दावत

दावत

दावत का लुग़वी माना : दावत ‘द-अ-व’ से बना है जिसके माने हैं किसी को अपनी आवाज़ या बात से अपनी तरफ़ मायल और मुतवज्जेह कर लेना। सूरा बक़रा आयत-23 में कहा गया कि तुम अपने मददगारों को पुकारो।

وَ ادۡعُوۡا شُہَدَآءَکُمۡ مِّنۡ دُوۡنِ اللّٰہِ اِنۡ کُنۡتُمۡ صٰدِقِیۡنَ

“एक अल्लाह को छोड़कर बाक़ी जिसकी चाहो (मदद के लिये) बुला लो, अगर तुम सच्चे हो तो ये काम करके दिखाओ।

सूरा-2, आयत-61 में हैं कि अपने परवरदिगार को पुकारो। فَادۡعُ لَنَا رَبَّکَ

इसी से ‘दावा’ बना है जिसका मतलब बात, पुकार, मुतालबा या तक़ाज़ा है।

دَعۡوٰىہُمۡ فِیۡہَا سُبۡحٰنَکَ اللّٰہُمَّ ………وَ اٰخِرُ دَعۡوٰىہُمۡ اَنِ الۡحَمۡدُ لِلّٰہِ رَبِّ الۡعٰلَمِیۡنَ(10:10)

“वहाँ उनकी पुकार होगी कि ‘पाक है तू ऐ ख़ुदा!’….. और उनकी हर बात इस पर ख़त्म होगी कि “सारी तारीफ़ अल्लाह रब्बुल-आलमीन के लिये है।“

दावत के इस्तिलाही माना: दावत का इस्तिलाही माना होगा लोगों को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाना या लोगों को उस दीन और निज़ामे-ज़िन्दगी की तरफ़ पुकारना जिसे अल्लाह की तरफ़ से मुहम्मद (सल्ल) ने हम तक पहुँचाया था।

दीन में दावत की अहमियत: जिस चीज़ या जिस बात की हमारी नज़र में बहुत ज़्यादा अहमियत होती है उसे हम बार-बार और मुख़्तलिफ़ नामों से जानते और पुकारते हैं। क़ुरआन में दावत की अहमियत के ताल्लुक़ से भी ये बात सच साबित होती है। क़ुरआन में इस दावत को बहुत बार और मुख़्तलिफ़ नामों से पुकारा गया है मसलन कहीं इसे शहादत-अलन्नास (यानी लोगों पर गवाही) के नाम से पुकारा गया है। (देखें क़ुरआन 2:143; 22:78) और कहीं इसे बयान और तबयीन का नाम दिया गया है। (देखें 2:160; 16:44) कहीं इसे नसीहत कहा गया; तो कहीं इसे तब्लीग़ का नाम दिया गया। (5:67) कहीं इसे इंज़ार और तबशीर (डराना और ख़ुशख़बरी) कहा है। (48:8) तो कहीं इसे तज़्कीर का नाम दिया गया। (87:9) ग़रज़ ये कि नाम भले ही मुख़्तलिफ़ हों लेकिन बात एक ही कही गई है कि लोगों को बुलाओ, पुकारो, नसीहत करो, डराओ या उसके पैग़ाम को पहुँचाओ वग़ैरा।

दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमियाँ : दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमी ये है कि ये फ़र्ज़ नहीं है बस उसी तरह का कोई अमल है कि न भी किया जाए तो कोई हरज नहीं है। ये ग़लतफ़हमी दरअस्ल दो-तीन वजह से पैदा हुई :

1) ये ग़लतफ़हमी इस वजह से है कि दावत का लफ़्ज़ हमने ग़ैर-मुस्लिम हज़रात के लिये ख़ास कर दिया कि दावत तो सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों को दी जाएगी मुसलमान इससे मुराद नहीं है, मुसलमानों में तो इस्लाह का काम किया जाएगा। हालाँकि क़ुरआन व हदीस में कहीं नहीं है कि दावत सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम को ही दी जाएगी। अब चूंकि ग़ैर-मुस्लिम को दावत देने के लिये ख़ास सलाहियत होनी चाहिये और वो सलाहियत हममें मौजूद नहीं है इसलिये हम ये काम नहीं कर सकते।

