बेहतरीन औलाद वो है जो माँ-बाप का इतना एहतिराम करे कि उनके सामने उफ़्फ़ तक न कहे। (क़ुरआन)
और
बेहतरीन माँ-बाप वो हैं जो अपनी औलाद और उनकी औलाद के साथ इज़्ज़त के साथ पेश आएँ। (हदीस : इब्ने-माजा 3671)
बेहतरीन औलाद वो है जो अपनी दौलत और माल-अस्बाब सब पर माँ-बाप का हक़ समझे। (हदीस इब्ने-माजा : 2291)
और
बेहतरीन माँ-बाप वो हैं जो अपनी औलाद को ही अपनी दौलत और अपना सरमाया समझें। (हदीस इब्ने-माजा : 2290, 2292)
बेहतरीन औलाद वो है जो अपने माँ-बाप की डाँट को अपनी तरबियत का सामान समझे।
और
बेहतरीन माँ-बाप वो हैं जो अपनी औलाद को डाँट कर नहीं मुहब्बत से हर बात समझाएँ।
याद रखें
औलाद अपने माँ-बाप के लिये कोई ऐसी बात अपनी ज़बान से हरगिज़ न निकाले कि उनके दिल को ठेस पहुँचे,
वहीँ
माँ-बाप भी अपनी औलाद के लिये ऐसे अलफ़ाज़ का इस्तेमाल न करें जिससे उनकी इज़्ज़ते-नफ़्स को ठेस पहुँचे।
याद रखें
माँ-बाप अपनी औलाद की इज़्ज़ते-नफ़्स के ताल्लुक़ से आज़माए जानेवाले हैं,
और
औलाद अपने माँ-बाप के साथ हुस्ने-सुलूक के ताल्लुक़ से आज़माए जानेवाले हैं।
याद रखें
जिस तरह औलाद पर माँ-बाप के बहुत-से हुक़ूक़ व फ़रायज़ हैं, और ये उम्र भर रहते हैं।
उसी तरह माँ-बाप पर भी औलाद के कुछ हुक़ूक़ व फ़रायज़ हैं, ये भी उम्र भर ही रहते हैं।
मुहम्मद (सल्ल०) का उस्वा ये है कि
जहाँ आप (सल्ल०) एक तरफ़ अपने वालिदैन का हद दर्जे एहतिराम करते थे,
वहीँ दूसरी तरफ़ आप अपनी औलाद की भी हद दर्जे तकरीम किया करते थे