लेबल दीन का और बीज मज़हब का
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ख़िलाफ़ते-राशिदा के ख़ात्मे के बाद एक बहुत बड़ा हादिसा सिर्फ़ यही नहीं हुआ कि मुसलमानों की मुलूकियत क़ायम हो गई बल्कि इससे भी बड़ा हादिसा ये हुआ कि दीन का लेबल लगाकर मज़हब का बीज बो दिया गया था। फिर बाद को आनेवाले बादशाहों और नाम-निहाद सूफ़िया ने उस बीज को इस क़द्र खाद-पानी बहम पहुँचाया कि वो बीज एक तनावर दरख़्त बन गया। ये मज़हब का बीज एक तरह से खरपतवार (Unwanted plant) का बीज था, (मज़हब कहते ही उस रास्ते को हैं जो असल शाहराह से निकाल कर बना लिया गया हो) जिससे लाज़िमी तौर पर बहुत-से पौदे उग जाने थे। लिहाज़ा नतीजा ये निकला कि अलग-अलग मसलकों और जमाअतों की शक्ल में वो पौधे बाद को अपनी-अपनी जगह मज़बूत दरख़्त बन गए और ख़िलाफ़ते-राशिदा की शक्ल में दीन का जो दरख़्त तनावर बन गया था वो सूखता चला गया। आज हम मज़हब के उन्हीं दरख़्तों के कड़ुए-कसीले फल खाए चले जा रहे हैं।
इन कड़ुए फलों का खाना आज भी हर नेक तबीअत इन्सान पर गिराँ गुज़रता है, मसलकों और जमाअतों के इन्तिशार में लिपटी हुई इस मज़हबियत को देखकर हर बा-शुऊर और मुख़लिस मुसलमान का कलेजा मुँह को आता है, लेकिन ज्यों ही कोई नेक तबीअत इन्सान मुँह बिसोरता है तो उस पर दीन से ग़द्दारी का लेबल लगाकर दीन से ख़ारिज कर डालने की धमकियाँ दी जाने लगती हैं। लेकिन अल-हम्दुलिल्लाह दीन, जो कि असल बीज था उसकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी ख़ुद अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने ली थी वो आज भी महफ़ूज़ है और वक़्त-वक़्त पर ऐसे जियाले पैदा होते रहे जिन्होंने कम से कम इतना काम तो ज़रूर किया कि असल दरख़्त की पहचान कराई और खरपतवार नुमा मज़हबी पौधों की असलियत से पर्दा उठाया है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम बराहे-रास्त क़ुरआन से वाबस्ता होकर असल बीज को पहचानें और दीन के उस असल सूखे हुए दरख़्त को खाद-पानी बहम पहुँचाएँ ताकि वो फिर से ज़िन्दा होकर तनावर बन सके और लोग उसके सायाए-रहमत में पनाह भी ले सकें और उसके मीठे फलों से लुत्फ़-अन्दोज़ भी हो सकें।