پاؤں سے لینے کے لیے؟

یقیناً نہیں۔

اس کا مطلب یہ ہے کہ انسان پیدائشی طور پر ایک ہستی کا غلام بنا کر پیدا کیا گیا ہے۔
لیکن جیسے جیسے اس کے اندر شعور پروان چڑھتا ہے، فطری طور پر اس کے اندر آزادی کی خواہش انگڑائی لینے لگتی ہے۔

جس ہستی نے انسان کو پیدا کیا اور اپنی مقرر کردہ کچھ حدود و ضوابط کا پابند بنایا،
اسی نے دیگر تمام جانداروں کو بھی پیدا کیا اور انہیں محض پیدا ہونے، سانس لینے اور ایک دن مر جانے کے نظام کا پابند بنا کر آزاد چھوڑ دیا۔

لیکن،
انسان کے ساتھ ایسا نہیں کیا گیا۔
اسے باقی تمام مخلوقات سے ممتاز کر کے شعور و فہم کا بلند مقام عطا کیا گیا۔
یہ شعور اس لیے دیا گیا تاکہ وہ صحیح اور غلط میں تمیز کر کے اپنے مقام کو بلند کر سکے۔

جب انسان نے شعور کا استعمال شروع کیا تو وہ اس نتیجے پر پہنچا کہ
اسے مل کر (ایک معاشرہ بنا کر) جینا چاہیے،
اور اس کے لیے کچھ ضابطے اور قوانین ہونے چاہییں،
تاکہ انسان جانوروں کی طرح جہاں چاہے منہ مارے اور لڑے جھگڑے نہ پھرے،
بلکہ اگر کسی پر ظلم ہو رہا ہے تو اُسے انصاف مل سکے،
تاکہ معاشرے میں امن و امان قائم رہ سکے۔

اگر زندگی کی دوڑ میں کوئی پیچھے رہ جائے تو اُسے سہارا دے کر آگے لایا جا سکے،
تاکہ برابری کا ماحول پیدا ہو اور ہر فرد کو کم از کم عزت، تحفظ، ترقی اور آگے بڑھنے کے بنیادی حقوق حاصل رہیں۔

شعور کے اسی تقاضے کو پورا کرنے کے لیے پیدا کرنے والی ہستی نے انسان کو رہنمائی دی
اور بتایا کہ تمہیں معاشرتی زندگی ہی کے لیے پیدا کیا گیا ہے،
اور تمہاری اس ضرورت کا انتظام بھی اسی طرح کیا ہے جیسے سانس لینے کے لیے ہوا، پینے کے لیے پانی اور دوسری ضروریات مہیا کی ہیں۔

اور وہ انتظام یہ ہے:
ہم تمہارے لیے مکمل ہدایت نامہ (Complete Guidance) بھیج رہے ہیں۔
اگر تم اس رہنمائی کی پیروی کرو گے، تو معاشرے میں سکون اور سلامتی کے ساتھ رہو گے۔
(ملاحظہ ہو: سورۂ طٰہٰ، آیت 123)

لیکن انسان نے اپنے اوپر زیادتی کی،
اور اس رہنمائی کو نظر انداز کر کے جو طاقتور تھا،
اس نے دوسروں کو اپنے ضوابط کا غلام بنانا شروع کر دیا۔

پھر کچھ اور لوگ جمع ہوئے اور اس ظالم سے زیادہ طاقت حاصل کی،
تو انہوں نے بھی دوسرے انسانوں کو اپنے بنائے ہوئے ضوابط کا غلام بنا لیا۔

اب دنیا میں صرف دو طرح کے ضابطے رہ گئے ہیں:

ایک:
اس ہستی کے بنائے ہوئے ضابطے جس کا انسان پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور زندگی کے بیشمار معاملات میں وہ ہمیشہ اسی کا محتاج ہے۔

