Muhammad (sl) ki Seerat sey mutalliq

Muhammad (sl) ki Seerat sey mutalliq

मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत से मुताल्लिक़ कुछ ज़रूरी बातें
—   —   —

इस्लाम की नेमत हर ज़माने में इन्सान को दो ही ज़रिओं से पहुँची है। एक अल्लाह का कलाम दूसरे अंबिया (अलैहि०) की शख़्सियतें, जिनको अल्लाह ने न सिर्फ़ अपने कलाम की तबलीग़ व तालीम और तफ़हीम का वास्ता बनाया, बल्कि उसके साथ अमली क़ियादत व रहनुमाई के मंसब (पद) पर बिठाया ताकि वो अल्लाह के कलाम का ठीक-ठीक मंशा पूरा करने के लिये इन्सानों और इन्सानी समाज का तज़किया करें और इन्सानी ज़िन्दगी के बिगड़े हुए निज़ाम को सँवार कर उसकी तामीरे-सालेह (नेक बुनियादों पर तामीर) कर दिखाएँ।

ये दोनों चीज़ें हमेशा से ऐसी लाज़िम व मलज़ूम रही हैं की इनमें से किसी को किसी से अलग करके न इन्सान को कभी दीन का सही फ़हम (समझ) नसीब हो सका और न वो हिदायत ही पा सका। किताब को नबी से अलग कर दीजिये तो वो एक कश्ती है ना-ख़ुदा के बग़ैर, जिसे लेकर अनाड़ी मुसाफ़िर ज़िन्दगी के समन्दर में चाहे कितने ही भटकते फिरें मंज़िले-मक़सूद पर कभी नहीं पहुँच सकते और नबी को किताब से अलग कर दीजिये तो ख़ुदा का रास्ता पाने के बजाए आदमी ना-ख़ुदा ही को ख़ुदा बना बैठने से कभी नहीं बच सकता। ये दोनों ही नतीजे पिछली क़ौमें देख चुकी हैं। हिन्दुओं ने अपने नबियों की सीरतों को गुम किया और सिर्फ़ किताबें लेकर बैठ गए। अंजाम ये हुआ की किताबें उनके लिये लफ़्ज़ी गोरख-धंधों से बढ़कर कुछ न रहीं। यहाँ तक की आख़िरकार ख़ुद उन्हें भी वो गुम कर बैठे। ईसाइयों ने किताब को नज़रअन्दाज़ करके नबी का दामन पकड़ा और उसकी शख़्सियत के गिर्द घूमना शुरू किया। नतीजा ये हुआ की कोई चीज़ उन्हें अल्लाह के नबी को अल्लाह का बेटा बल्कि ठीक अल्लाह बनाने से रोक न सकी।

पुराने दौर की तरह अब इस नए दौर में भी इन्सान को इस्लाम की नेमत मुयस्सर आने के वही दो ज़रिये हैं जो शुरू से चले आ रहे हैं। एक ख़ुदा का कलाम जो अब सिर्फ़ क़ुरआन की सूरत में ही मिल सकता है, दूसरे उस्वए-नुबूवत (नबी का आदर्श) जो अब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत की शक्ल ही में महफ़ूज़ है। हमेशा की तरह आज भी इस्लाम का सही फ़हम इन्सान को अगर हासिल हो सकता है तो उसकी सूरत सिर्फ़ ये है की वो क़ुरआन को मुहम्मद (सल्ल०) से और मुहम्मद (सल्ल०) को क़ुरआन से समझे। इन दोनों को एक दूसरे की मदद से जिसने समझ लिया, उसने इस्लाम को समझ लिया। वरना दीन की समझ से भी महरूम रहा और नतीजे तौर पर हिदायत से भी।

