मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल
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क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और
दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत ठहराने से,
हम इस्लाम की कोई पॉज़िटिव ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं?
मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल
इंसान की ज़िन्दगी में बहुत-से मामलात ऐसे होते हैं जिनमें वो दो जायज़ चीज़ों में से किसी एक को ग़लत और दूसरी को दुरुस्त मानता है या किसी एक को कम सही और दूसरी को ज़्यादा सही मानता है। होना ये चाहिये कि जिस चीज़ या काम को वो सही या ज़्यादा सही मानता है उस पर मेहनत करे, उसी पर फ़ोकस करे। ये रवैया पॉज़िटिव ऐटिट्यूड कहलाता है। इस ऐटिट्यूड को इख़्तियार करने में इन्सान ख़ुश भी रहता है और काम भी रिज़ल्ट-ओरिएंटेड होता है। इस ऐटिट्यूड से समाज में भी ख़ुशगवार माहौल बना रहता है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि आम तौर से हम मुसलमानों और ख़ास तौर से हमारी जमाअतों का रवैया इसके ख़िलाफ़ होता है। हम लोग उस चीज़ और उन कामों पर फ़ोकस ज़्यादा करते हैं जिनको हम ग़लत या कम सही मानते हैं। ये नेगेटिव ऐटिट्यूड है, इसका नतीजा ये है कि काम कुछ नहीं होता और हम हर वक़्त मनफ़ियत, मुनाफ़िक़त और मुनाफ़िरत का शिकार हो जाते हैं।
मिसाल के तौर पर मुसलमानों में बहुत-से मसलक हैं। आम तौर से माना जाता है कि सभी मसलक सही हैं। मुसलमानों की अक्सरियत किसी न किसी एक मसलक या तरीक़े को सही या ज़्यादा सही मानती है। अब होना तो ये चाहिये कि जिस मसलक को हम सही या ज़्यादा सही मानते हैं पोज़िटिवली उसी पर फ़ोकस करें लेकिन अक्सर देखा गया है कि हमारा फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा होता है कि दूसरा मसलक ग़लत है। बहस का आग़ाज़ दूसरे को ग़लत ठहराने से होता है। नतीजा इस अमल का आपसी ना-इत्तिफ़ाक़ी, इख़्तिलाफ़ और सर-फुटव्वल होता है।
इसी तरह हम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हदीसों को कम अहमियत देते हैं या बिलकुल अहमियत नहीं देते, इसके बरख़िलाफ़ क़ुरआन को ज़्यादा या बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं। अब उनका फ़ोकस इस बात पर नहीं होता कि क़ुरआन को प्रोमोट किया जाए और उसकी तालीमात को लोगों तक पहुँचाने में पॉज़िटिव रोल अदा किया जाए बल्कि उनका फ़ोकस इस बात पर होता है कि अहादीस का इनकार किया जाए या उनकी अहमियत को कम से कम करके उन्हें ख़त्म ही कर दिया जाए। लिहाज़ा उनकी पूरी ज़िन्दगी इसी मुक़द्दस काम में गुज़र जाती है और समाज में कोई मुस्बत रोल अदा कर पाने से महरूम ही रह जाते हैं।
इस बात पर आम तौर से हर मुसलमान का और ख़ास तौर से क़रीब-क़रीब हर बा-शुऊर मुसलमान का इत्तिफ़ाक़ है कि इस्लाम आख़िरी इलाही और आसमानी दीन है, इस ऐतिबार से दुनिया के तमाम ही दीनों-मज़ाहिब पर इसकी बरतरी मुसल्लम है। अब इख़्तिलाफ़ इस बात में है कि ये बरतरी हम मुसलमानों को सियासी, समाजी और अख़लाक़ी हर सतह पर साबित करनी है या महज़ समाजी और अख़लाक़ी सतह पर। जो लोग सियासी सतह पर बरतरी को ग़लत या कम सही मानते हैं अब उनका सारा फ़ोकस इस बात पर है कि सियासी तौर पर इस्लाम की बरतरी के लिये जिद्दोजुहद कर रहे लोगों से इस क़द्र इख़्तिलाफ़ किया जाए कि उनकी कोशिशों को क़ुरआन व सुन्नत के ख़िलाफ़ साबित कर दें यही हाल इसके मुक़ाबिल दूसरे गरोह का भी है। नतीजा इस अमल का भी यही है कि इस्लाम दुश्मन अनासिर इसका फ़ायदा उठा ले जाते हैं।
अगर हम मुसलमान इस बुनियादी बात को समझ लें और जो लोग या जमाअतें भी इस्लाम के लिये काम कर रही हैं वो अपने-अपने नज़रिये और फ़िक्र के मुताबिक़ अपने अजेंडे पर मुख़लिसाना तौर पर काम करें और दूसरे को ग़लत साबित करने की फ़िक्र से दस्तबरदार हो जाएँ तो यक़ीन जानिये कुछ हो न हो कम से कम इतना काम तो ज़रूर हो जाएगा कि आपसी सर-फुटव्वल से मिल्लत महफ़ूज़ हो जाएगी।
हम में से हर शख़्स और हर जमाअत को कम से कम इतनी फ़िक्र ज़रूर होनी चाहिये कि मेरी/हमारी हर कोशिश और जिद्दोजुहद का फ़ायदा अल्टीमेटली इस्लाम और इन्सानियत को पहुँचे न कि इस्लाम और इन्सानियत के दुश्मनों को।
“अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करो और आपस में झगड़ो नहीं, वरना तुम्हारे अन्दर कमज़ोरी पैदा हो जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।” (क़ुरआन 8:46)