دوسرے:
انسانوں (یا انسانوں کے گروہوں) کے بنائے ہوئے ضابطے،
جنہیں کسی طور پر بھی یہ حق حاصل نہیں تھا کہ وہ اپنے جیسے دوسرے انسانوں کو غلام بنائیں۔

اس طرح ہم کہہ سکتے ہیں کہ:
انسان پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور اُسے غلام رہ کر ہی زندگی گزارنی ہے۔

بس فیصلہ یہ کرنا ہے کہ غلامی کس کی کرنی ہے؟

اس کی، جس کا وہ فطری اور پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور جس کے اصول ہمیشہ مضبوط، عادل اور لازوال ہیں؟

یا پھر
اپنے ہی جیسے انسانوں کے بنائے ہوئے
ناقص اور وقتی قوانین کی؟

اگر ہم غور کریں تو معلوم ہو گا کہ:
انسانوں کے بنائے ہوئے قوانین میں غلامی کا دائرہ بہت وسیع، اور آزادی کا دائرہ بہت محدود ہے۔
جبکہ
پیدا کرنے والی ہستی کے بنائے ہوئے ضوابط میں غلامی کا دائرہ نہایت محدود اور آزادی کا دائرہ بے حد وسیع ہے۔

زندگی کا صحیح اور معتدل فلسفہ یہی ہے کہ:
انسان اپنی باشعور زندگی میں اسی ہستی کی غلامی کو تسلیم کرے جس کا وہ پیدائشی غلام ہے،
تاکہ حقیقی آزادی سے لطف اندوز ہو سکے،
اور ان انسانوں کی غلامی سے جتنا جلد ممکن ہو دستبردار ہو جائے
جنہوں نے اُسے آزادی کا جھوٹا وعدہ دے کر
اپنے قوانین اور طاقت کا غلام بنا رکھا ہے۔

لہٰذا، آزادی کا درست تصور یہ ہے کہ انسان بہت سے انسانوں کی غلامی سے آزاد ہو،
اور یہ صرف اُس وقت ممکن ہے
جب وہ پیدا کرنے والی ہستی کی بندگی کو صدقِ دل سے تسلیم کر لے۔

یہ ایک سجدہ جسے تُو گراں سمجھتا ہے،
ہزار سجدے سے دیتا ہے آدمی کو نجات۔

Hindi

आज़ादी और ग़ुलामी

आज़ादी इन्सान की फ़ितरी ख़ाहिश और दिल की आवाज़ है। हर इन्सान आज़ाद रहना चाहता है, आज़ादी से सोचना चाहता है, आज़ादी से खाना और पहनना चाहता है। लेकिन क्या हक़ीक़त में इन्सान आज़ाद है? ज़रा सोचिये

क्या इन्सान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी का तरीक़ा इस्तेमाल करके पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी से किसी जगह पैदा होने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हमेशा ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हवा में मौजूद गेसों के अलावा किसी और तरह की गैस इस्तेमाल करके ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान अपने जिस्म के हिस्सों से अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम ले सकता है? मसलन क्या इन्सान कान के बजाय आँख से देखने के लिये आज़ाद है? नाक का काम कान से और हाथ का काम पाँव से लेने के लिये आज़ाद है?

*यक़ीनन नहीं*

इसका मतलब ये हुआ कि इन्सान पैदाइशी तौर पर किसी हस्ती का ग़ुलाम ही पैदा हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे इन्सान के अन्दर शुऊर डेवेलप होता है फ़ितरी तौर पर उसके अन्दर आज़ादी की ख़ाहिश अँगड़ाई लेने लगती है।

जिस हस्ती ने उसे पैदा किया और अपने कुछ ज़ाब्तों का पाबन्द बनाया था उसी हस्ती ने दूसरे तमाम जानवरों को भी पैदा होने, साँस लेने और एक दिन मर जाने के ज़ाब्ते का पाबन्द और ग़ुलाम बनाकर आज़ाद छोड़ दिया।