2) दूसरी वजह ये रही है कि क़ुरआन में एक आयत में अल्लाह ने फ़रमाया है कि

وَ لْتَكُنْ مِّنْكُمْ اُمَّةٌ يَّدْعُوْنَ اِلَى الْخَيْرِ وَ يَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ يَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ١ؕ وَ اُولٰٓىِٕكَ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ

“तुम में से कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही होने चाहियें जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ, भलाई का हुक्म दें, और बुराइयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे वही लोग कामयाब होंगे।”

इस आयत से ये समझ लिया गया कि इसमें कहा गया कि तुममें से कुछ लोग ऐसे होने चाहियें, लिहाज़ा सबके लिये ज़रूरी नहीं है। इसलिये ये फ़र्ज़े-किफ़ाया है न की फ़र्ज़े-ऐन। यानी अगर कुछ लोग कर लें तो सब पर से ये फ़र्ज़ अदा हो जाएगा। हालाँकि ख़ुद आयत इस बात की तरदीद करती है कि जो लोग ये काम करेंगे वही कामयाब होंगे। अल्लामा इब्ने-कसीर फ़रमाते हैं कि “इस आयत का मक़सूद ये है कि इस उम्मत का एक तबक़ा इस फ़रीज़े और हुक्म की अदायगी के लिये मौजूद होना चाहिये हालाँकि ये काम इस उम्मत के एक-एक फ़र्द पर इनफ़िरादी तौर पर अपनी-अपनी ताक़त और सलाहियत के मुताबिक़ वाजिब है।”

क़ुरआन से भी ये बात वाज़ेह होती है; चुनांचे कहा गया कि :

كُنْتُمْ خَيْرَ اُمَّةٍ اُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ تَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَ تُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ١ؕ۱۱۰{البقرہ}

दुनिया में बेहतरीन गरोह तुम हो जिसे इन्सानों की हिदायत और इस्लाह के लिये मैदान में लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो, बदी से रोकते और अल्लाह पर ईमान रखते हो।

फिर ये भी कि وَ كَذٰلِكَ جَعَلْنٰكُمْ اُمَّةً وَّسَطًا لِّتَكُوْنُوْا شُهَدَآءَ عَلَى النَّاسِ وَ يَكُوْنَ الرَّسُوْلُ عَلَيْكُمْ شَهِيْدًا

“और इसी तरह तो हमने तुम मुसलमानों को एक “बीच की उम्मत” बनाया है ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो।” (2:143)

दावत का काम क्यों ज़रूरी है : इस्लाम चूँकि दीने-रहमत है, चूँकि ये सलामती और शान्ति का दीन है और सलामती और शान्ति हर शख्स की बुनियादी ज़रूरत है इस लिहाज़ है दावत का काम ज़रूरी है। सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम ही को नहीं मुसलमानों को भी सलामती की ज़रूरत है; इसलिये इस काम का किया जाना ज़रूरी है। हक़ीक़त में पूरी दुनिया को तबाही से बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है कि लोगों को अम्न और सलामती यानी इस्लाम की दावत दी जाए उनको रहमत की तरफ़ बुलाया जाए। अब चूँकि ख़ुद मुसलमान अम्न व सलामती के इस दीन से बहुत दूर हैं लिहाज़ा उन्हें सबसे पहले इसकी तरफ़ पुकारा जाए।

दावत का काम इसलिये भी ज़रूरी है कि क़ुरआन कहता है कि अगर तुम्हारे पास हक़ है और तुम उसको छिपा लो तो ये ज़ुल्मे-अज़ीम है :

وَ مَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ كَتَمَ شَهَادَةً عِنْدَهٗ مِنَ اللّٰه

