Millat mein Ittehad ki kam se kam shakl

Millat mein Ittehad ki kam se kam shakl

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

—   —   —

क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और

दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत ठहराने से,

हम इस्लाम की कोई पॉज़िटिव ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं?

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

इंसान की ज़िन्दगी में बहुत-से मामलात ऐसे होते हैं जिनमें वो दो जायज़ चीज़ों में से किसी एक को ग़लत और दूसरी को दुरुस्त मानता है या किसी एक को कम सही और दूसरी को ज़्यादा सही मानता है। होना ये चाहिये कि जिस चीज़ या काम को वो सही या ज़्यादा सही मानता है उस पर मेहनत करे, उसी पर फ़ोकस करे। ये रवैया पॉज़िटिव ऐटिट्यूड कहलाता है। इस ऐटिट्यूड को इख़्तियार करने में इन्सान ख़ुश भी रहता है और काम भी रिज़ल्ट-ओरिएंटेड होता है। इस ऐटिट्यूड से समाज में भी ख़ुशगवार माहौल बना रहता है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि आम तौर से हम मुसलमानों और ख़ास तौर से हमारी जमाअतों का रवैया इसके ख़िलाफ़ होता है। हम लोग उस चीज़ और उन कामों पर फ़ोकस ज़्यादा करते हैं जिनको हम ग़लत या कम सही मानते हैं। ये नेगेटिव ऐटिट्यूड है, इसका नतीजा ये है कि काम कुछ नहीं होता और हम हर वक़्त मनफ़ियत, मुनाफ़िक़त और मुनाफ़िरत का शिकार हो जाते हैं।

मिसाल के तौर पर मुसलमानों में बहुत-से मसलक हैं। आम तौर से माना जाता है कि सभी मसलक सही हैं। मुसलमानों की अक्सरियत किसी न किसी एक मसलक या तरीक़े को सही या ज़्यादा सही मानती है। अब होना तो ये चाहिये कि जिस मसलक को हम सही या ज़्यादा सही मानते हैं पोज़िटिवली उसी पर फ़ोकस करें लेकिन अक्सर देखा गया है कि हमारा फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा होता है कि दूसरा मसलक ग़लत है। बहस का आग़ाज़ दूसरे को ग़लत ठहराने से होता है। नतीजा इस अमल का आपसी ना-इत्तिफ़ाक़ी, इख़्तिलाफ़ और सर-फुटव्वल होता है।

इसी तरह हम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हदीसों को कम अहमियत देते हैं या बिलकुल अहमियत नहीं देते, इसके बरख़िलाफ़ क़ुरआन को ज़्यादा या बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं। अब उनका फ़ोकस इस बात पर नहीं होता कि क़ुरआन को प्रोमोट किया जाए और उसकी तालीमात को लोगों तक पहुँचाने में पॉज़िटिव रोल अदा किया जाए बल्कि उनका फ़ोकस इस बात पर होता है कि अहादीस का इनकार किया जाए या उनकी अहमियत को कम से कम करके उन्हें ख़त्म ही कर दिया जाए। लिहाज़ा उनकी पूरी ज़िन्दगी इसी मुक़द्दस काम में गुज़र जाती है और समाज में कोई मुस्बत रोल अदा कर पाने से महरूम ही रह जाते हैं।

इस बात पर आम तौर से हर मुसलमान का और ख़ास तौर से क़रीब-क़रीब हर बा-शुऊर मुसलमान का इत्तिफ़ाक़ है कि इस्लाम आख़िरी इलाही और आसमानी दीन है, इस ऐतिबार से दुनिया के तमाम ही दीनों-मज़ाहिब पर इसकी बरतरी मुसल्लम है। अब इख़्तिलाफ़ इस बात में है कि ये बरतरी हम मुसलमानों को सियासी, समाजी और अख़लाक़ी हर सतह पर साबित करनी है या महज़ समाजी और अख़लाक़ी सतह पर। जो लोग सियासी सतह पर बरतरी को ग़लत या कम सही मानते हैं अब उनका सारा फ़ोकस इस बात पर है कि सियासी तौर पर इस्लाम की बरतरी के लिये जिद्दोजुहद कर रहे लोगों से इस क़द्र इख़्तिलाफ़ किया जाए कि उनकी कोशिशों को क़ुरआन व सुन्नत के ख़िलाफ़ साबित कर दें यही हाल इसके मुक़ाबिल दूसरे गरोह का भी है। नतीजा इस अमल का भी यही है कि इस्लाम दुश्मन अनासिर इसका फ़ायदा उठा ले जाते हैं।