फिर, क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल०) दोनों चूँकि एक मिशन रखते हैं। एक मक़सद व मुद्दुआ को लिए आए हैं इसलिये इनको समझने का इन्हिसार (निर्भरता) इस पर है कि हम इनके मिशन और मक़सद व मुद्दुआ को किस हद तक समझते हैं। इस चीज़ को नज़रअंदाज़ करके देखिये तो क़ुरआन, इबारतों (लिखे अलफ़ाज़) का एक ज़ख़ीरा और सीरते-पाक, वाक़िआत व हालात का एक मजमूआ है। आप लुग़त, रिवायात और इल्मी तहक़ीक़ व काविश की मदद से तफ़सीरों के अंबार लगा सकते हैं और तारीख़ी तहक़ीक़ का कमाल दिखाकर रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ज़ात और आप (सल्ल०) के दौर के बारे में सही से सही और ज़्यादा से ज़्यादा मालूमात के ढेर लगा सकते हैं, मगर रूहे-दीन तक नहीं पहुँच सकते, क्योंकि वो इबारतों और वाक़िआत से नहीं बल्कि उस मक़सद से वाबस्ता है जिसके लिये क़ुरआन उतारा गया और मुहम्मदे-अरबी (सल्ल०) को उसी मक़सद को बुलन्द करने के लिए खड़ा किया था। इस मक़सद का तसव्वुर जितना सही होगा उतना ही क़ुरआन और सीरत का सही फ़हम (समझ) और जितना वो नाक़िस (कम) होगा उतना ही इन दोनों का फ़हम नाक़िस रहेगा।

ये एक हक़ीक़त है कि क़ुरआन और सीरते-मुहम्मदी (सल्ल०) दोनों ही ऐसा समन्दर हैं जिसका किनारा नहीं है। कोई इन्सान ये चाहे कि इनके तमाम मआनी (मायनों या अर्थों) और फ़ायदों और बरकतों को समेट ले तो इसमें कभी कामयाब नहीं हो सकता। अलबत्ता जिस चीज़ की कोशिश की जा सकती है वो बस ये है की जिस हद तक मुमकिन हो आदमी उनका ज़्यादा से ज़्यादा सही फ़हम हासिल करे और इनकी मदद से दीन की रूह तक पहुँचने की कोशिश करे।

The blessing of Islam has always reached humankind through two essential means:

The Word of Allah,

And the personalities of the Prophets (peace be upon them).

Allah did not merely assign His prophets to convey, teach, and explain His revelation.
He also appointed them as practical leaders and reformers, tasked with purifying human souls and reconstructing broken systems on righteous foundations.

These two — divine scripture and prophetic model — have always been inseparable.
When either is severed from the other, mankind has neither gained a proper understanding of religion nor found true guidance.

Separate the Book from the Prophet, and it becomes like a boat without a captain —
left to be steered by novices who drift endlessly in the ocean of life, never reaching their destination.

Separate the Prophet from the Book, and instead of reaching God, man ends up deifying the messenger himself.

History has already witnessed both these outcomes:

Hindus lost touch with their prophets’ lives and clung only to texts.
Those texts became for them a maze of incomprehensible words, until even the texts themselves were forgotten.

Christians, on the other hand, let go of the scripture and clung solely to the personality of the Prophet.
As a result, they couldn’t stop themselves from declaring him the Son of God — or God Himself.

Just as in the past, even today, Islam’s blessing can only reach us through the same two sources:

The Word of God, now preserved only in the Qur’an,

And the Prophetic Model, now embodied only in the life of Muhammad ﷺ.

To truly understand Islam, one must understand the Qur’an through Muhammad ﷺ, and Muhammad ﷺ through the Qur’an.

Whoever does this has grasped Islam.
Whoever separates them remains deprived of both understanding and guidance.

Moreover, the Qur’an and the Prophet ﷺ share a single mission —
a unified purpose and objective.
And understanding them depends entirely on how well we understand that mission.

Ignore that purpose, and:

The Qur’an becomes a mere collection of words,

The Prophetic biography becomes just a record of events.

You can gather extensive volumes of tafsir using lexicons, reports, and academic rigor,
you can collect detailed historical accounts about the life and era of the Prophet ﷺ —
Yet you may never reach the soul of religion.

Because the spirit of faith is not in the phrases or the stories,
but in the mission and message for which the Qur’an was revealed,
and for which Muhammad ﷺ was sent.

The clearer that mission becomes,
the clearer our understanding of the Qur’an and the Prophet ﷺ.
And the weaker our sense of that mission,
the shallower our understanding will remain.

It is a profound truth that both the Qur’an and the Seerah of the Prophet ﷺ are vast oceans —
endless in depth.
No human being can ever hope to contain all their meanings, wisdom, and blessings.

What one can strive for, however, is to:

Grasp as much of their true meaning as possible,

And through that understanding, reach the essence of religion — its spirit.

