15 शाबान को जब रसूलुल्लाह (sl) रात को उठकर जन्तुल-बक़ी गए थे(*) तो क्या वहाँ से वापस आकर लोगों को किसी इबादत की ताकीद की थी ?
जवाब है “नहीं”।
(इस सिलसिले में जिस हदीस से इबादत करने की ताकीद साबित की जाती है वो हदीस ज़ईफ़ है। देखें इब्ने-माजा हदीस नम्बर 1388)
क्या उस रात के बाद सहाबा इकराम (रज़ि०) में से किसी ने इस रात को इबादत के लिए ख़ास किया था?
जवाब है “नहीं”।
(इस सिलसिले में किसी सहाबी से इबादत का कोई अमल साबित नहीं है)
क्या इस रात को कुरान नाज़िल हुआ था?
जवाब है “नहीं”।
(ये बात ख़ुद क़ुरआन की सूरा क़द्र से, सूरा बक़रा की आयत-185 और सूरा दुख़ान की आयत-3 से साबित है कि क़ुरआन रमज़ान माह की शबे-क़द्र को नाज़िल हुआ और किसी हदीस से भी साबित नहीं होता कि क़ुरआन शाबान की 15 तारीख़ को नाज़िल हुआ था।)
क्या इस रात को इन्सानों की तक़दीर के फ़ैसले होते हैं?
जवाब है नहीं।
(क्योंकि ये बात कुरान और हदीस से कहीं भी साबित नहीं है, बल्कि इसके बरखिलाफ उलेमा ये मानते हैं कि तक़दीरों के फ़ैसले वाली बात शबे-क़द्र से रिलेटेड है जो रमज़ान की ताक़ रातों में से किसी एक रात में है, देखें सूरा क़द्र)
क्या नबी (सल्ल०) ने सिर्फ़ इसी रात को उठकर इबादत की थी या शाबान की 15 तारीख़ को हर साल इबादत किया करते थे?
जवाब है नहीं।
(क्योंकि ये वाक़िआ इन २-३ हदीसों के अलावा किसी हदीस में दर्ज नहीं है। और किसी भी हदीस से ये साबित नहीं है कि ये आप (सल्ल०) का मुस्तक़िल अमल था। इसी लिये सहाबा किराम (रज़ि०) से भी इस रात की इबादत का कोई सुबूत नहीं मिलता है)
फिर हमने क्यों इस रात को इबादत के लिए खास कर लिया?
सारी बात सोचने से ताल्लुक रखती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि शब-ए-कदर् की अहमियत को कम करने के लिए इस रात की फज़ीलत को बढ़ा-चढ़ा कर उम्मत के सामने पेश किया जा रहा है?
क्या ये हक़ीक़त नहीं है कि शब-ए-क़द्र की हमारे यहाँ वो अहमियत नहीं है जो अहमियत शब-ए-बारात ने हासिल कर ली है ? आख़िर क्यों?
क्या वाक़ई उस रात की कोई फ़ज़ीलत हो सकती है जिसका क़ुरआन में कहीं ज़िक्र न हो उस रात के मुक़ाबले में जिसका ज़िक्र ख़ुद क़ुरआन में किया गया हो?
ज़रा सोचिए कि ये हमारी उम्मत में चल क्या रहा है?
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(*) प्लीज़ नोट करें की जन्नतुल-बक़ी जाने के सिलसिले में तिर्मिज़ी शरीफ़ की हदीस नम्बर 739 इन्तिहाई दर्जे की ज़ईफ़ है।