रमज़ान के मुबारक महीने में हासिल करने के लिए दो चीज़ें हैं।
एक तो ये कि हम तिलावते-क़ुरआन और नवाफ़िल के ज़रिए सवाब हासिल करें। (हम जानते हैं कि इस माह में एक नफ़ल एक फ़र्ज़ के बराबर और फ़र्ज़ 70 गुना हो जाता है।)
इस तिलावते-क़ुरआन और नवाफ़िल के ज़रिए हासिल होने वाले सवाब की हैसियत सोने (Gold) की सी है जो क़ीमती भी है और चमकदार होने की वजह से ख़ूबसूरत भी। लेकिन अगर इसकी हिफ़ाज़त न की जाए तो इसके ज़ाए होने का भी ख़तरा बना रहता है, और हम जानते हैं कि शैतान रूपी डाकू उसी जगह हाथ डालता है जहाँ उसे माल दिखाई देता है।
इस मुबारक महीने में हासिल करने के लिए एक दूसरी चीज़ और भी है जिसकी हैसियत पारस पत्थर की सी है जो देखने में पत्थर है (यानी उसको हासिल करना और अपने पास रख पाना ज़रा भारी काम है) लेकिन वो क़ीमती इतना है कि जिस चीज़ से छुआ दो वही सोना बन जाए। और वो है ‘तक़वा’। अगर हम इसे हासिल करने में कामयाब हो गए तो समझ लीजिए कि हम वो ख़ुशक़िस्मत इंसान होंगे कि जिस अमल से भी इसे छुआ देंगे वही क़ीमती बन जाएगा। फिर हमें टनों के हिसाब से सोना (अमल) रखने की ज़रूरत ही न होगी कि शैतान रूपी डाकू के लूट ले जाने का ख़तरा हो, बल्कि जब ये डाकू हमारे हाथ में इस पत्थर को देखेगा तो दूर से ही भाग खड़ा होगा।
अगर देखा जाए तो रमज़ान के रोज़े का अस्ल मक़सद ही इस पारस पत्थर यानी तक़वा को हासिल करना है। (क़ुरआन, सूरा-2 बक़रा, आयत-183) और तक़वा का मतलब होता है अल्लाह से डरते हुए उसकी नाफ़रमानियों से बचते रहना।
इस माह में इसी चीज़ की प्रेक्टिस रात-दिन कराई जाती है। रात-दिन की इस प्रेक्टिस से बस हम इसी तक़वा को हासिल करने की कोशिश नहीं करते, हाँ ज़्यादा से ज़्यादा सवाब हासिल करने की कोशिश ख़ूब करते हैं। लेकिन याद रखिये कि अगर हमने महज़ सवाब हासिल किया और तक़वा हासिल न किया तो हमारे इस सवाब के एक ही झटके में चले जाने और ज़ाए होने का ख़तरा है।
लिहाज़ा अक़्लमन्दी इसी में है कि इस माहे-मुबारक में पारस पत्थर “तक़वा” को हासिल करने की प्रेक्टिस की जाए ताकि इसके ज़रिए से हम अपने अज़ली (हमेशा के) दुश्मन शैतान को भगा सकें और हक़ीक़ी मानों में ऐसे ग़नी (मालदार) बन सकें कि देखने में भले ही हमारे पास कुछ न हो लेकिन इसके बावुजूद सब कुछ हो।
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नोट : बाहरी दुनिया में पारस पत्थर भले ही अफ़सान्वी चीज़ हो लेकिन हक़ीक़ी एतिबार से ‘तक़वा’ की सिफ़त यही है कि इसे जिस अमल से छुआ दिया जाए वही क़ीमती यानी बारगाहे-ख़ुदावन्दी में क़ाबिले-क़बूल व मतलूब बन जाएगा।