दोस्तो! इन्सान की फ़ितरत है कि जब उस पर कोई आफ़त आती है तो वो मायूस हो जाता है और दिल हारकर बैठ जाता है।(क़ुरआन 41:49) हिन्दुस्तान में मुसलमानों के इस वक़्त के हालात पर नज़र डालें तो मालूम होगा कि मुसलमान इस वक़्त मायूसी का शिकार हैं, ऐसा महसूस होता है कि वो एक बन्द गली में आकर खड़े हो गए हैं मानो कोई रास्ता सुझाई ही नहीं दे रहा है। सुझाई दे भी तो कैसे? अपने दीन को तो इन्होंने मज़हब बनाकर रख छोड़ा है और सियासी लीडर्स मुसलमानों की नुमाइन्दगी नहीं बल्कि अपनी-अपनी पार्टियों की नुमाइन्दगी करते हैं। अब सूरते-हाल ये है कि अपनी सियासी और मज़हबी क़ियादत से मायूस उम्मत की नौजवान नस्ल उन लोगों के रहमो-करम पर अपनी जंग लड़ रही है जिससे न उनकी फ़िक्र व नज़रियात मिलते हैं न उनकी आदात व अतवार। मायूसी का आलम ये है कि अब तो इस्लाम को दीन माननेवाली जमाअतें और तहरीकें भी सेक्युलरिज़्म की बक़ा की जंग में मसरूफ़ हो गई हैं और इस्लाम को मज़हब से ज़्यादा कुछ हैसियत देने को तैयार नहीं हैं।
याद रखो दोस्तो! जिस तरह मायूसी एक शख़्स के लिये मोहलिक और ख़तरनाक है उससे कहीं ज़्यादा ख़तरनाक ये क़ौमों के लिये है। नाउम्मीदी न सिर्फ़ कुफ़्र है बल्कि ग़ुलामी की ज़ंजीर को और मज़बूत कर देती है।
दोस्तो! अगर अभी भी हम अपनी ग़लतियों से तौबा कर लें, अपना वक़्त गुनाहों और बेकार की बातों में बर्बाद न करके दीन को समझने में अपना वक़्त लगाएँ, अपने किरदार को क़ुरआन के साँचे में ढालने का पुख़्ता इरादा करें, अपने दरम्यान इन्तिशार को ख़त्म करके क़ुरआन की बुनियाद पर इत्तिहाद को अपना मरकज़ बना लें, मुसलमानों से भी और अपने वतन के ग़ैर-मुस्लिम भाइयों से भी हमदर्दी का ताल्लुक़ पैदा करें, उनसे मामलात करते वक़्त अपने दिल में अल्लाह का ख़ौफ़ और आख़िरत में जवाबदेही का एहसास रखें तो मायूसी की अँधेरी रातों से उम्मीद की किरणें फूट सकती हैं। और हम जानते हैं कि दुनिया की तमाम कामरानियाँ सिर्फ़ उम्मीद पर क़ायम हैं।
साथियो!
ये उम्मीद ही है जो एक इन्सान को इस क़ाबिल बना देती है कि वो पहाड़ों के अन्दर से रास्ता पैदा करे,
ये उम्मीद ही है जो ग़ुलाम क़ौमों को ज़ालिमों और जब्बारों की ग़ुलामी और तसल्लुत से निकालकर आज़ाद फ़िज़ा में ला खड़ा करती है,
ये उम्मीद ही है जो मुर्दा दिलों को ज़िन्दा कर देती है और बिस्तरे-मर्ग (मृत्यु शैया) पर पड़े बीमारों को उठा खड़ा करती है,
ये उम्मीद ही है जो डूबतों को सहारा देकर किनारों तक पहुँचा देती है।
दोस्तो!
जब क़ौमों के अन्दर हिम्मत ख़त्म हो जाती है और दुनिया उनपर तंग हो जाती है,
जब ज़मीन के किसी कोने से भी उनके लिये मदद नहीं आती,
जब उनके तमाम आज़ाए-अमल जवाब दे देते हैं
तो
उम्मीद ही वो फ़रिश्ता होता है जो मुस्कुराता हुआ आता है, अपने परों को खोलता है और अपने साये में लेकर पूरी क़ौम के अन्दर क़ुव्वत और ताक़त, हिम्मत और शुजाअत, मुस्तैदी और चुस्ती, समझदारी और होशियारी की एक रूहे-ताज़ा दिलों में पैदा कर देता है।
इसलिये ऐ मेरी क़ौम के नौजवानो!
अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो, उसकी रहमत से मायूस तो सिर्फ़ नाफ़रमान और ज़ालिम लोग ही हुआ करते हैं।” (15:56) ये मुश्किल हालात हमेशा रहनेवाले नहीं हैं। ये तो ज़माने के उतार-चढ़ाव के दिन हैं जिन्हें अल्लाह लोगों के दरम्यान गर्दिश कराता रहता है। (3:140)
इसलिये पलट आओ अपने रब की तरफ़, मज़बूत कर लो क़ुरआन से अपने ताल्लुक़ को और पैकर में ढल जाओ इस किताब के; जान लो कि सुर्ख़रूई तो तुम्हीं को हासिल है बस शर्त ये है कि सही माना में ईमान की रविश को अपना लो। (3:139) यक़ीनन अल्लाह की ताईद और नुसरत आपके ही शामिले-हाल होगी।