اسلام کی نعمت ہر دور میں انسان کو دو ہی ذریعے سے پہنچی ہے:
ایک اللہ کا کلام،
اور دوسرے انبیائے کرام علیہم السلام کی شخصیات۔

اللہ تعالیٰ نے اپنے انبیاء کو نہ صرف اپنے کلام کی تبلیغ، تعلیم اور تفہیم کا ذریعہ بنایا، بلکہ انہیں عملی قیادت و رہنمائی کے منصب پر فائز فرمایا تاکہ وہ اللہ کے کلام کا منشاء صحیح طور پر پورا کرنے کے لیے انسانوں اور معاشرے کا تزکیہ کریں، اور زندگی کے بگڑے ہوئے نظام کو سنوار کر اس کی صالح تعمیر کریں۔

یہ دونوں چیزیں ہمیشہ لازم و ملزوم رہی ہیں۔ ان میں سے کسی ایک کو دوسرے سے جدا کر دیا جائے تو نہ انسان کو دین کی صحیح سمجھ حاصل ہو سکتی ہے اور نہ وہ ہدایت پا سکتا ہے۔

اگر آپ کتاب کو نبی سے الگ کر دیں تو وہ ایک ایسی کشتی بن کر رہ جاتی ہے جس کا کوئی ناخدا نہیں۔ اور انجان مسافر، خواہ وہ کتنی ہی کوشش کر لیں، منزل تک کبھی نہیں پہنچ سکتے۔

اور اگر آپ نبی کو کتاب سے الگ کر دیں تو پھر انسان خدا کی طرف جانے کے بجائے خود نبی کو خدا بنانے سے بھی نہیں بچ سکتا۔

یہ دونوں نتائج پچھلی قوموں کی تاریخ میں ہمیں صاف دکھائی دیتے ہیں:

ہندوؤں نے اپنے نبیوں کی سیرتیں کھو دیں اور صرف کتابوں سے چمٹے رہے۔ نتیجہ یہ نکلا کہ کتابیں ان کے لیے محض الفاظ کا گورکھ دھندا بن کر رہ گئیں، یہاں تک کہ خود وہ کتابیں بھی گم ہو گئیں۔

عیسائیوں نے کتاب کو چھوڑ کر نبی کی شخصیت سے چمٹ گئے، اور نتیجہ یہ نکلا کہ وہ نبی کو خدا کا بیٹا بلکہ خدا بنانے سے بھی نہ رک سکے۔

جیسے پہلے زمانے میں تھا، آج کے دور میں بھی انسان کے لیے اسلام کی نعمت انہی دو ذرائع سے میسر آ سکتی ہے:

اللہ کا کلام، جو اب صرف قرآن کی صورت میں باقی ہے،

اور اسوۂ نبوت، جو اب صرف حضرت محمد ﷺ کی سیرت میں محفوظ ہے۔

اسلام کا صحیح فہم آج بھی اسی وقت ممکن ہے جب قرآن کو محمد ﷺ کی سیرت کی روشنی میں اور محمد ﷺ کو قرآن کی روشنی میں سمجھا جائے۔

جس نے ان دونوں کو ایک دوسرے کی مدد سے سمجھ لیا،
اس نے اسلام کو پا لیا۔
اور جس نے ان میں سے کسی ایک کو دوسرے سے کاٹ کر سمجھنے کی کوشش کی، وہ دین کی روح سے محروم رہا، اور نتیجتاً ہدایت سے بھی محروم۔

پھر یہ کہ قرآن اور رسول اللہ ﷺ دونوں کا ایک ہی مشن ہے،
ایک ہی مقصد اور مدعا لے کر آئے ہیں۔
لہٰذا ان کو سمجھنے کا انحصار اس بات پر ہے کہ
ہم ان کے مشن اور مقصد کو کس حد تک سمجھتے ہیں۔

اگر اس چیز کو نظرانداز کر دیا جائے تو:
قرآن صرف عبارات کا ذخیرہ رہ جاتا ہے،
اور سیرتِ رسول ﷺ صرف واقعات کا مجموعہ۔

آپ لغت، روایات، علمی تحقیق اور تاریخی کاوشوں کی مدد سے
تفاسیر کا انبار لگا سکتے ہیں،
اور نبی کریم ﷺ کی ذات اور عہدِ نبوی کے بارے میں
درست اور تفصیلی معلومات فراہم کر سکتے ہیں،
مگر دین کی روح تک رسائی نہیں پا سکتے۔

