मसलकों और जमाअतों के तअस्सुब से बाहर आइये

मसलकों और जमाअतों के तअस्सुब से बाहर आइये

उम्मत के लिये ये बात किसी अलमिये (दर्दनाक वाक़िए) से कम नहीं है कि जो मसलक फ़ुरुई (जुज़्वी और मामूली) मामलों में रहनुमाई के लिये वुजूद में आए थे वो मसलक आज दीन की हैसियत इख़्तियार कर गए हैं। ये नासूर हमारी उम्मत में इस हद तक सरायत कर गया है कि हमारी मसाजिद और मदारिस की पहचान मसलकों से होती है। (अगर ग़ौर किया जाए तो आपस में इन्तिशार और इख़्तिलाफ़ का ये कैंसर इस हद तक भी पाया जाता है कि हमारी मस्जिदों की पहचान जमाअतों और ब्रादरियों तक से भी होती है) हमारे गिर्द मसलकों और जमाअतों की दीवारें इतनी मोटी और मज़बूत हो चुकी हैं कि हमें किसी दूसरी जमाअत और मसलक में कोई ख़ूबी नज़र ही नहीं आती है। हम दीन की तबलीग़ और इशाअत की आड़ में अपने मसलक और अपनी जमाअतों की तबलीग़ और इशाअत कर रहे होते हैं।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अहादीस के रद्दो-क़बूल को बुनियाद बनाकर एक-दूसरे की टाँग खिंचाई करने के बजाय हम क़ुरआन को मैयार मानकर नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे का तआवुन करते और मुआशरे को ख़ुशहाल बनाने की कोशिश करते। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साज़िशें करने और गुनाह व ज़्यादती की बातें करने के बजाय नेकी और ख़ुदा-तरसी की बातें करते। क्योंकि क़ुरआन का हुक्म है कि

تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ۪ وَ لَا تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ ۪ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ شَدِیۡدُ الۡعِقَابِ

जो काम नेकी और ख़ुदातरसी के हैं उनमें सबकी मदद करो और जो गुनाह और ज़्यादती के काम हैं उनमें किसी की मदद न करो। अल्लाह से डरो, उसकी सज़ा बहुत सख़्त है। (5:2)

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا تَنَاجَیۡتُمۡ فَلَا تَتَنَاجَوۡا بِالۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ وَ مَعۡصِیَتِ الرَّسُوۡلِ وَ تَنَاجَوۡا بِالۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ؕ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ الَّذِیۡۤ اِلَیۡہِ تُحۡشَرُوۡنَ

ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! जब तुम आपस में पोशीदा बात करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की नाफ़रमानी की बातें नहीं, बल्कि नेकी और तक़वा की बातें करो और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसके दरबार में तुम्हें हश्र के दिन पेश होना है। (58:9)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम सिर्फ़ अपने बुज़ुर्गों और अपने उलमा के एहतिराम के बजाय अपने नौजवानों को इन्सानों की तकरीम का दर्स देते क्योंकि क़ुरआन हमें तकरीमे-इन्सानियत का दर्स देता है और कहता है कि

وَ لَقَدۡ کَرَّمۡنَا بَنِیۡۤ اٰدَمَ

“हमने बनी-आदम को मुकर्रम बनाया है।” (17:70)

लिहाज़ा इज़्ज़त व तकरीम के लिये अपने मसलक का आलिम या बुज़ुर्ग होना ज़रूरी नहीं है बल्कि सिर्फ़ इतनी बात काफ़ी है कि वो कोई भी एक इन्सान है।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अपने-अपने मसलक की हदीसों को बुनियाद बना कर अक़ीदों के क़िले मज़बूत करने और मुआशरती ऐतिबार से पस्ती में धँसने के बजाय हम अपने नौजवानों में क़ुरआन मजीद पर ग़ौर और तदब्बुर का हौसला पैदा करते ताकि हमारे नौजवान एक बेहतरीन क़ुरआनी मुआशरा बनाने के साथ-साथ सितारों पर भी कमन्दें डाल रहे होते और समाज में अपना कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे होते। क्योंकि अल्लाह ने जगह-जगह क़ुरआन पर ग़ौर और तदब्बुर करने पर उभारा है, क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है :