*लेकिन,*

इन्सान के साथ ऐसा नहीं किया। उसे दूसरे तमाम जानवरों से अलग एक ऊँचा मक़ाम अता किया। और वो मक़ाम था समझ और शुऊर का मक़ाम। ये शुऊर उसे इसलिये दिया गया कि वो सही और ग़लत में तमीज़ करके अपने मक़ाम को बुलन्द कर सके। इन्सान ने जब अपने शुऊर का इस्तेमाल शुरू किया तो वो इस नतीजे पर पहुँचा कि उसे एक जगह मिलकर (समाज बनाकर) रहना चाहिये और उसके लिये कुछ ज़ाब्ते और क़ानून बनाने चाहियें ताकि जानवरों की तरह जो जहाँ चाहे मुँह मारता और लड़ता-भिड़ता न फिरे बल्कि अगर किसी के साथ ग़लत हो रहा है तो उसे इन्साफ़ दिलाया जा सके ताकि समाज में शान्ति और सलामती बरक़रार रहे। अगर ज़िन्दगी की दौड़ में कोई पीछे रह जा रहा है तो उसे सहारा देकर आगे लाया जा सके ताकि समाज में बराबरी क़ायम हो सके और सबको कम से कम (इज़्ज़त और हिफ़ाज़त के साथ जीने, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के) बुनियादी हुक़ूक़ मिलते रहें।

शुऊर के इस तक़ाज़े को पूरा करने के लिये पैदा करनेवाली हस्ती ने इंसान को गाइड किया और बताया कि तुम्हें समाज ही के लिये पैदा किया गया है और तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा करने का उसी तरह इन्तिज़ाम किया है जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिये हवा, पानी और दूसरी ज़रूरतों का। और वो इन्तिज़ाम ये है कि हम मुकम्मल हिदायतनामा (The Complete guidance) भेज रहे हैं अगर इस इस गाइडेंस की पैरवी करते रहोगे तो समाज में शान्ति और सलामती के साथ रहते रहोगे। (क़ुरआन 20 : 123) लेकिन इन्सान ने अपने ऊपर ज़्यादती की और उस गाइडेंस को नज़र-अन्दाज़ करके जो ताक़तवर था उसने ख़ुद ही लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बनाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने मिलकर उस ज़ालिम शख़्स से बढ़कर ताक़त जुटाई और फिर उन्होंने भी दूसरे कुछ लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना लिया।

अब दुनिया में दो ही तरह के ज़ाब्ते हैं

*एक 😘 उस हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्ते जिसका इन्सान पैदाइशी ग़ुलाम है और ज़िन्दगी के बहुत-से मामलों में वो हमेशा उसी का ग़ुलाम है।

*दूसरे 😘 इन्सानों (किसी एक इन्सान के या इन्सानों के गरोहों) के बनाए हुए ज़ाब्ते, जिन्हें किसी तौर पर भी इस बात का हक़ नहीं था कि अपने ही जैसे इन्सानों को ग़ुलाम बनाएँ।

इस तरह हम कह सकते हैं कि

इन्सान पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है और उसे ग़ुलाम रहकर ही ज़िन्दगी गुज़ारनी है।

बस तय ये करना है कि ग़ुलामी करनी किसकी है?

पैदाइशी तौर पर जिसका ग़ुलाम है उसके मोहकम उसूलों और ज़ाब्तों की?

या फिर

अपने ही जैसे इन्सानों के बनाए हुए नाक़िस और टेम्पोरेरी क़ानूनों की?