کیونکہ دین کی روح عبارات اور واقعات میں نہیں،
بلکہ اس مقصد میں پوشیدہ ہے
جس کے لیے قرآن نازل کیا گیا،
اور جس مقصد کے لیے محمد عربی ﷺ کو کھڑا کیا گیا۔

اس مقصد کا تصور جتنا واضح ہوگا،
قرآن اور سیرت کا فہم بھی اتنا ہی درست ہوگا۔
اور جتنا یہ تصور ناقص ہوگا،
اتنا ہی فہم بھی ناقص رہے گا۔

یہ ایک یقینی حقیقت ہے کہ قرآن اور سیرتِ نبوی ﷺ دونوں ایسے سمندر ہیں جن کی کوئی انتہا نہیں۔

اگر کوئی انسان یہ چاہے کہ وہ ان کے تمام معانی، فوائد اور برکتوں کو سراپا سمیٹ لے،
تو وہ کامیاب نہیں ہو سکتا۔

البتہ جو کوشش کی جا سکتی ہے، وہ یہ ہے کہ
جہاں تک ممکن ہو، انسان
ان کا زیادہ سے زیادہ صحیح فہم حاصل کرے
اور ان کی روشنی میں دین کی روح تک رسائی حاصل کرنے کی سعی کرے۔

Hindi

मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत से मुताल्लिक़ कुछ ज़रूरी बातें
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इस्लाम की नेमत हर ज़माने में इन्सान को दो ही ज़रिओं से पहुँची है। एक अल्लाह का कलाम दूसरे अंबिया (अलैहि०) की शख़्सियतें, जिनको अल्लाह ने न सिर्फ़ अपने कलाम की तबलीग़ व तालीम और तफ़हीम का वास्ता बनाया, बल्कि उसके साथ अमली क़ियादत व रहनुमाई के मंसब (पद) पर बिठाया ताकि वो अल्लाह के कलाम का ठीक-ठीक मंशा पूरा करने के लिये इन्सानों और इन्सानी समाज का तज़किया करें और इन्सानी ज़िन्दगी के बिगड़े हुए निज़ाम को सँवार कर उसकी तामीरे-सालेह (नेक बुनियादों पर तामीर) कर दिखाएँ।

ये दोनों चीज़ें हमेशा से ऐसी लाज़िम व मलज़ूम रही हैं की इनमें से किसी को किसी से अलग करके न इन्सान को कभी दीन का सही फ़हम (समझ) नसीब हो सका और न वो हिदायत ही पा सका। किताब को नबी से अलग कर दीजिये तो वो एक कश्ती है ना-ख़ुदा के बग़ैर, जिसे लेकर अनाड़ी मुसाफ़िर ज़िन्दगी के समन्दर में चाहे कितने ही भटकते फिरें मंज़िले-मक़सूद पर कभी नहीं पहुँच सकते और नबी को किताब से अलग कर दीजिये तो ख़ुदा का रास्ता पाने के बजाए आदमी ना-ख़ुदा ही को ख़ुदा बना बैठने से कभी नहीं बच सकता। ये दोनों ही नतीजे पिछली क़ौमें देख चुकी हैं। हिन्दुओं ने अपने नबियों की सीरतों को गुम किया और सिर्फ़ किताबें लेकर बैठ गए। अंजाम ये हुआ की किताबें उनके लिये लफ़्ज़ी गोरख-धंधों से बढ़कर कुछ न रहीं। यहाँ तक की आख़िरकार ख़ुद उन्हें भी वो गुम कर बैठे। ईसाइयों ने किताब को नज़रअन्दाज़ करके नबी का दामन पकड़ा और उसकी शख़्सियत के गिर्द घूमना शुरू किया। नतीजा ये हुआ की कोई चीज़ उन्हें अल्लाह के नबी को अल्लाह का बेटा बल्कि ठीक अल्लाह बनाने से रोक न सकी।