इसके बरख़िलाफ़ ये भी कहा कि जो हक़ बात को पहुँचा दे तो इससे बड़ी भलाई का कोई काम नहीं है : وَمَنْ اَحْسَنُ قَوْلً مِّمّنْ دَعَ اِلَیْ اللہ وَعَمِلَ صاَلِحاًوَّقاَلَ اِنَّنیِ مِنَ الْمُسْلِمیِنْ

उस शख़्स से बढ़कर अच्छी बात और किसकी होगी जो लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाए और ख़ुद नेका अमल करे और कहे कि मैं मुसलमान हूँ।

एक आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि जो हक़ को छिपा ले और लोगों तक न पहुँचाए उस पर अल्लाह की लानत और तमाम लानत करने वालों की लानत :

اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْتُمُوْنَ مَاۤ اَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنٰتِ وَ الْهُدٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا بَيَّنّٰهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتٰبِ١ۙ اُولٰٓىِٕكَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰهُ وَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰعِنُوْنَۙ 2:259

दावत क्या देनी है? दावत का मतलब और उसकी अहमियत समझ लेने के बाद एक बात ये भी समझने की है कि दावत क्या है जो लोगों तक पहुँचानी है। प्यारे नबी (सल्ल०) के सामने तो बस लोग थे जिनको आपने दावत पहुँचाई, लेकिन इस वक़्त मसला ये है कि हमारे सामने दो तरह के लोग हैं एक तो वो हैं जो इस्लाम को मानने का दावा करते हैं लेकिन इस्लाम से दूर हैं, और दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं जो सिरे से इस्लाम को मानते ही नहीं हैं। चुनांचे इन दोनों तरह के लोगों को सामने रखते हुए हमारी दावत में तीन बातें हो सकती हैं जो बेलाग हैं :

1) तमाम बन्दगाने ख़ुदा को आम तौर से और मुसलमानों को ख़ास तौर से अल्लाह की बन्दगी की दावत दी जाए कि यही तमाम नबियों की दावत रही है।

2) जो लोग मुसलमान होने का दावा करते हैं उन्हें इस बात की तरफ़ दावत दी जाए कि जब वो मुसलमान हैं तो इस्लाम की सही-सही नुमाइन्दगी करें।

3) जिस समाज में हम रहते हैं उसमें जो ज़िम्मेदार हैं उन्हें इस बात की दावत दी जाए कि वो समाज में लोगों के साथ ख़ुदा से डरकर मामला करें या उन पदों पर ऐसे लोगों को बिठाने की दावत जो ख़ुदा से डरकर लोगों के साथ मामला करें।

दावत का तरीक़ा क्या होगा? इस सिलसिले में क़ुरआन ने रहनुमाई की है कि-

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

हिकमत से मुराद ये है कि लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने में पूरी सूझ-बूझ और अक़लमन्दी से काम लिया जाए। उम्दा नसीहत से मुराद ये है कि कोई बात ग़लत न हो, ख़िलाफ़े-वाक़िआ न हो और हमदर्दी से भरी हुई हो। और फिर उनके साथ ऐसे तरीक़े से डिस्कशन करो कि वो बात को समझने के लिये आमादा हो जाएँ, जहाँ बात झगड़े और कठहुज्जती पर आ जाए तो रुक जाओ और किसी मुनासिब वक़्त का इन्तिज़ार करो ताकि वो बात को समझ सके। इस सिलसिले में सूरा यूसुफ़ का मुताला बहुत मुफ़ीद होगा कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी बात किस तरह लोगों तक पहुँचाई।

कुछ तरीक़े जो हमें दावत के सिलसिले में इख़्तियार करने चाहियें वो इस तरह हो सकते हैं : (अमन का ये पैग़ाम चाहे किसी ऐसे शख़्स को पहुँचाया जा रहा हो मुसलमान होने का दावा कर रहा हो या उसे जो इस्लाम को न मानता हो)