ग़ौर से देखेंगे तो मालूम होगा कि-

इन्सानों के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ज़्यादा वसीअ-व-कुशादा है और आज़ादी का दायरा बहुत महदूद है। जबकि

पैदा करनेवाली हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ही महदूद और आज़ादी का दायरा बहुत कुशादा है।

ज़िन्दगी का सही और दुरुस्त फ़लसफ़ा यही है कि इन्सान अपनी शुऊरी ज़िन्दगी में उसी हस्ती की ग़ुलामी को तस्लीम करे जिसका वो पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है ताकि हक़ीक़ी आज़ादी से लुत्फ़-अन्दोज़ हो सके और उन अपने ही जैसे इन्सानों की ग़ुलामी से जितना जल्द हो सके दस्त-बरदार हो जाए जिन्होंने उसे आज़ादी का झूटा झाँसा देकर नाहक़ अपना और अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना रखा है।

लिहाज़ा आज़ादी का सही तसव्वुर ये है कि इन्सान बहुत-से इन्सानों की ग़ुलामी से आज़ाद हो लेकिन ये उसी वक़्त मुमकिन है जबकि इन्सान उस हस्ती का ग़ुलाम बनकर रहना तस्लीम कर ले जिसने उसे पैदा किया है।

ये एक सजदा जिसे तू गराँ समझता है।

हज़ार सजदे से देता है आदमी को नजात।।

آزادی انسان کی فطری خواہش اور دل کی صدا ہے۔
ہر انسان آزاد رہنا چاہتا ہے، آزادی سے سوچنا چاہتا ہے، آزادی سے کھانا اور پہننا چاہتا ہے۔

لیکن سوال یہ ہے: کیا حقیقت میں انسان آزاد ہے؟
ذرا سوچیے…

کیا انسان اپنی مرضی سے پیدا ہوا ہے؟
کیا انسان نے اپنی مرضی کا طریقہ استعمال کر کے خود کو وجود میں لایا ہے؟
کیا انسان اپنی مرضی سے کسی خاص جگہ پیدا ہونے کے لیے آزاد ہے؟
کیا انسان ہمیشہ زندہ رہنے کے لیے آزاد ہے؟
کیا انسان ہوا میں موجود گیسوں کے علاوہ کسی اور قسم کی گیس استعمال کر کے زندہ رہنے کے قابل ہے؟
کیا انسان اپنے جسم کے اعضا سے اپنی مرضی کے مطابق کام لے سکتا ہے؟
مثلاً کیا انسان آنکھ کی بجائے کان سے دیکھنے کے لیے آزاد ہے؟ یا ناک کا کام کان سے اور ہاتھ کا کام پاؤں سے لینے کے لیے؟

یقیناً نہیں۔

اس کا مطلب یہ ہے کہ انسان پیدائشی طور پر ایک ہستی کا غلام بنا کر پیدا کیا گیا ہے۔
لیکن جیسے جیسے اس کے اندر شعور پروان چڑھتا ہے، فطری طور پر اس کے اندر آزادی کی خواہش انگڑائی لینے لگتی ہے۔

جس ہستی نے انسان کو پیدا کیا اور اپنی مقرر کردہ کچھ حدود و ضوابط کا پابند بنایا،
اسی نے دیگر تمام جانداروں کو بھی پیدا کیا اور انہیں محض پیدا ہونے، سانس لینے اور ایک دن مر جانے کے نظام کا پابند بنا کر آزاد چھوڑ دیا۔

لیکن،
انسان کے ساتھ ایسا نہیں کیا گیا۔
اسے باقی تمام مخلوقات سے ممتاز کر کے شعور و فہم کا بلند مقام عطا کیا گیا۔
یہ شعور اس لیے دیا گیا تاکہ وہ صحیح اور غلط میں تمیز کر کے اپنے مقام کو بلند کر سکے۔

جب انسان نے شعور کا استعمال شروع کیا تو وہ اس نتیجے پر پہنچا کہ
اسے مل کر (ایک معاشرہ بنا کر) جینا چاہیے،
اور اس کے لیے کچھ ضابطے اور قوانین ہونے چاہییں،
تاکہ انسان جانوروں کی طرح جہاں چاہے منہ مارے اور لڑے جھگڑے نہ پھرے،
بلکہ اگر کسی پر ظلم ہو رہا ہے تو اُسے انصاف مل سکے،
تاکہ معاشرے میں امن و امان قائم رہ سکے۔