اَفَلَا یَتَدَبَّرُوۡنَ الۡقُرۡاٰنَ اَمۡ عَلٰی قُلُوۡبٍ اَقۡفَالُہَا

क्या इन लोगों ने क़ुरआन पर ग़ौर नहीं किया, या दिलों पर उनके ताले लगे हुए हैं? (47:24)

اِنَّ فِیۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ وَ اخۡتِلَافِ الَّیۡلِ وَ النَّہَارِ لَاٰیٰتٍ لِّاُولِی الۡاَلۡبَابِ

ज़मीन और आसमानों की पैदाइश में और रात और दिन के बारी-बारी से आने में उन होश रखनेवाले लोगों के लिये बहुत सी निशानियाँ हैं (3:190)

👉 क्या ही बेहतर होता कि क़ुरआन व सुन्नत का नाम लेकर अपने मसलकों और जमाअतों की हिफ़ाज़त के लिये खड़े होने के बजाय हम अपने नौजवानों के अन्दर ज़ालिमों और जाबिरों के सामने हक़ की गवाही देने और मुआशरे में अद्ल व इन्साफ़ और अम्न व सलामती क़ायम करने के लिये खड़े होने का हौसला पैदा करते। क्योंकि अल्लाह फ़रमाता है :

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا کُوۡنُوۡا قَوّٰمِیۡنَ لِلّٰہِ شُہَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ ۫ وَ لَا یَجۡرِمَنَّکُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰۤی اَلَّا تَعۡدِلُوۡا ؕ اِعۡدِلُوۡا ۟ ہُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰی ۫ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ خَبِیۡرٌۢ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ

ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह से डरो, अल्लाह के लिये सच्चाई पर क़ायम रहनेवाले और इनसाफ़ की गवाही देनेवाले बनो। किसी गरोह की दुश्मनी तुमको इतना मुश्तइल (बेक़ाबू) न कर दे कि इनसाफ़ से फिर जाओ। इनसाफ़ करो ये ख़ुदातरसी से ज़्यादा मेल रखता है। अल्लाह से डरकर काम करते रहो, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे पूरी तरह बाख़बर है। (5:8)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम क़ुरआन और हदीस से हवाले दे-देकर नौजवानों को अपने मसलक और जमाअत की पैरवी पर मज़बूत करने के बजाय और मसलकी बोझ लादने के बजाय उन्हें उन पाबन्दियों से नजात दिलाते जो इस्लाम ने उन पर लगाई ही नहीं हैं, महज़ दीन को मज़हब बनाकर अपनी दुकानें चलानेवालों ने उन पर थोप दी हैं। क्योंकि क़ुरआन कहता है

اَلَّذِیۡنَ یَتَّبِعُوۡنَ الرَّسُوۡلَ النَّبِیَّ الۡاُمِّیَّ الَّذِیۡ یَجِدُوۡنَہٗ مَکۡتُوۡبًا عِنۡدَہُمۡ فِی التَّوۡرٰىۃِ وَ الۡاِنۡجِیۡلِ ۫ یَاۡمُرُہُمۡ بِالۡمَعۡرُوۡفِ وَ یَنۡہٰہُمۡ عَنِ الۡمُنۡکَرِ وَ یُحِلُّ لَہُمُ الطَّیِّبٰتِ وَ یُحَرِّمُ عَلَیۡہِمُ الۡخَبٰٓئِثَ وَ یَضَعُ عَنۡہُمۡ اِصۡرَہُمۡ وَ الۡاَغۡلٰلَ الَّتِیۡ کَانَتۡ عَلَیۡہِمۡ ؕ فَالَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا بِہٖ وَ عَزَّرُوۡہُ وَ نَصَرُوۡہُ وَ اتَّبَعُوا النُّوۡرَ الَّذِیۡۤ اُنۡزِلَ مَعَہٗۤ ۙ اُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ

जो इस पैग़म्बर, उम्मी नबी की पैरवी इख़्तियार करे जिसका ज़िक्र उन्हें अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा हुआ मिलता है। वो उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बुराई से रोकता है, उनके लिये पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है, और उनपर से वो बोझ उतारता है जो उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है जिनमें वो जकड़े हुए थे, इसलिये जो लोग उसपर ईमान ले आएँ और उसकी हिमायत और मदद करें और उस रौशनी की पैरवी करें जो उसके साथ उतारी गई है, वही कामयाब होनेवाले हैं। (7:157)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम मुसलमान इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर आपस में एक-दूसरे के दरम्यान कमियाँ और ख़ामियाँ तलाश करके एक-दूसरे को नीचा दिखाने, ज़लील करने और दूसरे मसलक और जमाअत को ग़लत साबित करके अपनी फ़तह का जश्न मनाने के बजाय एक दूसरे के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने का हौसला पैदा करते।

यक़ीन जानिये इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर अगर मुख़ालिफ़त और दुश्मनियाँ करने के लिये हमारे पास 10 बातें होंगी तो 10 बातें वो भी होंगी जिन पर हम आपस में बैठकर बात कर सकते हैं, जिनपर हमारे दरम्यान कोई इख़्तिलाफ़ नहीं होगा। जिस क़ुरआन को हम पूरी दुनिया की हिदायत की किताब होने का दावा करते हैं उसी क़ुरआन में ये हिदायत मौजूद है कि

قُلۡ یٰۤاَہۡلَ الۡکِتٰبِ تَعَالَوۡا اِلٰی کَلِمَۃٍ سَوَآءٍۢ بَیۡنَنَا وَ بَیۡنَکُمۡ

“ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच कॉमन है….।” (3:64)

ज़रा सोचें कि जिस क़ुरआन पर हमारा ईमान है वो तो अहले-किताब के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने की तलक़ीन करता है। क्या हमारे मसलकी और जमाअती इख़्तिलाफ़ात अहले-किताब से इख़्तिलाफ़ात से भी ज़्यादा बढ़े हुए हैं कि कोई एक बात भी ऐसी नहीं है जो हमारे दरम्यान कॉमन हो और हम आपस में बैठकर बातें न कर सकते हों।

लिहाज़ा ऐ मेरी उम्मत के नौजवानों अपनी हालत पर ग़ौर कीजिये और हर तरह की मसलकी और जमाअती तअस्सुब से बाहर निकलिये।

मेरे साथियो! मज़हब की अन्धी पैरवी से बाहर आइये। ये एक तरह की अफ़ीम है जो मसलक के ठेकेदार आपको पिला रहे हैं।

सीधे-सीधे दीन की तरफ़ आइये, जो ज़िन्दगी का सीधा और साफ़ रास्ता है। क़ुरआन को ख़ुद अपनी अक़्ल से समझने की कोशिश कीजिये, जो बात समझ में न आए उसके लिये उन उलमा से रुजू कीजिये जो मसलक की पिनक में मस्त न हों।

Hindi

उम्मत के लिये ये बात किसी अलमिये (दर्दनाक वाक़िए) से कम नहीं है कि जो मसलक फ़ुरुई (जुज़्वी और मामूली) मामलों में रहनुमाई के लिये वुजूद में आए थे वो मसलक आज दीन की हैसियत इख़्तियार कर गए हैं। ये नासूर हमारी उम्मत में इस हद तक सरायत कर गया है कि हमारी मसाजिद और मदारिस की पहचान मसलकों से होती है। (अगर ग़ौर किया जाए तो आपस में इन्तिशार और इख़्तिलाफ़ का ये कैंसर इस हद तक भी पाया जाता है कि हमारी मस्जिदों की पहचान जमाअतों और ब्रादरियों तक से भी होती है) हमारे गिर्द मसलकों और जमाअतों की दीवारें इतनी मोटी और मज़बूत हो चुकी हैं कि हमें किसी दूसरी जमाअत और मसलक में कोई ख़ूबी नज़र ही नहीं आती है। हम दीन की तबलीग़ और इशाअत की आड़ में अपने मसलक और अपनी जमाअतों की तबलीग़ और इशाअत कर रहे होते हैं।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अहादीस के रद्दो-क़बूल को बुनियाद बनाकर एक-दूसरे की टाँग खिंचाई करने के बजाय हम क़ुरआन को मैयार मानकर नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे का तआवुन करते और मुआशरे को ख़ुशहाल बनाने की कोशिश करते। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साज़िशें करने और गुनाह व ज़्यादती की बातें करने के बजाय नेकी और ख़ुदा-तरसी की बातें करते। क्योंकि क़ुरआन का हुक्म है कि

تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ۪ وَ لَا تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ ۪ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ شَدِیۡدُ الۡعِقَابِ

जो काम नेकी और ख़ुदातरसी के हैं उनमें सबकी मदद करो और जो गुनाह और ज़्यादती के काम हैं उनमें किसी की मदद न करो। अल्लाह से डरो, उसकी सज़ा बहुत सख़्त है। (5:2)

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا تَنَاجَیۡتُمۡ فَلَا تَتَنَاجَوۡا بِالۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ وَ مَعۡصِیَتِ الرَّسُوۡلِ وَ تَنَاجَوۡا بِالۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ؕ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ الَّذِیۡۤ اِلَیۡہِ تُحۡشَرُوۡنَ

ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! जब तुम आपस में पोशीदा बात करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की नाफ़रमानी की बातें नहीं, बल्कि नेकी और तक़वा की बातें करो और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसके दरबार में तुम्हें हश्र के दिन पेश होना है। (58:9)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम सिर्फ़ अपने बुज़ुर्गों और अपने उलमा के एहतिराम के बजाय अपने नौजवानों को इन्सानों की तकरीम का दर्स देते क्योंकि क़ुरआन हमें तकरीमे-इन्सानियत का दर्स देता है और कहता है कि

وَ لَقَدۡ کَرَّمۡنَا بَنِیۡۤ اٰدَمَ

“हमने बनी-आदम को मुकर्रम बनाया है।” (17:70)

लिहाज़ा इज़्ज़त व तकरीम के लिये अपने मसलक का आलिम या बुज़ुर्ग होना ज़रूरी नहीं है बल्कि सिर्फ़ इतनी बात काफ़ी है कि वो कोई भी एक इन्सान है।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अपने-अपने मसलक की हदीसों को बुनियाद बना कर अक़ीदों के क़िले मज़बूत करने और मुआशरती ऐतिबार से पस्ती में धँसने के बजाय हम अपने नौजवानों में क़ुरआन मजीद पर ग़ौर और तदब्बुर का हौसला पैदा करते ताकि हमारे नौजवान एक बेहतरीन क़ुरआनी मुआशरा बनाने के साथ-साथ सितारों पर भी कमन्दें डाल रहे होते और समाज में अपना कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे होते। क्योंकि अल्लाह ने जगह-जगह क़ुरआन पर ग़ौर और तदब्बुर करने पर उभारा है, क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है :

اَفَلَا یَتَدَبَّرُوۡنَ الۡقُرۡاٰنَ اَمۡ عَلٰی قُلُوۡبٍ اَقۡفَالُہَا

क्या इन लोगों ने क़ुरआन पर ग़ौर नहीं किया, या दिलों पर उनके ताले लगे हुए हैं? (47:24)

اِنَّ فِیۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ وَ اخۡتِلَافِ الَّیۡلِ وَ النَّہَارِ لَاٰیٰتٍ لِّاُولِی الۡاَلۡبَابِ

ज़मीन और आसमानों की पैदाइश में और रात और दिन के बारी-बारी से आने में उन होश रखनेवाले लोगों के लिये बहुत सी निशानियाँ हैं (3:190)

👉 क्या ही बेहतर होता कि क़ुरआन व सुन्नत का नाम लेकर अपने मसलकों और जमाअतों की हिफ़ाज़त के लिये खड़े होने के बजाय हम अपने नौजवानों के अन्दर ज़ालिमों और जाबिरों के सामने हक़ की गवाही देने और मुआशरे में अद्ल व इन्साफ़ और अम्न व सलामती क़ायम करने के लिये खड़े होने का हौसला पैदा करते। क्योंकि अल्लाह फ़रमाता है :

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا کُوۡنُوۡا قَوّٰمِیۡنَ لِلّٰہِ شُہَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ ۫ وَ لَا یَجۡرِمَنَّکُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰۤی اَلَّا تَعۡدِلُوۡا ؕ اِعۡدِلُوۡا ۟ ہُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰی ۫ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ خَبِیۡرٌۢ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ

ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह से डरो, अल्लाह के लिये सच्चाई पर क़ायम रहनेवाले और इनसाफ़ की गवाही देनेवाले बनो। किसी गरोह की दुश्मनी तुमको इतना मुश्तइल (बेक़ाबू) न कर दे कि इनसाफ़ से फिर जाओ। इनसाफ़ करो ये ख़ुदातरसी से ज़्यादा मेल रखता है। अल्लाह से डरकर काम करते रहो, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे पूरी तरह बाख़बर है। (5:8)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम क़ुरआन और हदीस से हवाले दे-देकर नौजवानों को अपने मसलक और जमाअत की पैरवी पर मज़बूत करने के बजाय और मसलकी बोझ लादने के बजाय उन्हें उन पाबन्दियों से नजात दिलाते जो इस्लाम ने उन पर लगाई ही नहीं हैं, महज़ दीन को मज़हब बनाकर अपनी दुकानें चलानेवालों ने उन पर थोप दी हैं। क्योंकि क़ुरआन कहता है

اَلَّذِیۡنَ یَتَّبِعُوۡنَ الرَّسُوۡلَ النَّبِیَّ الۡاُمِّیَّ الَّذِیۡ یَجِدُوۡنَہٗ مَکۡتُوۡبًا عِنۡدَہُمۡ فِی التَّوۡرٰىۃِ وَ الۡاِنۡجِیۡلِ ۫ یَاۡمُرُہُمۡ بِالۡمَعۡرُوۡفِ وَ یَنۡہٰہُمۡ عَنِ الۡمُنۡکَرِ وَ یُحِلُّ لَہُمُ الطَّیِّبٰتِ وَ یُحَرِّمُ عَلَیۡہِمُ الۡخَبٰٓئِثَ وَ یَضَعُ عَنۡہُمۡ اِصۡرَہُمۡ وَ الۡاَغۡلٰلَ الَّتِیۡ کَانَتۡ عَلَیۡہِمۡ ؕ فَالَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا بِہٖ وَ عَزَّرُوۡہُ وَ نَصَرُوۡہُ وَ اتَّبَعُوا النُّوۡرَ الَّذِیۡۤ اُنۡزِلَ مَعَہٗۤ ۙ اُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ

जो इस पैग़म्बर, उम्मी नबी की पैरवी इख़्तियार करे जिसका ज़िक्र उन्हें अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा हुआ मिलता है। वो उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बुराई से रोकता है, उनके लिये पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है, और उनपर से वो बोझ उतारता है जो उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है जिनमें वो जकड़े हुए थे, इसलिये जो लोग उसपर ईमान ले आएँ और उसकी हिमायत और मदद करें और उस रौशनी की पैरवी करें जो उसके साथ उतारी गई है, वही कामयाब होनेवाले हैं। (7:157)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम मुसलमान इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर आपस में एक-दूसरे के दरम्यान कमियाँ और ख़ामियाँ तलाश करके एक-दूसरे को नीचा दिखाने, ज़लील करने और दूसरे मसलक और जमाअत को ग़लत साबित करके अपनी फ़तह का जश्न मनाने के बजाय एक दूसरे के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने का हौसला पैदा करते।

यक़ीन जानिये इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर अगर मुख़ालिफ़त और दुश्मनियाँ करने के लिये हमारे पास 10 बातें होंगी तो 10 बातें वो भी होंगी जिन पर हम आपस में बैठकर बात कर सकते हैं, जिनपर हमारे दरम्यान कोई इख़्तिलाफ़ नहीं होगा। जिस क़ुरआन को हम पूरी दुनिया की हिदायत की किताब होने का दावा करते हैं उसी क़ुरआन में ये हिदायत मौजूद है कि

قُلۡ یٰۤاَہۡلَ الۡکِتٰبِ تَعَالَوۡا اِلٰی کَلِمَۃٍ سَوَآءٍۢ بَیۡنَنَا وَ بَیۡنَکُمۡ

“ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच कॉमन है….।” (3:64)

ज़रा सोचें कि जिस क़ुरआन पर हमारा ईमान है वो तो अहले-किताब के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने की तलक़ीन करता है। क्या हमारे मसलकी और जमाअती इख़्तिलाफ़ात अहले-किताब से इख़्तिलाफ़ात से भी ज़्यादा बढ़े हुए हैं कि कोई एक बात भी ऐसी नहीं है जो हमारे दरम्यान कॉमन हो और हम आपस में बैठकर बातें न कर सकते हों।

