“(ऐ नबी) कह दीजिए कि ऐ अहले-किताब आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान कॉमन है…..।” (क़ुरआन 3:64)
मुसलमानों में जितने मकातिबे-फ़िक्र (school of thoughts) पाए जाते हैं उन सबका मुश्तरिका अक़ीदा है कि इस्लाम इन्सानियत के लिए अल्लाह रब्बुल-आलमीन की सबसे अज़ीम नेमत है। लेकिन जब बात की जाती है
कि इस अज़ीम नेमत का शुक्र अदा करो (कि जितनी बड़ी नेमत होती है उसकी नाशुक्री का वबाल भी उतना ही बड़ा होता है। और इस अज़ीम नेमत का शुक्र ये है कि इसे ठीक उसी तरह इस्तेमाल किया जाए जिस तरह इसका हक़ है) तो बात को ख़ूबसूरती के साथ टाल दिया जाता है और मामला चन्द रुसूमात के अदा कर लेने तक महदूद करके मुत्मइन हो लिया जाता है।
इस बात पर भी सब मकातिबे-फ़िक्र मुत्तफ़िक़ हैं कि इस्लाम एक निज़ामे-ज़िन्दगी का नाम है। लेकिन जब बात की जाती है इस निज़ामे-ज़िन्दगी को मिल-जुलकर एक डिसिप्लिन को फ़ॉलो करते हुए ज़िन्दगी के तमाम शोबों में नाफ़िज़ करने की तो हिम्मतें जवाब दे जाती हैं, दिलो-दिमाग़ में बुज़दिली डेरा डाल लेती है और मसलिहतें दामनगीर हो जाती हैं। फिर नसीहत आमेज़ लहजे में फ़रमान जारी किया जाता है कि इसके लिये जिद्दोजुहुद की ज़रूरत नहीं है बल्कि ये निज़ाम तो उस वक़्त ख़ुद-बख़ुद नाफ़िज़ हो जाएगा जब लोग नमाज़ें पढ़ने लगेंगे।
इस बात से भी उनमें से किसी को इनकार नहीं हो सकता कि अल्लाह ने इसी दीन के अन्दर दुनिया और आख़िरत की कामयाबी रखी है। लेकिन जब बात की जाती है इस कामयाबी को हासिल करने के लिये जिद्दोजुहुद करने की और इसके पैग़ाम को तमाम बन्दगाने-ख़ुदा तक बे-कमो-कास्त पहुँचाने की तो मसरूफ़ियात और दीगर मसलिहतें आड़े आ जाती हैं और कामयाबी के लिये चन्द रिवायती क़िस्म की चीज़ों को ही काफ़ी समझ लिया जाता है।
इस बात पर भी सबका इत्तिफ़ाक़ है कि मुसलमानों को मुत्तहिद होकर एक प्लेटफ़ॉर्म पर आने की ज़रूरत है। लेकिन जब बात की जाती है अपने मसलक और जमाअती तअस्सुब से ऊपर उठकर एक ख़ुदा, एक रसूल और एक किताब (क़ुरआन) की बुनियाद पर मुत्तहिद होने की, तो त्योरियाँ चढ़ जाती हैं और राहें जुदा हो जाती हैं। गोया वो ज़बाने-हाल से इस बात का एलान कर रहे होते हैं कि सब मुसलमान मुत्तहिद तो हों लेकिन मेरे फ़ॉर्मूले यानी मेरे मसलक और मेरे मकतबे-फ़िक्र के मुताबिक़।
अब ज़ाहिर है कि किसी के पास जादू की कोई छड़ी तो है नहीं (जो कि ख़ुद नबी के पास भी नहीं थी, उनको भी जिद्दोजुहुद की दुशवारगुज़ार घाटियाँ बहरहाल पार करनी ही पड़ी थीं) कि जिसे महज़ घुमा देने से वो दीन नाफ़िज़ हो जाएगा जो कि नेमत भी है, ज़ाबताए-हयात भी है और जो दुनिया व आख़िरत की कामयाबी की ज़मानत भी देता है। और न ये ही मुमकिन है कि लोग अपने-अपने मसलक छोड़कर किसी ख़ास मसलक के मुताबिक़ मुत्तहिद हो जाएँगे।
अगर हम वाक़ई इस दीने-रहमत को ग़ालिब करके समाज के अन्दर अम्न व सलामती को क़ायम देखना चाहते हैं तो हमें मसलकी और हर तरह के जमाअती व गरोही तास्सुबात से ऊपर उठकर सिर्फ़ एक अल्लाह, एक रसूल और एक किताब की बुनियाद पर मुनज़्ज़म होना पड़ेगा। और ये काम तभी हो पाएगा जब हम अल्लाह की किताब क़ुरआन को अपने डिस्कशन का मौज़ू बनाएँगे। हमारे गली-मोहल्लों में बाज़ारों और चौबारों में न सिर्फ़ इस क़ुरआन के चर्चे आम हों बल्कि लोगों (और ख़ास तौर से नौजवान नस्ल) के किरदार क़ुरआन के साँचे में ढल जाएँगे।
ज़रा सोचें जब क़ुरआन अहले-किताब (यहूद व नसारा) तक से कॉमन बातों पर बैठकर बात करने की तरफ़ उभारता है तो क्या हम मुसलमान कॉमन बातों पर इत्तिहाद करके आगे नहीं बढ़ सकते? यक़ीनन हाँ!
तो आइए साथियो क़ुरआन को पढ़ने, समझने और इस पर अमल करने की एक मुहिम चलाएँ और इस किताब को नौजवान नस्ल के दरम्यान डिस्कशन का मौज़ू बनाएँ ताकि इस किताब के मतलूबा नतायज हमारे समाज में ज़ाहिर होने लगें।
अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।