पुराने दौर की तरह अब इस नए दौर में भी इन्सान को इस्लाम की नेमत मुयस्सर आने के वही दो ज़रिये हैं जो शुरू से चले आ रहे हैं। एक ख़ुदा का कलाम जो अब सिर्फ़ क़ुरआन की सूरत में ही मिल सकता है, दूसरे उस्वए-नुबूवत (नबी का आदर्श) जो अब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत की शक्ल ही में महफ़ूज़ है। हमेशा की तरह आज भी इस्लाम का सही फ़हम इन्सान को अगर हासिल हो सकता है तो उसकी सूरत सिर्फ़ ये है की वो क़ुरआन को मुहम्मद (सल्ल०) से और मुहम्मद (सल्ल०) को क़ुरआन से समझे। इन दोनों को एक दूसरे की मदद से जिसने समझ लिया, उसने इस्लाम को समझ लिया। वरना दीन की समझ से भी महरूम रहा और नतीजे तौर पर हिदायत से भी।

फिर, क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल०) दोनों चूँकि एक मिशन रखते हैं। एक मक़सद व मुद्दुआ को लिए आए हैं इसलिये इनको समझने का इन्हिसार (निर्भरता) इस पर है कि हम इनके मिशन और मक़सद व मुद्दुआ को किस हद तक समझते हैं। इस चीज़ को नज़रअंदाज़ करके देखिये तो क़ुरआन, इबारतों (लिखे अलफ़ाज़) का एक ज़ख़ीरा और सीरते-पाक, वाक़िआत व हालात का एक मजमूआ है। आप लुग़त, रिवायात और इल्मी तहक़ीक़ व काविश की मदद से तफ़सीरों के अंबार लगा सकते हैं और तारीख़ी तहक़ीक़ का कमाल दिखाकर रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ज़ात और आप (सल्ल०) के दौर के बारे में सही से सही और ज़्यादा से ज़्यादा मालूमात के ढेर लगा सकते हैं, मगर रूहे-दीन तक नहीं पहुँच सकते, क्योंकि वो इबारतों और वाक़िआत से नहीं बल्कि उस मक़सद से वाबस्ता है जिसके लिये क़ुरआन उतारा गया और मुहम्मदे-अरबी (सल्ल०) को उसी मक़सद को बुलन्द करने के लिए खड़ा किया था। इस मक़सद का तसव्वुर जितना सही होगा उतना ही क़ुरआन और सीरत का सही फ़हम (समझ) और जितना वो नाक़िस (कम) होगा उतना ही इन दोनों का फ़हम नाक़िस रहेगा।

ये एक हक़ीक़त है कि क़ुरआन और सीरते-मुहम्मदी (सल्ल०) दोनों ही ऐसा समन्दर हैं जिसका किनारा नहीं है। कोई इन्सान ये चाहे कि इनके तमाम मआनी (मायनों या अर्थों) और फ़ायदों और बरकतों को समेट ले तो इसमें कभी कामयाब नहीं हो सकता। अलबत्ता जिस चीज़ की कोशिश की जा सकती है वो बस ये है की जिस हद तक मुमकिन हो आदमी उनका ज़्यादा से ज़्यादा सही फ़हम हासिल करे और इनकी मदद से दीन की रूह तक पहुँचने की कोशिश करे।

The blessing of Islam has always reached humankind through two essential means:

The Word of Allah,

And the personalities of the Prophets (peace be upon them).

Allah did not merely assign His prophets to convey, teach, and explain His revelation.
He also appointed them as practical leaders and reformers, tasked with purifying human souls and reconstructing broken systems on righteous foundations.

These two — divine scripture and prophetic model — have always been inseparable.
When either is severed from the other, mankind has neither gained a proper understanding of religion nor found true guidance.

Separate the Book from the Prophet, and it becomes like a boat without a captain —
left to be steered by novices who drift endlessly in the ocean of life, never reaching their destination.

Separate the Prophet from the Book, and instead of reaching God, man ends up deifying the messenger himself.

History has already witnessed both these outcomes:

Hindus lost touch with their prophets’ lives and clung only to texts.
Those texts became for them a maze of incomprehensible words, until even the texts themselves were forgotten.

Christians, on the other hand, let go of the scripture and clung solely to the personality of the Prophet.
As a result, they couldn’t stop themselves from declaring him the Son of God — or God Himself.

Just as in the past, even today, Islam’s blessing can only reach us through the same two sources:

The Word of God, now preserved only in the Qur’an,

And the Prophetic Model, now embodied only in the life of Muhammad ﷺ.

To truly understand Islam, one must understand the Qur’an through Muhammad ﷺ, and Muhammad ﷺ through the Qur’an.