लिहाज़ा ऐ मेरी उम्मत के नौजवानों अपनी हालत पर ग़ौर कीजिये और हर तरह की मसलकी और जमाअती तअस्सुब से बाहर निकलिये।

मेरे साथियो! मज़हब की अन्धी पैरवी से बाहर आइये। ये एक तरह की अफ़ीम है जो मसलक के ठेकेदार आपको पिला रहे हैं।

सीधे-सीधे दीन की तरफ़ आइये, जो ज़िन्दगी का सीधा और साफ़ रास्ता है। क़ुरआन को ख़ुद अपनी अक़्ल से समझने की कोशिश कीजिये, जो बात समझ में न आए उसके लिये उन उलमा से रुजू कीजिये जो मसलक की पिनक में मस्त न हों।

उम्मत के लिये ये बात किसी अलमिये (दर्दनाक वाक़िए) से कम नहीं है कि जो मसलक फ़ुरुई (जुज़्वी और मामूली) मामलों में रहनुमाई के लिये वुजूद में आए थे वो मसलक आज दीन की हैसियत इख़्तियार कर गए हैं। ये नासूर हमारी उम्मत में इस हद तक सरायत कर गया है कि हमारी मसाजिद और मदारिस की पहचान मसलकों से होती है। (अगर ग़ौर किया जाए तो आपस में इन्तिशार और इख़्तिलाफ़ का ये कैंसर इस हद तक भी पाया जाता है कि हमारी मस्जिदों की पहचान जमाअतों और ब्रादरियों तक से भी होती है) हमारे गिर्द मसलकों और जमाअतों की दीवारें इतनी मोटी और मज़बूत हो चुकी हैं कि हमें किसी दूसरी जमाअत और मसलक में कोई ख़ूबी नज़र ही नहीं आती है। हम दीन की तबलीग़ और इशाअत की आड़ में अपने मसलक और अपनी जमाअतों की तबलीग़ और इशाअत कर रहे होते हैं।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अहादीस के रद्दो-क़बूल को बुनियाद बनाकर एक-दूसरे की टाँग खिंचाई करने के बजाय हम क़ुरआन को मैयार मानकर नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे का तआवुन करते और मुआशरे को ख़ुशहाल बनाने की कोशिश करते। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ साज़िशें करने और गुनाह व ज़्यादती की बातें करने के बजाय नेकी और ख़ुदा-तरसी की बातें करते। क्योंकि क़ुरआन का हुक्म है कि

تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ۪ وَ لَا تَعَاوَنُوۡا عَلَی الۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ ۪ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ شَدِیۡدُ الۡعِقَابِ

जो काम नेकी और ख़ुदातरसी के हैं उनमें सबकी मदद करो और जो गुनाह और ज़्यादती के काम हैं उनमें किसी की मदद न करो। अल्लाह से डरो, उसकी सज़ा बहुत सख़्त है। (5:2)

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡۤا اِذَا تَنَاجَیۡتُمۡ فَلَا تَتَنَاجَوۡا بِالۡاِثۡمِ وَ الۡعُدۡوَانِ وَ مَعۡصِیَتِ الرَّسُوۡلِ وَ تَنَاجَوۡا بِالۡبِرِّ وَ التَّقۡوٰی ؕ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ الَّذِیۡۤ اِلَیۡہِ تُحۡشَرُوۡنَ

ऐ लोगो, जो ईमान लाए हो! जब तुम आपस में पोशीदा बात करो तो गुनाह और ज़्यादती और रसूल की नाफ़रमानी की बातें नहीं, बल्कि नेकी और तक़वा की बातें करो और उस ख़ुदा से डरते रहो जिसके दरबार में तुम्हें हश्र के दिन पेश होना है। (58:9)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम सिर्फ़ अपने बुज़ुर्गों और अपने उलमा के एहतिराम के बजाय अपने नौजवानों को इन्सानों की तकरीम का दर्स देते क्योंकि क़ुरआन हमें तकरीमे-इन्सानियत का दर्स देता है और कहता है कि

وَ لَقَدۡ کَرَّمۡنَا بَنِیۡۤ اٰدَمَ

“हमने बनी-आदम को मुकर्रम बनाया है।” (17:70)