अगर हम मुसलमान इस बुनियादी बात को समझ लें और जो लोग या जमाअतें भी इस्लाम के लिये काम कर रही हैं वो अपने-अपने नज़रिये और फ़िक्र के मुताबिक़ अपने अजेंडे पर मुख़लिसाना तौर पर काम करें और दूसरे को ग़लत साबित करने की फ़िक्र से दस्तबरदार हो जाएँ तो यक़ीन जानिये कुछ हो न हो कम से कम इतना काम तो ज़रूर हो जाएगा कि आपसी सर-फुटव्वल से मिल्लत महफ़ूज़ हो जाएगी।

हम में से हर शख़्स और हर जमाअत को कम से कम इतनी फ़िक्र ज़रूर होनी चाहिये कि मेरी/हमारी हर कोशिश और जिद्दोजुहद का फ़ायदा अल्टीमेटली इस्लाम और इन्सानियत को पहुँचे न कि इस्लाम और इन्सानियत के दुश्मनों को।

“अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करो और आपस में झगड़ो नहीं, वरना तुम्हारे अन्दर कमज़ोरी पैदा हो जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।” (क़ुरआन 8:46)

Is simply beating the drum of Hadith rejection,
or
Constantly criticizing other groups and personalities,
a real and positive service to Islam?

Today, even the most basic form of unity within the Muslim Ummah seems absent.

In human life, there are many matters in which one must choose between two valid options. Often, a person considers one more correct than the other, which is natural.
What is required is that he focuses his effort on promoting what he sees as the more correct path — this is known as a positive attitude.

Such an approach keeps a person content, makes his work productive, and fosters a healthy, constructive environment in society.

But sadly, our general attitude as Muslims — and especially among our religious groups — is quite the opposite.
We tend to focus more on what we believe is wrong, rather than investing our energies into what we believe is right.
This is a negative mindset, and its result is that we remain consumed by division, suspicion, and hostility, and achieve nothing of substance.

Take, for example, the various schools of thought (maslak) within the Muslim community.
It is generally accepted that all are valid to some degree.
Still, instead of positively promoting the school of thought we believe in, we often waste our energy in trying to prove the others wrong.
The discussion begins not with sharing truth, but with denouncing others, and the result is division, disagreement, and infighting.

Similarly, there are those who give little or no importance to Hadith and exclusively emphasize the Qur’an.
But instead of promoting the teachings of the Qur’an, they focus entirely on rejecting Hadith, minimizing its role, or even erasing it altogether.
Thus, their entire life is consumed in this “sacred mission”, while they fail to make any positive contribution to society.

Almost every conscious Muslim agrees that Islam is the final divine religion, superior to all previous faiths.
But the disagreement arises:
Should this superiority be established politically, socially, and morally, or only socially and morally?

Those who oppose the political assertion of Islam invest all their energy in undermining those who strive for it, sometimes even labeling their efforts un-Islamic.
The opposing side, too, behaves in the same way.
And the outcome?
Enemies of Islam exploit the rift.

If we, as Muslims, truly care about reviving Islam’s image and restoring the dignity of the Ummah, then:

  • Let every individual and group working for Islam do so sincerely and in their own way,

  • And abandon the obsession with proving others wrong.

Believe me, even if nothing else is achieved, at least the Ummah will be spared from internal conflicts.

Each of us — every individual, every group — must ask:
Will my effort ultimately benefit Islam and humanity, or will it empower the enemies of truth?