اگر زندگی کی دوڑ میں کوئی پیچھے رہ جائے تو اُسے سہارا دے کر آگے لایا جا سکے،
تاکہ برابری کا ماحول پیدا ہو اور ہر فرد کو کم از کم عزت، تحفظ، ترقی اور آگے بڑھنے کے بنیادی حقوق حاصل رہیں۔

شعور کے اسی تقاضے کو پورا کرنے کے لیے پیدا کرنے والی ہستی نے انسان کو رہنمائی دی
اور بتایا کہ تمہیں معاشرتی زندگی ہی کے لیے پیدا کیا گیا ہے،
اور تمہاری اس ضرورت کا انتظام بھی اسی طرح کیا ہے جیسے سانس لینے کے لیے ہوا، پینے کے لیے پانی اور دوسری ضروریات مہیا کی ہیں۔

اور وہ انتظام یہ ہے:
ہم تمہارے لیے مکمل ہدایت نامہ (Complete Guidance) بھیج رہے ہیں۔
اگر تم اس رہنمائی کی پیروی کرو گے، تو معاشرے میں سکون اور سلامتی کے ساتھ رہو گے۔
(ملاحظہ ہو: سورۂ طٰہٰ، آیت 123)

لیکن انسان نے اپنے اوپر زیادتی کی،
اور اس رہنمائی کو نظر انداز کر کے جو طاقتور تھا،
اس نے دوسروں کو اپنے ضوابط کا غلام بنانا شروع کر دیا۔

پھر کچھ اور لوگ جمع ہوئے اور اس ظالم سے زیادہ طاقت حاصل کی،
تو انہوں نے بھی دوسرے انسانوں کو اپنے بنائے ہوئے ضوابط کا غلام بنا لیا۔

اب دنیا میں صرف دو طرح کے ضابطے رہ گئے ہیں:

ایک:
اس ہستی کے بنائے ہوئے ضابطے جس کا انسان پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور زندگی کے بیشمار معاملات میں وہ ہمیشہ اسی کا محتاج ہے۔

دوسرے:
انسانوں (یا انسانوں کے گروہوں) کے بنائے ہوئے ضابطے،
جنہیں کسی طور پر بھی یہ حق حاصل نہیں تھا کہ وہ اپنے جیسے دوسرے انسانوں کو غلام بنائیں۔

اس طرح ہم کہہ سکتے ہیں کہ:
انسان پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور اُسے غلام رہ کر ہی زندگی گزارنی ہے۔

بس فیصلہ یہ کرنا ہے کہ غلامی کس کی کرنی ہے؟

اس کی، جس کا وہ فطری اور پیدائشی طور پر غلام ہے،
اور جس کے اصول ہمیشہ مضبوط، عادل اور لازوال ہیں؟

یا پھر
اپنے ہی جیسے انسانوں کے بنائے ہوئے
ناقص اور وقتی قوانین کی؟

اگر ہم غور کریں تو معلوم ہو گا کہ:
انسانوں کے بنائے ہوئے قوانین میں غلامی کا دائرہ بہت وسیع، اور آزادی کا دائرہ بہت محدود ہے۔
جبکہ
پیدا کرنے والی ہستی کے بنائے ہوئے ضوابط میں غلامی کا دائرہ نہایت محدود اور آزادی کا دائرہ بے حد وسیع ہے۔

زندگی کا صحیح اور معتدل فلسفہ یہی ہے کہ:
انسان اپنی باشعور زندگی میں اسی ہستی کی غلامی کو تسلیم کرے جس کا وہ پیدائشی غلام ہے،
تاکہ حقیقی آزادی سے لطف اندوز ہو سکے،
اور ان انسانوں کی غلامی سے جتنا جلد ممکن ہو دستبردار ہو جائے
جنہوں نے اُسے آزادی کا جھوٹا وعدہ دے کر
اپنے قوانین اور طاقت کا غلام بنا رکھا ہے۔