Whoever does this has grasped Islam.
Whoever separates them remains deprived of both understanding and guidance.

Moreover, the Qur’an and the Prophet ﷺ share a single mission —
a unified purpose and objective.
And understanding them depends entirely on how well we understand that mission.

Ignore that purpose, and:

The Qur’an becomes a mere collection of words,

The Prophetic biography becomes just a record of events.

You can gather extensive volumes of tafsir using lexicons, reports, and academic rigor,
you can collect detailed historical accounts about the life and era of the Prophet ﷺ —
Yet you may never reach the soul of religion.

Because the spirit of faith is not in the phrases or the stories,
but in the mission and message for which the Qur’an was revealed,
and for which Muhammad ﷺ was sent.

The clearer that mission becomes,
the clearer our understanding of the Qur’an and the Prophet ﷺ.
And the weaker our sense of that mission,
the shallower our understanding will remain.

It is a profound truth that both the Qur’an and the Seerah of the Prophet ﷺ are vast oceans —
endless in depth.
No human being can ever hope to contain all their meanings, wisdom, and blessings.

What one can strive for, however, is to:

Grasp as much of their true meaning as possible,

And through that understanding, reach the essence of religion — its spirit.

اسلام کی نعمت ہر دور میں انسان کو دو ہی ذریعے سے پہنچی ہے:
ایک اللہ کا کلام،
اور دوسرے انبیائے کرام علیہم السلام کی شخصیات۔

اللہ تعالیٰ نے اپنے انبیاء کو نہ صرف اپنے کلام کی تبلیغ، تعلیم اور تفہیم کا ذریعہ بنایا، بلکہ انہیں عملی قیادت و رہنمائی کے منصب پر فائز فرمایا تاکہ وہ اللہ کے کلام کا منشاء صحیح طور پر پورا کرنے کے لیے انسانوں اور معاشرے کا تزکیہ کریں، اور زندگی کے بگڑے ہوئے نظام کو سنوار کر اس کی صالح تعمیر کریں۔

یہ دونوں چیزیں ہمیشہ لازم و ملزوم رہی ہیں۔ ان میں سے کسی ایک کو دوسرے سے جدا کر دیا جائے تو نہ انسان کو دین کی صحیح سمجھ حاصل ہو سکتی ہے اور نہ وہ ہدایت پا سکتا ہے۔

اگر آپ کتاب کو نبی سے الگ کر دیں تو وہ ایک ایسی کشتی بن کر رہ جاتی ہے جس کا کوئی ناخدا نہیں۔ اور انجان مسافر، خواہ وہ کتنی ہی کوشش کر لیں، منزل تک کبھی نہیں پہنچ سکتے۔

اور اگر آپ نبی کو کتاب سے الگ کر دیں تو پھر انسان خدا کی طرف جانے کے بجائے خود نبی کو خدا بنانے سے بھی نہیں بچ سکتا۔

یہ دونوں نتائج پچھلی قوموں کی تاریخ میں ہمیں صاف دکھائی دیتے ہیں:

ہندوؤں نے اپنے نبیوں کی سیرتیں کھو دیں اور صرف کتابوں سے چمٹے رہے۔ نتیجہ یہ نکلا کہ کتابیں ان کے لیے محض الفاظ کا گورکھ دھندا بن کر رہ گئیں، یہاں تک کہ خود وہ کتابیں بھی گم ہو گئیں۔

عیسائیوں نے کتاب کو چھوڑ کر نبی کی شخصیت سے چمٹ گئے، اور نتیجہ یہ نکلا کہ وہ نبی کو خدا کا بیٹا بلکہ خدا بنانے سے بھی نہ رک سکے۔

جیسے پہلے زمانے میں تھا، آج کے دور میں بھی انسان کے لیے اسلام کی نعمت انہی دو ذرائع سے میسر آ سکتی ہے:

اللہ کا کلام، جو اب صرف قرآن کی صورت میں باقی ہے،

اور اسوۂ نبوت، جو اب صرف حضرت محمد ﷺ کی سیرت میں محفوظ ہے۔

اسلام کا صحیح فہم آج بھی اسی وقت ممکن ہے جب قرآن کو محمد ﷺ کی سیرت کی روشنی میں اور محمد ﷺ کو قرآن کی روشنی میں سمجھا جائے۔