As the Qur’an commands:

“And obey Allah and His Messenger, and do not dispute with one another, lest you lose courage and your strength departs.”
(Surah Al-Anfal, 8:46)

کیا محض انکارِ حدیث کا ڈھول پیٹتے رہنے سے
اور
دوسری جماعتوں اور شخصیات کو غلط ثابت کرنے میں وقت اور توانائی صرف کرنے سے
ہم اسلام کی کوئی مثبت خدمت انجام دے رہے ہیں؟

آج ملت میں اتحاد کی ادنیٰ صورت بھی مفقود ہے۔
انسان کی زندگی میں بہت سے ایسے معاملات ہوتے ہیں جن میں وہ دو جائز باتوں میں سے کسی ایک کو زیادہ درست اور دوسری کو کم درست سمجھتا ہے، یا کسی ایک کو صحیح اور دوسری کو غلط قرار دیتا ہے۔
ایسی صورت میں ہونا تو یہ چاہیے کہ جو بات یا عمل وہ زیادہ صحیح سمجھتا ہے، اُسی پر توجہ دے، اُسی پر محنت کرے۔
یہی رویہ مثبت طرزِ فکر (Positive Attitude) کہلاتا ہے — اور یہی وہ طرز ہے جس سے انسان نہ صرف خود خوش رہتا ہے بلکہ اس کا کام بھی نتیجہ خیز ہوتا ہے، اور معاشرہ بھی ایک خوشگوار ماحول کا حامل بنتا ہے۔

مگر افسوس کہ ہم مسلمانوں کی عمومی اور دینی جماعتوں کی خصوصی روش اس کے برخلاف ہے۔
ہم اس بات پر زیادہ فوکس کرتے ہیں کہ کون غلط ہے، کیا غلط ہے، بجائے اس کے کہ جو صحیح ہے، اس کو عام کریں۔
یہ منفی طرزِ فکر (Negative Attitude) ہمیں مسلسل انتشار، نفاق اور باہمی نفرتوں میں مبتلا رکھتا ہے۔

مثال کے طور پر، مسلمانوں میں مختلف مسالک ہیں۔
عام طور پر تسلیم کیا جاتا ہے کہ ہر مسلک اپنی جگہ کسی نہ کسی درجے میں درست ہے۔
اب جس مسلک کو ہم زیادہ صحیح سمجھتے ہیں، ہمیں چاہیے کہ ہم مثبت انداز میں اسی کی تعلیمات پر توجہ دیں، مگر ہوتا یہ ہے کہ ہم دوسرے مسلک کی غلطی تلاش کرنے اور اسے رد کرنے پر اپنی تمام توانائیاں صرف کر دیتے ہیں۔
نتیجہ: اختلاف، بے چینی، اور باہمی جھگڑے۔

اسی طرح کچھ لوگ احادیث کو کم اہمیت دیتے ہیں یا بالکل رد کر دیتے ہیں، اور صرف قرآن کو مرکزی حیثیت دینا چاہتے ہیں۔
مگر ان کا فوکس قرآن کی تعلیمات کو پھیلانا نہیں ہوتا، بلکہ احادیث کا انکار کرنا، یا ان کی اہمیت کو گھٹانا ہوتا ہے۔
چنانچہ ان کی ساری زندگی اسی “مقدس جدوجہد” میں گزرتی ہے، اور وہ معاشرے میں کوئی مثبت کردار ادا کرنے سے محروم رہ جاتے ہیں۔

یہ بات تقریبا ہر باشعور مسلمان تسلیم کرتا ہے کہ اسلام آخری الٰہی دین ہے، جو تمام سابقہ ادیان پر برتری رکھتا ہے۔
اب اختلاف صرف اس بات میں ہے کہ
کیا ہمیں یہ برتری سیاسی، معاشرتی اور اخلاقی ہر سطح پر ثابت کرنی ہے،
یا صرف معاشرتی و اخلاقی سطح پر؟

جو لوگ اسلام کے سیاسی غلبے کو کم اہم یا غیر مناسب سمجھتے ہیں، ان کا سارا زور ان لوگوں کو رد کرنے پر ہوتا ہے جو اسلامی سیاسی نظام کے لیے جدوجہد کر رہے ہوتے ہیں — اور اس جدوجہد کو قرآن و سنت کے خلاف ثابت کرنے کی کوشش کرتے ہیں۔
اور دوسری طرف وہ گروہ بھی یہی رویہ اپناتا ہے۔
نتیجہ؟ دشمنانِ اسلام فائدہ اٹھا لیتے ہیں۔