لہٰذا، آزادی کا درست تصور یہ ہے کہ انسان بہت سے انسانوں کی غلامی سے آزاد ہو،
اور یہ صرف اُس وقت ممکن ہے
جب وہ پیدا کرنے والی ہستی کی بندگی کو صدقِ دل سے تسلیم کر لے۔

یہ ایک سجدہ جسے تُو گراں سمجھتا ہے،
ہزار سجدے سے دیتا ہے آدمی کو نجات۔

आज़ादी और ग़ुलामी

आज़ादी इन्सान की फ़ितरी ख़ाहिश और दिल की आवाज़ है। हर इन्सान आज़ाद रहना चाहता है, आज़ादी से सोचना चाहता है, आज़ादी से खाना और पहनना चाहता है। लेकिन क्या हक़ीक़त में इन्सान आज़ाद है? ज़रा सोचिये

क्या इन्सान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी का तरीक़ा इस्तेमाल करके पैदा हुआ है?

क्या इन्सान अपनी मर्ज़ी से किसी जगह पैदा होने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हमेशा ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान हवा में मौजूद गेसों के अलावा किसी और तरह की गैस इस्तेमाल करके ज़िन्दा रहने के लिये आज़ाद है?

क्या इन्सान अपने जिस्म के हिस्सों से अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ काम ले सकता है? मसलन क्या इन्सान कान के बजाय आँख से देखने के लिये आज़ाद है? नाक का काम कान से और हाथ का काम पाँव से लेने के लिये आज़ाद है?

*यक़ीनन नहीं*

इसका मतलब ये हुआ कि इन्सान पैदाइशी तौर पर किसी हस्ती का ग़ुलाम ही पैदा हुआ है, लेकिन जैसे-जैसे इन्सान के अन्दर शुऊर डेवेलप होता है फ़ितरी तौर पर उसके अन्दर आज़ादी की ख़ाहिश अँगड़ाई लेने लगती है।

जिस हस्ती ने उसे पैदा किया और अपने कुछ ज़ाब्तों का पाबन्द बनाया था उसी हस्ती ने दूसरे तमाम जानवरों को भी पैदा होने, साँस लेने और एक दिन मर जाने के ज़ाब्ते का पाबन्द और ग़ुलाम बनाकर आज़ाद छोड़ दिया।

*लेकिन,*

इन्सान के साथ ऐसा नहीं किया। उसे दूसरे तमाम जानवरों से अलग एक ऊँचा मक़ाम अता किया। और वो मक़ाम था समझ और शुऊर का मक़ाम। ये शुऊर उसे इसलिये दिया गया कि वो सही और ग़लत में तमीज़ करके अपने मक़ाम को बुलन्द कर सके। इन्सान ने जब अपने शुऊर का इस्तेमाल शुरू किया तो वो इस नतीजे पर पहुँचा कि उसे एक जगह मिलकर (समाज बनाकर) रहना चाहिये और उसके लिये कुछ ज़ाब्ते और क़ानून बनाने चाहियें ताकि जानवरों की तरह जो जहाँ चाहे मुँह मारता और लड़ता-भिड़ता न फिरे बल्कि अगर किसी के साथ ग़लत हो रहा है तो उसे इन्साफ़ दिलाया जा सके ताकि समाज में शान्ति और सलामती बरक़रार रहे। अगर ज़िन्दगी की दौड़ में कोई पीछे रह जा रहा है तो उसे सहारा देकर आगे लाया जा सके ताकि समाज में बराबरी क़ायम हो सके और सबको कम से कम (इज़्ज़त और हिफ़ाज़त के साथ जीने, आगे बढ़ने और तरक़्क़ी करने के) बुनियादी हुक़ूक़ मिलते रहें।