लिहाज़ा इज़्ज़त व तकरीम के लिये अपने मसलक का आलिम या बुज़ुर्ग होना ज़रूरी नहीं है बल्कि सिर्फ़ इतनी बात काफ़ी है कि वो कोई भी एक इन्सान है।

👉 क्या ही बेहतर होता कि अपने-अपने मसलक की हदीसों को बुनियाद बना कर अक़ीदों के क़िले मज़बूत करने और मुआशरती ऐतिबार से पस्ती में धँसने के बजाय हम अपने नौजवानों में क़ुरआन मजीद पर ग़ौर और तदब्बुर का हौसला पैदा करते ताकि हमारे नौजवान एक बेहतरीन क़ुरआनी मुआशरा बनाने के साथ-साथ सितारों पर भी कमन्दें डाल रहे होते और समाज में अपना कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे होते। क्योंकि अल्लाह ने जगह-जगह क़ुरआन पर ग़ौर और तदब्बुर करने पर उभारा है, क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है :

اَفَلَا یَتَدَبَّرُوۡنَ الۡقُرۡاٰنَ اَمۡ عَلٰی قُلُوۡبٍ اَقۡفَالُہَا

क्या इन लोगों ने क़ुरआन पर ग़ौर नहीं किया, या दिलों पर उनके ताले लगे हुए हैं? (47:24)

اِنَّ فِیۡ خَلۡقِ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضِ وَ اخۡتِلَافِ الَّیۡلِ وَ النَّہَارِ لَاٰیٰتٍ لِّاُولِی الۡاَلۡبَابِ

ज़मीन और आसमानों की पैदाइश में और रात और दिन के बारी-बारी से आने में उन होश रखनेवाले लोगों के लिये बहुत सी निशानियाँ हैं (3:190)

👉 क्या ही बेहतर होता कि क़ुरआन व सुन्नत का नाम लेकर अपने मसलकों और जमाअतों की हिफ़ाज़त के लिये खड़े होने के बजाय हम अपने नौजवानों के अन्दर ज़ालिमों और जाबिरों के सामने हक़ की गवाही देने और मुआशरे में अद्ल व इन्साफ़ और अम्न व सलामती क़ायम करने के लिये खड़े होने का हौसला पैदा करते। क्योंकि अल्लाह फ़रमाता है :

یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا کُوۡنُوۡا قَوّٰمِیۡنَ لِلّٰہِ شُہَدَآءَ بِالۡقِسۡطِ ۫ وَ لَا یَجۡرِمَنَّکُمۡ شَنَاٰنُ قَوۡمٍ عَلٰۤی اَلَّا تَعۡدِلُوۡا ؕ اِعۡدِلُوۡا ۟ ہُوَ اَقۡرَبُ لِلتَّقۡوٰی ۫ وَ اتَّقُوا اللّٰہَ ؕ اِنَّ اللّٰہَ خَبِیۡرٌۢ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ

ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह से डरो, अल्लाह के लिये सच्चाई पर क़ायम रहनेवाले और इनसाफ़ की गवाही देनेवाले बनो। किसी गरोह की दुश्मनी तुमको इतना मुश्तइल (बेक़ाबू) न कर दे कि इनसाफ़ से फिर जाओ। इनसाफ़ करो ये ख़ुदातरसी से ज़्यादा मेल रखता है। अल्लाह से डरकर काम करते रहो, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे पूरी तरह बाख़बर है। (5:8)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम क़ुरआन और हदीस से हवाले दे-देकर नौजवानों को अपने मसलक और जमाअत की पैरवी पर मज़बूत करने के बजाय और मसलकी बोझ लादने के बजाय उन्हें उन पाबन्दियों से नजात दिलाते जो इस्लाम ने उन पर लगाई ही नहीं हैं, महज़ दीन को मज़हब बनाकर अपनी दुकानें चलानेवालों ने उन पर थोप दी हैं। क्योंकि क़ुरआन कहता है