اگر ہم واقعی اسلام اور مسلمانوں کے خیرخواہ ہیں،
تو ہمیں چاہیے کہ:

جو فرد یا جماعت بھی خلوص نیت سے اسلام کی خدمت کر رہی ہے،
وہ اپنے نظریے کے مطابق اپنا کام جاری رکھے،

دوسروں کو غلط ثابت کرنے کی فکر کو ترک کر دے۔

یقین جانیں! اگر ہم صرف یہی کر لیں، تو کم از کم ملت آپس کی لڑائیوں سے محفوظ ہو جائے گی۔

ہم سب — ہر فرد اور ہر جماعت — کو اس بات کی فکر ہونی چاہیے کہ:
ہماری ہر کوشش، ہر تحریک کا نفع آخرکار اسلام اور انسانیت کو پہنچے — نہ کہ اسلام کے دشمنوں کو۔

جیسے قرآن میں فرمایا:

وَأَطِیْعُوا اللّٰہَ وَرَسُوْلَهُ وَلَا تَنَازَعُوْا فَتَفْشَلُوْا وَتَذْهَبَ رِیْحُكُمْ ۚ
“اللہ اور اس کے رسول کی اطاعت کرو، اور آپس میں جھگڑا مت کرو، ورنہ تم کمزور پڑ جاؤ گے اور تمہاری ہوا (رعب) اُکھڑ جائے گی۔”
(سورۃ الانفال، آیت 46)

 

Hindi

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

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क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और

दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत ठहराने से,

हम इस्लाम की कोई पॉज़िटिव ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं?

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

इंसान की ज़िन्दगी में बहुत-से मामलात ऐसे होते हैं जिनमें वो दो जायज़ चीज़ों में से किसी एक को ग़लत और दूसरी को दुरुस्त मानता है या किसी एक को कम सही और दूसरी को ज़्यादा सही मानता है। होना ये चाहिये कि जिस चीज़ या काम को वो सही या ज़्यादा सही मानता है उस पर मेहनत करे, उसी पर फ़ोकस करे। ये रवैया पॉज़िटिव ऐटिट्यूड कहलाता है। इस ऐटिट्यूड को इख़्तियार करने में इन्सान ख़ुश भी रहता है और काम भी रिज़ल्ट-ओरिएंटेड होता है। इस ऐटिट्यूड से समाज में भी ख़ुशगवार माहौल बना रहता है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि आम तौर से हम मुसलमानों और ख़ास तौर से हमारी जमाअतों का रवैया इसके ख़िलाफ़ होता है। हम लोग उस चीज़ और उन कामों पर फ़ोकस ज़्यादा करते हैं जिनको हम ग़लत या कम सही मानते हैं। ये नेगेटिव ऐटिट्यूड है, इसका नतीजा ये है कि काम कुछ नहीं होता और हम हर वक़्त मनफ़ियत, मुनाफ़िक़त और मुनाफ़िरत का शिकार हो जाते हैं।

मिसाल के तौर पर मुसलमानों में बहुत-से मसलक हैं। आम तौर से माना जाता है कि सभी मसलक सही हैं। मुसलमानों की अक्सरियत किसी न किसी एक मसलक या तरीक़े को सही या ज़्यादा सही मानती है। अब होना तो ये चाहिये कि जिस मसलक को हम सही या ज़्यादा सही मानते हैं पोज़िटिवली उसी पर फ़ोकस करें लेकिन अक्सर देखा गया है कि हमारा फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा होता है कि दूसरा मसलक ग़लत है। बहस का आग़ाज़ दूसरे को ग़लत ठहराने से होता है। नतीजा इस अमल का आपसी ना-इत्तिफ़ाक़ी, इख़्तिलाफ़ और सर-फुटव्वल होता है।

इसी तरह हम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हदीसों को कम अहमियत देते हैं या बिलकुल अहमियत नहीं देते, इसके बरख़िलाफ़ क़ुरआन को ज़्यादा या बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं। अब उनका फ़ोकस इस बात पर नहीं होता कि क़ुरआन को प्रोमोट किया जाए और उसकी तालीमात को लोगों तक पहुँचाने में पॉज़िटिव रोल अदा किया जाए बल्कि उनका फ़ोकस इस बात पर होता है कि अहादीस का इनकार किया जाए या उनकी अहमियत को कम से कम करके उन्हें ख़त्म ही कर दिया जाए। लिहाज़ा उनकी पूरी ज़िन्दगी इसी मुक़द्दस काम में गुज़र जाती है और समाज में कोई मुस्बत रोल अदा कर पाने से महरूम ही रह जाते हैं।

