हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के आग में डाले जाने और फिर आग के गुलज़ार बन जाने का क़िस्सा तो ख़ूब सुनाया जाता है मगर ये बात यकसर नज़र-अन्दाज़ कर दी जाती है कि हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का मुल्क के हुक्मराँ के साथ असल झगड़ा इस बात पर था कि मुल्क की असल बादशाही किसकी है? उस ख़ालिक़ की जिसने इस पूरी कायनात को बनाया? या उसकी जो ख़ुद दूसरी मख़लूक़ात की तरह उस ख़ालिक़ की मख़लूक़ है?
हम सबको ये तो बताया गया है कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) इतने हसीन व जमील थे कि उन्हें देखते ही मिस्र की बहुत-सी औरतों ने अपने हाथ काट लिये थे, मगर हमें ये नहीं बताया गया कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने मुल्क को क़हत (सूखा) के दौरान एक बेहतरीन मुआशी तदबीर के ज़रिए न सिर्फ़ अपने मुल्क के हज़ारों लोगों को भूखों मरने से बचा लिया था, बल्कि आस-पास के लोगों के लिये भी रिज़्क़ का बन्दोबस्त कर दिया था।
हम सबको ये तो बताया गया कि हज़रत सुलैमान (अलैहिस्सलाम) की बादशाहत में न सिर्फ़ ये कि जिन्नात उनके मातहत थे बल्कि चरिन्द और परिन्द भी उनके मातहत थे और उनकी बोलियाँ भी वो जानते थे। मगर हमें ये नहीं बताया गया कि हज़रत सुलैमान (अलैहिस्सलाम) कितने ज़बरदस्त सियासत-दाँ थे कि उन्होंने अपने मुल्क के अन्दर एक ज़बरदस्त इन्तिज़ाम करके न सिर्फ़ वहाँ के लोगों को ख़ुशहाल बनाया बल्कि मलिका-बिल्क़ीस के ज़रख़ेज़ मुल्क (यमन) के साथ मुआहिदा [Bileteral Agreements] करके एक-दूसरे की इकोनॉमी को इस क़द्र ज़बरदस्त तक़वियत पहुँचाई कि आज की तरक़्क़ीयाफ़्ता दुनिया में भी इसकी मिसालें कम ही देखने को मिलती हैं।
हम सबको ये तो बताया जाता है कि हज़रत मूसा ने फ़िरऔन के दरबार में अल्लाह के हुक्म से असा को अज़्दहा बनाकर जादूगरों के जादू को मात दे दी थी और इस तरह सबको हैरत में डाल दिया था, यहाँ तक कि जादूगर इस अमल को देखकर ईमान ले आए थे। मगर ये बात कम ही डिसकस की जाती है कि किस सियासी ज़हानत और महारत के साथ और किस क़ाइदाना सलाहियत और हौसले के साथ बरसों की ग़ुलामी की शिकार क़ौम को ज़ालिम व जाबिर हुक्मराँ के ख़ूनी जबड़े से निकालकर उन्हें आज़ादी की खुली फ़िज़ा में ला खड़ा किया था।
हमें ये तो बताया जाता है कि असहाबे-कहफ़ एक ग़ार में चले गए थे और फिर 300 या 307 साल तक सोते रहे थे, फिर अल्लाह ने उन्हें जगा उठाया था, उनके साथ उनका कुत्ता भी था और अल्लाह उन्हें करवटें भी दिलाता रहा। ये भी बताया जाता है कि जब असहाबे-कहफ़ नींद से बेदार हुए तो मुल्क में एक अल्लाह को मानने वाले लोग पैदा हो चुके थे। मगर ये हमें नहीं बताया जाता कि आख़िर वो नौजवान ग़ार में क्यों चले गए थे? क्या वो वक़्त के हुक्मरानों से डर कर ग़ार में जा छिपे थे? और ये कि जब वो तौहीद-परस्त नौजवान ग़ार में जा सोए थे तो एक ख़ुदा को मानने वाले लोग कहाँ से आ गए थे?
हमें ये तो बताया जाता है कि नबी मुहम्मद (सल्ल०) को बुराक़ पर बिठाकर मैराज के लिये बुलाया गया और आलमे-बाला की सैर कराई गई, एक ऊँगली के इशारे से चाँद के दो टुकड़े कर दिये थे, जंग के मैदान में आप (सल्ल०) की मदद के लिये फ़रिश्ते उतरे थे जो मुसलमानों की तरफ़ से जंग कर रहे थे। मगर ये नहीं बताया जाता कि आप (सल्ल०) का अज़ीम मोजज़ा ये था कि आपने इन्तिहाई कम मुद्दत में पूरे समाज को नफ़रतों की दलदल से निकाल कर मुहब्बतों और ईसार व क़ुर्बानी की उस मैराज (बुलन्दी) पर पहुँचा दिया था कि जिस पर पूरी दुनियाए-इन्सानियत हैरत में पड़ गई। ये बात भी ज़रा कम ही बताई जाती है कि आप (सल्ल०) ने सियासत के वो आलमगीर उसूल मुरत्तब करके दिये जिससे क़ियामत तक आने वाले इन्सान रहनुमाई हासिल करते रहेंगे।
अगर हमें ये बातें बताई गई होतीं तो हमारे दरम्यान बेहतरीन लीडर्स और सियासत-दाँ पैदा होते जो ज़ालिमों और जाबीरों की आँखों में आँखें डालकर पूरे अज़्म और हौसले के साथ बात करने की सलाहियत रखते होते। हमारे दरम्यान बेहतरीन इकोनॉमिस्ट्स पैदा होते जो क़ौमों और लोगों की सही रहनुमाई कर रहे होते और जहाँ-जहाँ लोग ग़ुरबत व इफ़लास का शिकार हैं वहाँ ख़ैरख़ाह बनकर पहुँच चुके होते ताकि वहाँ से ग़रीबी को ख़त्म किया जा सके। हमारे दरम्यान बेहतरीन टेक्नोक्रैट्स पैदा हो रहे होते जो टेक्नोलॉजी के मैदान के इमाम साबित होते।
हक़ीक़त ये है कि आज हमें अंबियाँ (अलैहिमुस्सलाम) के वाक़िआत को क़िस्से-कहानियों के तौर पर सुनाने के साथ-साथ ये भी बताया जाए कि उन वाक़िआत में असल पैग़ामात क्या हैं? उन वाक़िआत और क़िस्सों से आज की नौजवान नस्ल को क्या मोटिवेशन मिलता है? ताकि ये उम्मत अपने ख़ैरे-उम्मत होने के फ़र्ज़े-मंसबी को समझ सके और उसे अदा करने के लिये आगे आ सके। आज हमारे समाज में नौजवानों के सामने अंबिया के उस किरदार को पेश किये जाने की ज़रूरत है जिससे सिसकती हुई इन्सानियत को आबे-हयात मिल सके, चारों तरफ़ हो रहे तशद्दुद (Violence) के माहौल में अदम-तशद्दुद (Non violence) की हिकमते-अमली को इख़्तियार करके मज़लूम इन्सानियत को ज़ुल्म और जब्र के जबड़ों से निकाला जा सके।