(1) कॉमन इशूज़ पर बात की शुरूआत करें (2) अपनी क़ौम का या अपने मसलक का ख़ाह-मख़ाह दिफ़ाअ (Deffence) न किया जाए। हम मुसलमानों की तरफ़ दावत देने या मसलक की तरफ़ दावत देने के लिये खड़े नहीं हुए हैं। (3) सामने वाले के मैयार और उसकी ज़बान का लिहाज़ रखा जाए ताकि उसे बात को समझने में आसानी हो। (4) किसी के मज़हब या मसलक की मुख़ालिफ़त न की जाए और न उनके बुज़ुर्गों को बुरा भला कहा जाए। (5) जिससे भी बात की जाए ख़ैर-ख़ाही के जज़्बे के साथ की जाए, उसे लगे कि आप उसकी और पूरे समाज की भलाई की बात कर रहे हैं। (6) बन्दों से अपने काम की अजर की तवक़्क़ो न रखें (7) लोगों की हिदायत के लिये अल्लाह से दुआ भी करें। कि हिदायत देनेवाला अल्लाह है

اِنَّكَ لَا تَهْدِيْ مَنْ اَحْبَبْتَ وَ لٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَآءُ١ۚ وَ هُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِيْنَ ط

ऐ नबी, तुम जिसे चाहो उसे हिदायत नहीं दे सकते, मगर अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और वो उन लोगों को ख़ूब जानता है जो हिदायत क़बूल करनेवाले हैं।

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नोट : हिफ़्ज़ करने के लिये आज की आयत सूरा-16, आयत-125

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

Hindi

दावत का लुग़वी माना : दावत ‘द-अ-व’ से बना है जिसके माने हैं किसी को अपनी आवाज़ या बात से अपनी तरफ़ मायल और मुतवज्जेह कर लेना। सूरा बक़रा आयत-23 में कहा गया कि तुम अपने मददगारों को पुकारो।

وَ ادۡعُوۡا شُہَدَآءَکُمۡ مِّنۡ دُوۡنِ اللّٰہِ اِنۡ کُنۡتُمۡ صٰدِقِیۡنَ

“एक अल्लाह को छोड़कर बाक़ी जिसकी चाहो (मदद के लिये) बुला लो, अगर तुम सच्चे हो तो ये काम करके दिखाओ।

सूरा-2, आयत-61 में हैं कि अपने परवरदिगार को पुकारो। فَادۡعُ لَنَا رَبَّکَ

इसी से ‘दावा’ बना है जिसका मतलब बात, पुकार, मुतालबा या तक़ाज़ा है।

دَعۡوٰىہُمۡ فِیۡہَا سُبۡحٰنَکَ اللّٰہُمَّ ………وَ اٰخِرُ دَعۡوٰىہُمۡ اَنِ الۡحَمۡدُ لِلّٰہِ رَبِّ الۡعٰلَمِیۡنَ(10:10)

“वहाँ उनकी पुकार होगी कि ‘पाक है तू ऐ ख़ुदा!’….. और उनकी हर बात इस पर ख़त्म होगी कि “सारी तारीफ़ अल्लाह रब्बुल-आलमीन के लिये है।“

दावत के इस्तिलाही माना: दावत का इस्तिलाही माना होगा लोगों को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाना या लोगों को उस दीन और निज़ामे-ज़िन्दगी की तरफ़ पुकारना जिसे अल्लाह की तरफ़ से मुहम्मद (सल्ल) ने हम तक पहुँचाया था।

दीन में दावत की अहमियत: जिस चीज़ या जिस बात की हमारी नज़र में बहुत ज़्यादा अहमियत होती है उसे हम बार-बार और मुख़्तलिफ़ नामों से जानते और पुकारते हैं। क़ुरआन में दावत की अहमियत के ताल्लुक़ से भी ये बात सच साबित होती है। क़ुरआन में इस दावत को बहुत बार और मुख़्तलिफ़ नामों से पुकारा गया है मसलन कहीं इसे शहादत-अलन्नास (यानी लोगों पर गवाही) के नाम से पुकारा गया है। (देखें क़ुरआन 2:143; 22:78) और कहीं इसे बयान और तबयीन का नाम दिया गया है। (देखें 2:160; 16:44) कहीं इसे नसीहत कहा गया; तो कहीं इसे तब्लीग़ का नाम दिया गया। (5:67) कहीं इसे इंज़ार और तबशीर (डराना और ख़ुशख़बरी) कहा है। (48:8) तो कहीं इसे तज़्कीर का नाम दिया गया। (87:9) ग़रज़ ये कि नाम भले ही मुख़्तलिफ़ हों लेकिन बात एक ही कही गई है कि लोगों को बुलाओ, पुकारो, नसीहत करो, डराओ या उसके पैग़ाम को पहुँचाओ वग़ैरा।

दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमियाँ : दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमी ये है कि ये फ़र्ज़ नहीं है बस उसी तरह का कोई अमल है कि न भी किया जाए तो कोई हरज नहीं है। ये ग़लतफ़हमी दरअस्ल दो-तीन वजह से पैदा हुई :

1) ये ग़लतफ़हमी इस वजह से है कि दावत का लफ़्ज़ हमने ग़ैर-मुस्लिम हज़रात के लिये ख़ास कर दिया कि दावत तो सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों को दी जाएगी मुसलमान इससे मुराद नहीं है, मुसलमानों में तो इस्लाह का काम किया जाएगा। हालाँकि क़ुरआन व हदीस में कहीं नहीं है कि दावत सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम को ही दी जाएगी। अब चूंकि ग़ैर-मुस्लिम को दावत देने के लिये ख़ास सलाहियत होनी चाहिये और वो सलाहियत हममें मौजूद नहीं है इसलिये हम ये काम नहीं कर सकते।

2) दूसरी वजह ये रही है कि क़ुरआन में एक आयत में अल्लाह ने फ़रमाया है कि

وَ لْتَكُنْ مِّنْكُمْ اُمَّةٌ يَّدْعُوْنَ اِلَى الْخَيْرِ وَ يَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ يَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ١ؕ وَ اُولٰٓىِٕكَ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ

“तुम में से कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही होने चाहियें जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ, भलाई का हुक्म दें, और बुराइयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे वही लोग कामयाब होंगे।”

इस आयत से ये समझ लिया गया कि इसमें कहा गया कि तुममें से कुछ लोग ऐसे होने चाहियें, लिहाज़ा सबके लिये ज़रूरी नहीं है। इसलिये ये फ़र्ज़े-किफ़ाया है न की फ़र्ज़े-ऐन। यानी अगर कुछ लोग कर लें तो सब पर से ये फ़र्ज़ अदा हो जाएगा। हालाँकि ख़ुद आयत इस बात की तरदीद करती है कि जो लोग ये काम करेंगे वही कामयाब होंगे। अल्लामा इब्ने-कसीर फ़रमाते हैं कि “इस आयत का मक़सूद ये है कि इस उम्मत का एक तबक़ा इस फ़रीज़े और हुक्म की अदायगी के लिये मौजूद होना चाहिये हालाँकि ये काम इस उम्मत के एक-एक फ़र्द पर इनफ़िरादी तौर पर अपनी-अपनी ताक़त और सलाहियत के मुताबिक़ वाजिब है।”

क़ुरआन से भी ये बात वाज़ेह होती है; चुनांचे कहा गया कि :

كُنْتُمْ خَيْرَ اُمَّةٍ اُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ تَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَ تُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ١ؕ۱۱۰{البقرہ}

दुनिया में बेहतरीन गरोह तुम हो जिसे इन्सानों की हिदायत और इस्लाह के लिये मैदान में लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो, बदी से रोकते और अल्लाह पर ईमान रखते हो।

फिर ये भी कि وَ كَذٰلِكَ جَعَلْنٰكُمْ اُمَّةً وَّسَطًا لِّتَكُوْنُوْا شُهَدَآءَ عَلَى النَّاسِ وَ يَكُوْنَ الرَّسُوْلُ عَلَيْكُمْ شَهِيْدًا

“और इसी तरह तो हमने तुम मुसलमानों को एक “बीच की उम्मत” बनाया है ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो।” (2:143)

