मोहब्बत की हक़ीक़त
असल में मोहब्बत आज़ादी का नहीं बल्कि बंधन (ग़ुलामी) का नाम है। लेकिन इस बंधन में ऐसा आनंद होता है जो इंसान को दिखावटी आज़ादी से कई गुना ज़्यादा सुकून देता है।
असल में मोहब्बत हर रास्ते पर चल देने का नाम नहीं है, बल्कि मोहब्बत किसी एक रास्ते को सोच-समझकर चुन लेने का नाम है, जिस पर उसे अपनी मंज़िल साफ़ दिखती है।
असल में मोहब्बत ये नहीं है कि इंसान मोहब्बत के नाम पर जो चाहे करता रहे, बल्कि मोहब्बत उस सीमा को अपनाने का नाम है जिसे वो अपने महबूब के लिए ख़ुशी से कुबूल करता है और हर क़ुरबानी में सुख पाता है।
मोहब्बत हर किसी की बाँहों में झूलने या जगह-जगह ज़ुल्फ़ों के सायों में आराम करने का नाम नहीं हो सकती, बल्कि मोहब्बत तो यह है कि इंसान हर दिशा से अपनी बाँहें समेटकर सिर्फ़ एक को समर्पित कर दे, और हर साये को छोड़कर किसी एक साये में चैन पा जाए।
असल में मोहब्बत किसी पर निसार हो जाने का नाम नहीं है, बल्कि प्यारी चीज़ को उससे ज़्यादा प्यारे के लिये क़ुर्बान कर देने का नाम है, और यही मोहब्बत की सबसे ऊँची मंज़िल है।
ख़ुदा भी अपने बंदे से इसी तरह की मोहब्बत चाहता है, और हर महबूब अपने चाहने वाले से यही मोहब्बत चाहता है।
आज़ादी इंसान को उसके “नफ़्स” (ख़्वाहिशों) का ग़ुलाम बना देती है, जबकि मोहब्बत उसे “नफ़्स” की ग़ुलामी से आज़ाद कर देती है और उसे ईसार और क़ुर्बानी के उस ऊँचे दर्जे तक पहुँचा देती है, जहाँ सिर्फ़ बुलंद किरदार वाले लोग पहुँच पाते हैं।