इस बात पर आम तौर से हर मुसलमान का और ख़ास तौर से क़रीब-क़रीब हर बा-शुऊर मुसलमान का इत्तिफ़ाक़ है कि इस्लाम आख़िरी इलाही और आसमानी दीन है, इस ऐतिबार से दुनिया के तमाम ही दीनों-मज़ाहिब पर इसकी बरतरी मुसल्लम है। अब इख़्तिलाफ़ इस बात में है कि ये बरतरी हम मुसलमानों को सियासी, समाजी और अख़लाक़ी हर सतह पर साबित करनी है या महज़ समाजी और अख़लाक़ी सतह पर। जो लोग सियासी सतह पर बरतरी को ग़लत या कम सही मानते हैं अब उनका सारा फ़ोकस इस बात पर है कि सियासी तौर पर इस्लाम की बरतरी के लिये जिद्दोजुहद कर रहे लोगों से इस क़द्र इख़्तिलाफ़ किया जाए कि उनकी कोशिशों को क़ुरआन व सुन्नत के ख़िलाफ़ साबित कर दें यही हाल इसके मुक़ाबिल दूसरे गरोह का भी है। नतीजा इस अमल का भी यही है कि इस्लाम दुश्मन अनासिर इसका फ़ायदा उठा ले जाते हैं।

अगर हम मुसलमान इस बुनियादी बात को समझ लें और जो लोग या जमाअतें भी इस्लाम के लिये काम कर रही हैं वो अपने-अपने नज़रिये और फ़िक्र के मुताबिक़ अपने अजेंडे पर मुख़लिसाना तौर पर काम करें और दूसरे को ग़लत साबित करने की फ़िक्र से दस्तबरदार हो जाएँ तो यक़ीन जानिये कुछ हो न हो कम से कम इतना काम तो ज़रूर हो जाएगा कि आपसी सर-फुटव्वल से मिल्लत महफ़ूज़ हो जाएगी।

हम में से हर शख़्स और हर जमाअत को कम से कम इतनी फ़िक्र ज़रूर होनी चाहिये कि मेरी/हमारी हर कोशिश और जिद्दोजुहद का फ़ायदा अल्टीमेटली इस्लाम और इन्सानियत को पहुँचे न कि इस्लाम और इन्सानियत के दुश्मनों को।

“अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करो और आपस में झगड़ो नहीं, वरना तुम्हारे अन्दर कमज़ोरी पैदा हो जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।” (क़ुरआन 8:46)

Is simply beating the drum of Hadith rejection,
or
Constantly criticizing other groups and personalities,
a real and positive service to Islam?

Today, even the most basic form of unity within the Muslim Ummah seems absent.

In human life, there are many matters in which one must choose between two valid options. Often, a person considers one more correct than the other, which is natural.
What is required is that he focuses his effort on promoting what he sees as the more correct path — this is known as a positive attitude.

Such an approach keeps a person content, makes his work productive, and fosters a healthy, constructive environment in society.

But sadly, our general attitude as Muslims — and especially among our religious groups — is quite the opposite.
We tend to focus more on what we believe is wrong, rather than investing our energies into what we believe is right.
This is a negative mindset, and its result is that we remain consumed by division, suspicion, and hostility, and achieve nothing of substance.

Take, for example, the various schools of thought (maslak) within the Muslim community.
It is generally accepted that all are valid to some degree.
Still, instead of positively promoting the school of thought we believe in, we often waste our energy in trying to prove the others wrong.
The discussion begins not with sharing truth, but with denouncing others, and the result is division, disagreement, and infighting.

Similarly, there are those who give little or no importance to Hadith and exclusively emphasize the Qur’an.
But instead of promoting the teachings of the Qur’an, they focus entirely on rejecting Hadith, minimizing its role, or even erasing it altogether.
Thus, their entire life is consumed in this “sacred mission”, while they fail to make any positive contribution to society.