दावत का काम क्यों ज़रूरी है : इस्लाम चूँकि दीने-रहमत है, चूँकि ये सलामती और शान्ति का दीन है और सलामती और शान्ति हर शख्स की बुनियादी ज़रूरत है इस लिहाज़ है दावत का काम ज़रूरी है। सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम ही को नहीं मुसलमानों को भी सलामती की ज़रूरत है; इसलिये इस काम का किया जाना ज़रूरी है। हक़ीक़त में पूरी दुनिया को तबाही से बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है कि लोगों को अम्न और सलामती यानी इस्लाम की दावत दी जाए उनको रहमत की तरफ़ बुलाया जाए। अब चूँकि ख़ुद मुसलमान अम्न व सलामती के इस दीन से बहुत दूर हैं लिहाज़ा उन्हें सबसे पहले इसकी तरफ़ पुकारा जाए।

दावत का काम इसलिये भी ज़रूरी है कि क़ुरआन कहता है कि अगर तुम्हारे पास हक़ है और तुम उसको छिपा लो तो ये ज़ुल्मे-अज़ीम है :

وَ مَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ كَتَمَ شَهَادَةً عِنْدَهٗ مِنَ اللّٰه

इसके बरख़िलाफ़ ये भी कहा कि जो हक़ बात को पहुँचा दे तो इससे बड़ी भलाई का कोई काम नहीं है : وَمَنْ اَحْسَنُ قَوْلً مِّمّنْ دَعَ اِلَیْ اللہ وَعَمِلَ صاَلِحاًوَّقاَلَ اِنَّنیِ مِنَ الْمُسْلِمیِنْ

उस शख़्स से बढ़कर अच्छी बात और किसकी होगी जो लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाए और ख़ुद नेका अमल करे और कहे कि मैं मुसलमान हूँ।

एक आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि जो हक़ को छिपा ले और लोगों तक न पहुँचाए उस पर अल्लाह की लानत और तमाम लानत करने वालों की लानत :

اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْتُمُوْنَ مَاۤ اَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنٰتِ وَ الْهُدٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا بَيَّنّٰهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتٰبِ١ۙ اُولٰٓىِٕكَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰهُ وَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰعِنُوْنَۙ 2:259

दावत क्या देनी है? दावत का मतलब और उसकी अहमियत समझ लेने के बाद एक बात ये भी समझने की है कि दावत क्या है जो लोगों तक पहुँचानी है। प्यारे नबी (सल्ल०) के सामने तो बस लोग थे जिनको आपने दावत पहुँचाई, लेकिन इस वक़्त मसला ये है कि हमारे सामने दो तरह के लोग हैं एक तो वो हैं जो इस्लाम को मानने का दावा करते हैं लेकिन इस्लाम से दूर हैं, और दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं जो सिरे से इस्लाम को मानते ही नहीं हैं। चुनांचे इन दोनों तरह के लोगों को सामने रखते हुए हमारी दावत में तीन बातें हो सकती हैं जो बेलाग हैं :

1) तमाम बन्दगाने ख़ुदा को आम तौर से और मुसलमानों को ख़ास तौर से अल्लाह की बन्दगी की दावत दी जाए कि यही तमाम नबियों की दावत रही है।

2) जो लोग मुसलमान होने का दावा करते हैं उन्हें इस बात की तरफ़ दावत दी जाए कि जब वो मुसलमान हैं तो इस्लाम की सही-सही नुमाइन्दगी करें।

3) जिस समाज में हम रहते हैं उसमें जो ज़िम्मेदार हैं उन्हें इस बात की दावत दी जाए कि वो समाज में लोगों के साथ ख़ुदा से डरकर मामला करें या उन पदों पर ऐसे लोगों को बिठाने की दावत जो ख़ुदा से डरकर लोगों के साथ मामला करें।