शुऊर के इस तक़ाज़े को पूरा करने के लिये पैदा करनेवाली हस्ती ने इंसान को गाइड किया और बताया कि तुम्हें समाज ही के लिये पैदा किया गया है और तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा करने का उसी तरह इन्तिज़ाम किया है जिस तरह ज़िन्दा रहने के लिये हवा, पानी और दूसरी ज़रूरतों का। और वो इन्तिज़ाम ये है कि हम मुकम्मल हिदायतनामा (The Complete guidance) भेज रहे हैं अगर इस इस गाइडेंस की पैरवी करते रहोगे तो समाज में शान्ति और सलामती के साथ रहते रहोगे। (क़ुरआन 20 : 123) लेकिन इन्सान ने अपने ऊपर ज़्यादती की और उस गाइडेंस को नज़र-अन्दाज़ करके जो ताक़तवर था उसने ख़ुद ही लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बनाना शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने मिलकर उस ज़ालिम शख़्स से बढ़कर ताक़त जुटाई और फिर उन्होंने भी दूसरे कुछ लोगों को अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना लिया।

अब दुनिया में दो ही तरह के ज़ाब्ते हैं

*एक 😘 उस हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्ते जिसका इन्सान पैदाइशी ग़ुलाम है और ज़िन्दगी के बहुत-से मामलों में वो हमेशा उसी का ग़ुलाम है।

*दूसरे 😘 इन्सानों (किसी एक इन्सान के या इन्सानों के गरोहों) के बनाए हुए ज़ाब्ते, जिन्हें किसी तौर पर भी इस बात का हक़ नहीं था कि अपने ही जैसे इन्सानों को ग़ुलाम बनाएँ।

इस तरह हम कह सकते हैं कि

इन्सान पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है और उसे ग़ुलाम रहकर ही ज़िन्दगी गुज़ारनी है।

बस तय ये करना है कि ग़ुलामी करनी किसकी है?

पैदाइशी तौर पर जिसका ग़ुलाम है उसके मोहकम उसूलों और ज़ाब्तों की?

या फिर

अपने ही जैसे इन्सानों के बनाए हुए नाक़िस और टेम्पोरेरी क़ानूनों की?

ग़ौर से देखेंगे तो मालूम होगा कि-

इन्सानों के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ज़्यादा वसीअ-व-कुशादा है और आज़ादी का दायरा बहुत महदूद है। जबकि

पैदा करनेवाली हस्ती के बनाए हुए ज़ाब्तों में ग़ुलामी का दायरा बहुत ही महदूद और आज़ादी का दायरा बहुत कुशादा है।

ज़िन्दगी का सही और दुरुस्त फ़लसफ़ा यही है कि इन्सान अपनी शुऊरी ज़िन्दगी में उसी हस्ती की ग़ुलामी को तस्लीम करे जिसका वो पैदाइशी तौर पर ग़ुलाम है ताकि हक़ीक़ी आज़ादी से लुत्फ़-अन्दोज़ हो सके और उन अपने ही जैसे इन्सानों की ग़ुलामी से जितना जल्द हो सके दस्त-बरदार हो जाए जिन्होंने उसे आज़ादी का झूटा झाँसा देकर नाहक़ अपना और अपने ज़ाब्तों का ग़ुलाम बना रखा है।

लिहाज़ा आज़ादी का सही तसव्वुर ये है कि इन्सान बहुत-से इन्सानों की ग़ुलामी से आज़ाद हो लेकिन ये उसी वक़्त मुमकिन है जबकि इन्सान उस हस्ती का ग़ुलाम बनकर रहना तस्लीम कर ले जिसने उसे पैदा किया है।

ये एक सजदा जिसे तू गराँ समझता है।

हज़ार सजदे से देता है आदमी को नजात।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

2 mins to read

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

2 mins to read