Almost every conscious Muslim agrees that Islam is the final divine religion, superior to all previous faiths.
But the disagreement arises:
Should this superiority be established politically, socially, and morally, or only socially and morally?

Those who oppose the political assertion of Islam invest all their energy in undermining those who strive for it, sometimes even labeling their efforts un-Islamic.
The opposing side, too, behaves in the same way.
And the outcome?
Enemies of Islam exploit the rift.

If we, as Muslims, truly care about reviving Islam’s image and restoring the dignity of the Ummah, then:

  • Let every individual and group working for Islam do so sincerely and in their own way,

  • And abandon the obsession with proving others wrong.

Believe me, even if nothing else is achieved, at least the Ummah will be spared from internal conflicts.

Each of us — every individual, every group — must ask:
Will my effort ultimately benefit Islam and humanity, or will it empower the enemies of truth?

As the Qur’an commands:

“And obey Allah and His Messenger, and do not dispute with one another, lest you lose courage and your strength departs.”
(Surah Al-Anfal, 8:46)

کیا محض انکارِ حدیث کا ڈھول پیٹتے رہنے سے
اور
دوسری جماعتوں اور شخصیات کو غلط ثابت کرنے میں وقت اور توانائی صرف کرنے سے
ہم اسلام کی کوئی مثبت خدمت انجام دے رہے ہیں؟

آج ملت میں اتحاد کی ادنیٰ صورت بھی مفقود ہے۔
انسان کی زندگی میں بہت سے ایسے معاملات ہوتے ہیں جن میں وہ دو جائز باتوں میں سے کسی ایک کو زیادہ درست اور دوسری کو کم درست سمجھتا ہے، یا کسی ایک کو صحیح اور دوسری کو غلط قرار دیتا ہے۔
ایسی صورت میں ہونا تو یہ چاہیے کہ جو بات یا عمل وہ زیادہ صحیح سمجھتا ہے، اُسی پر توجہ دے، اُسی پر محنت کرے۔
یہی رویہ مثبت طرزِ فکر (Positive Attitude) کہلاتا ہے — اور یہی وہ طرز ہے جس سے انسان نہ صرف خود خوش رہتا ہے بلکہ اس کا کام بھی نتیجہ خیز ہوتا ہے، اور معاشرہ بھی ایک خوشگوار ماحول کا حامل بنتا ہے۔

مگر افسوس کہ ہم مسلمانوں کی عمومی اور دینی جماعتوں کی خصوصی روش اس کے برخلاف ہے۔
ہم اس بات پر زیادہ فوکس کرتے ہیں کہ کون غلط ہے، کیا غلط ہے، بجائے اس کے کہ جو صحیح ہے، اس کو عام کریں۔
یہ منفی طرزِ فکر (Negative Attitude) ہمیں مسلسل انتشار، نفاق اور باہمی نفرتوں میں مبتلا رکھتا ہے۔

مثال کے طور پر، مسلمانوں میں مختلف مسالک ہیں۔
عام طور پر تسلیم کیا جاتا ہے کہ ہر مسلک اپنی جگہ کسی نہ کسی درجے میں درست ہے۔
اب جس مسلک کو ہم زیادہ صحیح سمجھتے ہیں، ہمیں چاہیے کہ ہم مثبت انداز میں اسی کی تعلیمات پر توجہ دیں، مگر ہوتا یہ ہے کہ ہم دوسرے مسلک کی غلطی تلاش کرنے اور اسے رد کرنے پر اپنی تمام توانائیاں صرف کر دیتے ہیں۔
نتیجہ: اختلاف، بے چینی، اور باہمی جھگڑے۔

اسی طرح کچھ لوگ احادیث کو کم اہمیت دیتے ہیں یا بالکل رد کر دیتے ہیں، اور صرف قرآن کو مرکزی حیثیت دینا چاہتے ہیں۔
مگر ان کا فوکس قرآن کی تعلیمات کو پھیلانا نہیں ہوتا، بلکہ احادیث کا انکار کرنا، یا ان کی اہمیت کو گھٹانا ہوتا ہے۔
چنانچہ ان کی ساری زندگی اسی “مقدس جدوجہد” میں گزرتی ہے، اور وہ معاشرے میں کوئی مثبت کردار ادا کرنے سے محروم رہ جاتے ہیں۔