اَلَّذِیۡنَ یَتَّبِعُوۡنَ الرَّسُوۡلَ النَّبِیَّ الۡاُمِّیَّ الَّذِیۡ یَجِدُوۡنَہٗ مَکۡتُوۡبًا عِنۡدَہُمۡ فِی التَّوۡرٰىۃِ وَ الۡاِنۡجِیۡلِ ۫ یَاۡمُرُہُمۡ بِالۡمَعۡرُوۡفِ وَ یَنۡہٰہُمۡ عَنِ الۡمُنۡکَرِ وَ یُحِلُّ لَہُمُ الطَّیِّبٰتِ وَ یُحَرِّمُ عَلَیۡہِمُ الۡخَبٰٓئِثَ وَ یَضَعُ عَنۡہُمۡ اِصۡرَہُمۡ وَ الۡاَغۡلٰلَ الَّتِیۡ کَانَتۡ عَلَیۡہِمۡ ؕ فَالَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا بِہٖ وَ عَزَّرُوۡہُ وَ نَصَرُوۡہُ وَ اتَّبَعُوا النُّوۡرَ الَّذِیۡۤ اُنۡزِلَ مَعَہٗۤ ۙ اُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ

जो इस पैग़म्बर, उम्मी नबी की पैरवी इख़्तियार करे जिसका ज़िक्र उन्हें अपने यहाँ तौरात और इंजील में लिखा हुआ मिलता है। वो उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बुराई से रोकता है, उनके लिये पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है, और उनपर से वो बोझ उतारता है जो उनपर लदे हुए थे और उन बन्धनों को खोलता है जिनमें वो जकड़े हुए थे, इसलिये जो लोग उसपर ईमान ले आएँ और उसकी हिमायत और मदद करें और उस रौशनी की पैरवी करें जो उसके साथ उतारी गई है, वही कामयाब होनेवाले हैं। (7:157)

👉 क्या ही बेहतर होता कि हम मुसलमान इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर आपस में एक-दूसरे के दरम्यान कमियाँ और ख़ामियाँ तलाश करके एक-दूसरे को नीचा दिखाने, ज़लील करने और दूसरे मसलक और जमाअत को ग़लत साबित करके अपनी फ़तह का जश्न मनाने के बजाय एक दूसरे के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने का हौसला पैदा करते।

यक़ीन जानिये इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर अगर मुख़ालिफ़त और दुश्मनियाँ करने के लिये हमारे पास 10 बातें होंगी तो 10 बातें वो भी होंगी जिन पर हम आपस में बैठकर बात कर सकते हैं, जिनपर हमारे दरम्यान कोई इख़्तिलाफ़ नहीं होगा। जिस क़ुरआन को हम पूरी दुनिया की हिदायत की किताब होने का दावा करते हैं उसी क़ुरआन में ये हिदायत मौजूद है कि

قُلۡ یٰۤاَہۡلَ الۡکِتٰبِ تَعَالَوۡا اِلٰی کَلِمَۃٍ سَوَآءٍۢ بَیۡنَنَا وَ بَیۡنَکُمۡ

“ऐ किताबवालो! आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे बीच कॉमन है….।” (3:64)

ज़रा सोचें कि जिस क़ुरआन पर हमारा ईमान है वो तो अहले-किताब के दरम्यान कॉमन बातों पर बैठकर बातें करने की तलक़ीन करता है। क्या हमारे मसलकी और जमाअती इख़्तिलाफ़ात अहले-किताब से इख़्तिलाफ़ात से भी ज़्यादा बढ़े हुए हैं कि कोई एक बात भी ऐसी नहीं है जो हमारे दरम्यान कॉमन हो और हम आपस में बैठकर बातें न कर सकते हों।

लिहाज़ा ऐ मेरी उम्मत के नौजवानों अपनी हालत पर ग़ौर कीजिये और हर तरह की मसलकी और जमाअती तअस्सुब से बाहर निकलिये।

मेरे साथियो! मज़हब की अन्धी पैरवी से बाहर आइये। ये एक तरह की अफ़ीम है जो मसलक के ठेकेदार आपको पिला रहे हैं।

सीधे-सीधे दीन की तरफ़ आइये, जो ज़िन्दगी का सीधा और साफ़ रास्ता है। क़ुरआन को ख़ुद अपनी अक़्ल से समझने की कोशिश कीजिये, जो बात समझ में न आए उसके लिये उन उलमा से रुजू कीजिये जो मसलक की पिनक में मस्त न हों।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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