جس نے ان دونوں کو ایک دوسرے کی مدد سے سمجھ لیا،
اس نے اسلام کو پا لیا۔
اور جس نے ان میں سے کسی ایک کو دوسرے سے کاٹ کر سمجھنے کی کوشش کی، وہ دین کی روح سے محروم رہا، اور نتیجتاً ہدایت سے بھی محروم۔

پھر یہ کہ قرآن اور رسول اللہ ﷺ دونوں کا ایک ہی مشن ہے،
ایک ہی مقصد اور مدعا لے کر آئے ہیں۔
لہٰذا ان کو سمجھنے کا انحصار اس بات پر ہے کہ
ہم ان کے مشن اور مقصد کو کس حد تک سمجھتے ہیں۔

اگر اس چیز کو نظرانداز کر دیا جائے تو:
قرآن صرف عبارات کا ذخیرہ رہ جاتا ہے،
اور سیرتِ رسول ﷺ صرف واقعات کا مجموعہ۔

آپ لغت، روایات، علمی تحقیق اور تاریخی کاوشوں کی مدد سے
تفاسیر کا انبار لگا سکتے ہیں،
اور نبی کریم ﷺ کی ذات اور عہدِ نبوی کے بارے میں
درست اور تفصیلی معلومات فراہم کر سکتے ہیں،
مگر دین کی روح تک رسائی نہیں پا سکتے۔

کیونکہ دین کی روح عبارات اور واقعات میں نہیں،
بلکہ اس مقصد میں پوشیدہ ہے
جس کے لیے قرآن نازل کیا گیا،
اور جس مقصد کے لیے محمد عربی ﷺ کو کھڑا کیا گیا۔

اس مقصد کا تصور جتنا واضح ہوگا،
قرآن اور سیرت کا فہم بھی اتنا ہی درست ہوگا۔
اور جتنا یہ تصور ناقص ہوگا،
اتنا ہی فہم بھی ناقص رہے گا۔

یہ ایک یقینی حقیقت ہے کہ قرآن اور سیرتِ نبوی ﷺ دونوں ایسے سمندر ہیں جن کی کوئی انتہا نہیں۔

اگر کوئی انسان یہ چاہے کہ وہ ان کے تمام معانی، فوائد اور برکتوں کو سراپا سمیٹ لے،
تو وہ کامیاب نہیں ہو سکتا۔

البتہ جو کوشش کی جا سکتی ہے، وہ یہ ہے کہ
جہاں تک ممکن ہو، انسان
ان کا زیادہ سے زیادہ صحیح فہم حاصل کرے
اور ان کی روشنی میں دین کی روح تک رسائی حاصل کرنے کی سعی کرے۔

मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत से मुताल्लिक़ कुछ ज़रूरी बातें
—   —   —

इस्लाम की नेमत हर ज़माने में इन्सान को दो ही ज़रिओं से पहुँची है। एक अल्लाह का कलाम दूसरे अंबिया (अलैहि०) की शख़्सियतें, जिनको अल्लाह ने न सिर्फ़ अपने कलाम की तबलीग़ व तालीम और तफ़हीम का वास्ता बनाया, बल्कि उसके साथ अमली क़ियादत व रहनुमाई के मंसब (पद) पर बिठाया ताकि वो अल्लाह के कलाम का ठीक-ठीक मंशा पूरा करने के लिये इन्सानों और इन्सानी समाज का तज़किया करें और इन्सानी ज़िन्दगी के बिगड़े हुए निज़ाम को सँवार कर उसकी तामीरे-सालेह (नेक बुनियादों पर तामीर) कर दिखाएँ।