یہ بات تقریبا ہر باشعور مسلمان تسلیم کرتا ہے کہ اسلام آخری الٰہی دین ہے، جو تمام سابقہ ادیان پر برتری رکھتا ہے۔
اب اختلاف صرف اس بات میں ہے کہ
کیا ہمیں یہ برتری سیاسی، معاشرتی اور اخلاقی ہر سطح پر ثابت کرنی ہے،
یا صرف معاشرتی و اخلاقی سطح پر؟

جو لوگ اسلام کے سیاسی غلبے کو کم اہم یا غیر مناسب سمجھتے ہیں، ان کا سارا زور ان لوگوں کو رد کرنے پر ہوتا ہے جو اسلامی سیاسی نظام کے لیے جدوجہد کر رہے ہوتے ہیں — اور اس جدوجہد کو قرآن و سنت کے خلاف ثابت کرنے کی کوشش کرتے ہیں۔
اور دوسری طرف وہ گروہ بھی یہی رویہ اپناتا ہے۔
نتیجہ؟ دشمنانِ اسلام فائدہ اٹھا لیتے ہیں۔

اگر ہم واقعی اسلام اور مسلمانوں کے خیرخواہ ہیں،
تو ہمیں چاہیے کہ:

جو فرد یا جماعت بھی خلوص نیت سے اسلام کی خدمت کر رہی ہے،
وہ اپنے نظریے کے مطابق اپنا کام جاری رکھے،

دوسروں کو غلط ثابت کرنے کی فکر کو ترک کر دے۔

یقین جانیں! اگر ہم صرف یہی کر لیں، تو کم از کم ملت آپس کی لڑائیوں سے محفوظ ہو جائے گی۔

ہم سب — ہر فرد اور ہر جماعت — کو اس بات کی فکر ہونی چاہیے کہ:
ہماری ہر کوشش، ہر تحریک کا نفع آخرکار اسلام اور انسانیت کو پہنچے — نہ کہ اسلام کے دشمنوں کو۔

جیسے قرآن میں فرمایا:

وَأَطِیْعُوا اللّٰہَ وَرَسُوْلَهُ وَلَا تَنَازَعُوْا فَتَفْشَلُوْا وَتَذْهَبَ رِیْحُكُمْ ۚ
“اللہ اور اس کے رسول کی اطاعت کرو، اور آپس میں جھگڑا مت کرو، ورنہ تم کمزور پڑ جاؤ گے اور تمہاری ہوا (رعب) اُکھڑ جائے گی۔”
(سورۃ الانفال، آیت 46)

 

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

—   —   —

क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और

दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत ठहराने से,

हम इस्लाम की कोई पॉज़िटिव ख़िदमात अंजाम दे रहे हैं?

मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल

इंसान की ज़िन्दगी में बहुत-से मामलात ऐसे होते हैं जिनमें वो दो जायज़ चीज़ों में से किसी एक को ग़लत और दूसरी को दुरुस्त मानता है या किसी एक को कम सही और दूसरी को ज़्यादा सही मानता है। होना ये चाहिये कि जिस चीज़ या काम को वो सही या ज़्यादा सही मानता है उस पर मेहनत करे, उसी पर फ़ोकस करे। ये रवैया पॉज़िटिव ऐटिट्यूड कहलाता है। इस ऐटिट्यूड को इख़्तियार करने में इन्सान ख़ुश भी रहता है और काम भी रिज़ल्ट-ओरिएंटेड होता है। इस ऐटिट्यूड से समाज में भी ख़ुशगवार माहौल बना रहता है। लेकिन अक्सर देखने में आता है कि आम तौर से हम मुसलमानों और ख़ास तौर से हमारी जमाअतों का रवैया इसके ख़िलाफ़ होता है। हम लोग उस चीज़ और उन कामों पर फ़ोकस ज़्यादा करते हैं जिनको हम ग़लत या कम सही मानते हैं। ये नेगेटिव ऐटिट्यूड है, इसका नतीजा ये है कि काम कुछ नहीं होता और हम हर वक़्त मनफ़ियत, मुनाफ़िक़त और मुनाफ़िरत का शिकार हो जाते हैं।

