नफ़्स और रूह
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हम आम तौर पर दो शब्दों का इस्तेमाल करते हैं — रूह और नफ़्स।
क्या ये दोनों एक ही चीज़ हैं? अगर हाँ, तो इनकी हक़ीक़त क्या है? और अगर अलग-अलग हैं तो इनमें फ़र्क़ क्या है?
क़ुरआन में दोनों शब्द आए हैं — रूह का ज़िक्र कम और नफ़्स का ज़िक्र ज़्यादा। एक जगह अल्लाह फ़रमाता है:
“क़ुलिर-रूहु मिन अमरि रब्बी” (बनी इसराईल 17:85)
मतलब: “रूह मेरे रब के अम्र (हुक्म) से है।”
जिब्रील (अलैहिस्सलाम) और फ़रिश्तों को भी रूह कहा गया है। इसका मतलब है कि रूह अल्लाह का हुक्म है, और अल्लाह का कोई हुक्म ग़लत नहीं हो सकता। इसलिए रूह को बुरा या ग़लत कहना ठीक नहीं है।
लेकिन जब क़ुरआन सज़ा या इनाम की बात करता है तो उसका ताल्लुक नफ़्स से होता है, न कि रूह से। रूह तो पाक और मुक़द्दस होती है।
नफ़्स क्या है?
नफ़्स कोई अलग चीज़ नहीं है, बल्कि रूह से बनने वाली इंसानी शख़्सियत का नाम है। जब माँ के पेट में बच्चा बनता है और अल्लाह उसमें अपनी रूह फूंकता है, तब वह एक मासूम, पाक फ़ितरत वाला इंसान होता है। लेकिन जैसे-जैसे उसका होश-ओ-हवास बढ़ता है, उसके ऊपर दुनिया का असर शुरू होता है — जैसे शैतान की बातों का असर, माहौल का असर, माँ-बाप की सोच, और दुनिया की तमन्नाएँ।
इन सब के असर से रूह पर असर पड़ता है, और इससे जो शख़्सियत बनती है, उसे नफ़्स कहा जाता है।
रूह को आप एक बीज (बीज) मान लीजिए और नफ़्स उस बीज से निकले हुए पेड़ को। अगर बीज को अच्छी ज़मीन, पानी, और सुरक्षा न मिले तो पेड़ कमज़ोर बनेगा। वैसे ही अगर इंसान की रूह को सही माहौल न मिले, बुराई से बचाया न जाए, तो उसका नफ़्स यानी शख़्सियत कमज़ोर और गंदी हो जाती है।
नफ़्स की तीन क़िस्में होती हैं:
नफ़्स-ए-अम्मारा – जो बुराई की तरफ ले जाता है।
नफ़्स-ए-लव्वामा – जो बुराई पर पछताता और रोकता है (ज़मीर की आवाज़)।
नफ़्स-ए-मुत्मइन्ना – जो सुकून और रज़ा की हालत में होता है।
अगर इंसान ज़मीर की आवाज़ को दबा दे, तो वह नफ़्स-ए-अम्मारा की तरफ बढ़ता है — जो सिर्फ़ बुराई चाहता है। लेकिन अगर इंसान अपने अंदर की पुकार को सुने और बुराई से बचे, तो वह नफ़्स-ए-मुत्मइनना की तरफ़ जाता है — जिसे अल्लाह पसंद करता है।
इक़बाल ने नफ़्स को “ख़ुदी” कहा है। यानी या तो इंसान अपनी ख़ुदी के क़ाबू में होता है (नफ़्स-ए-अम्मारा) या फिर वह अपनी ख़ुदी पर क़ाबू पा लेता है (नफ़्स-ए-मुत्मइनना)।
अगर इंसान अपनी ख़ाहिशों और शैतान के असर से बचे, तो वह कामयाब है, अल्लाह का क़रीबी बन जाता है। लेकिन अगर वह अपने नफ़्स का ग़ुलाम बन जाए, तो वह दुनिया और आख़िरत दोनों में नुक़सान में रहेगा।
इसलिए इंसान के अंदर दो तरह की चाहतें होती हैं:
अल्लाह से रिश्ता बनाना — ये रूह की आवाज़ है।
दुनिया की चीज़ों में डूब जाना — ये नफ़्स की ख़ाहिश है।
अगर इंसान रूह की तरफ़ चले, तो उसका नफ़्स भी साफ़ होता है और उसका किरदार ऊँचा होता है। और अगर वो सिर्फ़ नफ़्स की सुनता रहे, तो उसका किरदार गिरता जाता है और वो बर्बादी की तरफ़ चला जाता है।