ये दोनों चीज़ें हमेशा से ऐसी लाज़िम व मलज़ूम रही हैं की इनमें से किसी को किसी से अलग करके न इन्सान को कभी दीन का सही फ़हम (समझ) नसीब हो सका और न वो हिदायत ही पा सका। किताब को नबी से अलग कर दीजिये तो वो एक कश्ती है ना-ख़ुदा के बग़ैर, जिसे लेकर अनाड़ी मुसाफ़िर ज़िन्दगी के समन्दर में चाहे कितने ही भटकते फिरें मंज़िले-मक़सूद पर कभी नहीं पहुँच सकते और नबी को किताब से अलग कर दीजिये तो ख़ुदा का रास्ता पाने के बजाए आदमी ना-ख़ुदा ही को ख़ुदा बना बैठने से कभी नहीं बच सकता। ये दोनों ही नतीजे पिछली क़ौमें देख चुकी हैं। हिन्दुओं ने अपने नबियों की सीरतों को गुम किया और सिर्फ़ किताबें लेकर बैठ गए। अंजाम ये हुआ की किताबें उनके लिये लफ़्ज़ी गोरख-धंधों से बढ़कर कुछ न रहीं। यहाँ तक की आख़िरकार ख़ुद उन्हें भी वो गुम कर बैठे। ईसाइयों ने किताब को नज़रअन्दाज़ करके नबी का दामन पकड़ा और उसकी शख़्सियत के गिर्द घूमना शुरू किया। नतीजा ये हुआ की कोई चीज़ उन्हें अल्लाह के नबी को अल्लाह का बेटा बल्कि ठीक अल्लाह बनाने से रोक न सकी।

पुराने दौर की तरह अब इस नए दौर में भी इन्सान को इस्लाम की नेमत मुयस्सर आने के वही दो ज़रिये हैं जो शुरू से चले आ रहे हैं। एक ख़ुदा का कलाम जो अब सिर्फ़ क़ुरआन की सूरत में ही मिल सकता है, दूसरे उस्वए-नुबूवत (नबी का आदर्श) जो अब सिर्फ़ मुहम्मद (सल्ल०) की सीरत की शक्ल ही में महफ़ूज़ है। हमेशा की तरह आज भी इस्लाम का सही फ़हम इन्सान को अगर हासिल हो सकता है तो उसकी सूरत सिर्फ़ ये है की वो क़ुरआन को मुहम्मद (सल्ल०) से और मुहम्मद (सल्ल०) को क़ुरआन से समझे। इन दोनों को एक दूसरे की मदद से जिसने समझ लिया, उसने इस्लाम को समझ लिया। वरना दीन की समझ से भी महरूम रहा और नतीजे तौर पर हिदायत से भी।

फिर, क़ुरआन और मुहम्मद (सल्ल०) दोनों चूँकि एक मिशन रखते हैं। एक मक़सद व मुद्दुआ को लिए आए हैं इसलिये इनको समझने का इन्हिसार (निर्भरता) इस पर है कि हम इनके मिशन और मक़सद व मुद्दुआ को किस हद तक समझते हैं। इस चीज़ को नज़रअंदाज़ करके देखिये तो क़ुरआन, इबारतों (लिखे अलफ़ाज़) का एक ज़ख़ीरा और सीरते-पाक, वाक़िआत व हालात का एक मजमूआ है। आप लुग़त, रिवायात और इल्मी तहक़ीक़ व काविश की मदद से तफ़सीरों के अंबार लगा सकते हैं और तारीख़ी तहक़ीक़ का कमाल दिखाकर रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ज़ात और आप (सल्ल०) के दौर के बारे में सही से सही और ज़्यादा से ज़्यादा मालूमात के ढेर लगा सकते हैं, मगर रूहे-दीन तक नहीं पहुँच सकते, क्योंकि वो इबारतों और वाक़िआत से नहीं बल्कि उस मक़सद से वाबस्ता है जिसके लिये क़ुरआन उतारा गया और मुहम्मदे-अरबी (सल्ल०) को उसी मक़सद को बुलन्द करने के लिए खड़ा किया था। इस मक़सद का तसव्वुर जितना सही होगा उतना ही क़ुरआन और सीरत का सही फ़हम (समझ) और जितना वो नाक़िस (कम) होगा उतना ही इन दोनों का फ़हम नाक़िस रहेगा।

ये एक हक़ीक़त है कि क़ुरआन और सीरते-मुहम्मदी (सल्ल०) दोनों ही ऐसा समन्दर हैं जिसका किनारा नहीं है। कोई इन्सान ये चाहे कि इनके तमाम मआनी (मायनों या अर्थों) और फ़ायदों और बरकतों को समेट ले तो इसमें कभी कामयाब नहीं हो सकता। अलबत्ता जिस चीज़ की कोशिश की जा सकती है वो बस ये है की जिस हद तक मुमकिन हो आदमी उनका ज़्यादा से ज़्यादा सही फ़हम हासिल करे और इनकी मदद से दीन की रूह तक पहुँचने की कोशिश करे।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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