मिसाल के तौर पर मुसलमानों में बहुत-से मसलक हैं। आम तौर से माना जाता है कि सभी मसलक सही हैं। मुसलमानों की अक्सरियत किसी न किसी एक मसलक या तरीक़े को सही या ज़्यादा सही मानती है। अब होना तो ये चाहिये कि जिस मसलक को हम सही या ज़्यादा सही मानते हैं पोज़िटिवली उसी पर फ़ोकस करें लेकिन अक्सर देखा गया है कि हमारा फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा होता है कि दूसरा मसलक ग़लत है। बहस का आग़ाज़ दूसरे को ग़लत ठहराने से होता है। नतीजा इस अमल का आपसी ना-इत्तिफ़ाक़ी, इख़्तिलाफ़ और सर-फुटव्वल होता है।

इसी तरह हम में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हदीसों को कम अहमियत देते हैं या बिलकुल अहमियत नहीं देते, इसके बरख़िलाफ़ क़ुरआन को ज़्यादा या बहुत ज़्यादा अहमियत देते हैं। अब उनका फ़ोकस इस बात पर नहीं होता कि क़ुरआन को प्रोमोट किया जाए और उसकी तालीमात को लोगों तक पहुँचाने में पॉज़िटिव रोल अदा किया जाए बल्कि उनका फ़ोकस इस बात पर होता है कि अहादीस का इनकार किया जाए या उनकी अहमियत को कम से कम करके उन्हें ख़त्म ही कर दिया जाए। लिहाज़ा उनकी पूरी ज़िन्दगी इसी मुक़द्दस काम में गुज़र जाती है और समाज में कोई मुस्बत रोल अदा कर पाने से महरूम ही रह जाते हैं।

इस बात पर आम तौर से हर मुसलमान का और ख़ास तौर से क़रीब-क़रीब हर बा-शुऊर मुसलमान का इत्तिफ़ाक़ है कि इस्लाम आख़िरी इलाही और आसमानी दीन है, इस ऐतिबार से दुनिया के तमाम ही दीनों-मज़ाहिब पर इसकी बरतरी मुसल्लम है। अब इख़्तिलाफ़ इस बात में है कि ये बरतरी हम मुसलमानों को सियासी, समाजी और अख़लाक़ी हर सतह पर साबित करनी है या महज़ समाजी और अख़लाक़ी सतह पर। जो लोग सियासी सतह पर बरतरी को ग़लत या कम सही मानते हैं अब उनका सारा फ़ोकस इस बात पर है कि सियासी तौर पर इस्लाम की बरतरी के लिये जिद्दोजुहद कर रहे लोगों से इस क़द्र इख़्तिलाफ़ किया जाए कि उनकी कोशिशों को क़ुरआन व सुन्नत के ख़िलाफ़ साबित कर दें यही हाल इसके मुक़ाबिल दूसरे गरोह का भी है। नतीजा इस अमल का भी यही है कि इस्लाम दुश्मन अनासिर इसका फ़ायदा उठा ले जाते हैं।

अगर हम मुसलमान इस बुनियादी बात को समझ लें और जो लोग या जमाअतें भी इस्लाम के लिये काम कर रही हैं वो अपने-अपने नज़रिये और फ़िक्र के मुताबिक़ अपने अजेंडे पर मुख़लिसाना तौर पर काम करें और दूसरे को ग़लत साबित करने की फ़िक्र से दस्तबरदार हो जाएँ तो यक़ीन जानिये कुछ हो न हो कम से कम इतना काम तो ज़रूर हो जाएगा कि आपसी सर-फुटव्वल से मिल्लत महफ़ूज़ हो जाएगी।

हम में से हर शख़्स और हर जमाअत को कम से कम इतनी फ़िक्र ज़रूर होनी चाहिये कि मेरी/हमारी हर कोशिश और जिद्दोजुहद का फ़ायदा अल्टीमेटली इस्लाम और इन्सानियत को पहुँचे न कि इस्लाम और इन्सानियत के दुश्मनों को।

“अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करो और आपस में झगड़ो नहीं, वरना तुम्हारे अन्दर कमज़ोरी पैदा हो जाएगी और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।” (क़ुरआन 8:46)

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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