दावत का तरीक़ा क्या होगा? इस सिलसिले में क़ुरआन ने रहनुमाई की है कि-

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

हिकमत से मुराद ये है कि लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने में पूरी सूझ-बूझ और अक़लमन्दी से काम लिया जाए। उम्दा नसीहत से मुराद ये है कि कोई बात ग़लत न हो, ख़िलाफ़े-वाक़िआ न हो और हमदर्दी से भरी हुई हो। और फिर उनके साथ ऐसे तरीक़े से डिस्कशन करो कि वो बात को समझने के लिये आमादा हो जाएँ, जहाँ बात झगड़े और कठहुज्जती पर आ जाए तो रुक जाओ और किसी मुनासिब वक़्त का इन्तिज़ार करो ताकि वो बात को समझ सके। इस सिलसिले में सूरा यूसुफ़ का मुताला बहुत मुफ़ीद होगा कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी बात किस तरह लोगों तक पहुँचाई।

कुछ तरीक़े जो हमें दावत के सिलसिले में इख़्तियार करने चाहियें वो इस तरह हो सकते हैं : (अमन का ये पैग़ाम चाहे किसी ऐसे शख़्स को पहुँचाया जा रहा हो मुसलमान होने का दावा कर रहा हो या उसे जो इस्लाम को न मानता हो)

(1) कॉमन इशूज़ पर बात की शुरूआत करें (2) अपनी क़ौम का या अपने मसलक का ख़ाह-मख़ाह दिफ़ाअ (Deffence) न किया जाए। हम मुसलमानों की तरफ़ दावत देने या मसलक की तरफ़ दावत देने के लिये खड़े नहीं हुए हैं। (3) सामने वाले के मैयार और उसकी ज़बान का लिहाज़ रखा जाए ताकि उसे बात को समझने में आसानी हो। (4) किसी के मज़हब या मसलक की मुख़ालिफ़त न की जाए और न उनके बुज़ुर्गों को बुरा भला कहा जाए। (5) जिससे भी बात की जाए ख़ैर-ख़ाही के जज़्बे के साथ की जाए, उसे लगे कि आप उसकी और पूरे समाज की भलाई की बात कर रहे हैं। (6) बन्दों से अपने काम की अजर की तवक़्क़ो न रखें (7) लोगों की हिदायत के लिये अल्लाह से दुआ भी करें। कि हिदायत देनेवाला अल्लाह है

اِنَّكَ لَا تَهْدِيْ مَنْ اَحْبَبْتَ وَ لٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَآءُ١ۚ وَ هُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِيْنَ ط

ऐ नबी, तुम जिसे चाहो उसे हिदायत नहीं दे सकते, मगर अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और वो उन लोगों को ख़ूब जानता है जो हिदायत क़बूल करनेवाले हैं।

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नोट : हिफ़्ज़ करने के लिये आज की आयत सूरा-16, आयत-125

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

दावत का लुग़वी माना : दावत ‘द-अ-व’ से बना है जिसके माने हैं किसी को अपनी आवाज़ या बात से अपनी तरफ़ मायल और मुतवज्जेह कर लेना। सूरा बक़रा आयत-23 में कहा गया कि तुम अपने मददगारों को पुकारो।

وَ ادۡعُوۡا شُہَدَآءَکُمۡ مِّنۡ دُوۡنِ اللّٰہِ اِنۡ کُنۡتُمۡ صٰدِقِیۡنَ

“एक अल्लाह को छोड़कर बाक़ी जिसकी चाहो (मदद के लिये) बुला लो, अगर तुम सच्चे हो तो ये काम करके दिखाओ।

सूरा-2, आयत-61 में हैं कि अपने परवरदिगार को पुकारो। فَادۡعُ لَنَا رَبَّکَ

इसी से ‘दावा’ बना है जिसका मतलब बात, पुकार, मुतालबा या तक़ाज़ा है।

دَعۡوٰىہُمۡ فِیۡہَا سُبۡحٰنَکَ اللّٰہُمَّ ………وَ اٰخِرُ دَعۡوٰىہُمۡ اَنِ الۡحَمۡدُ لِلّٰہِ رَبِّ الۡعٰلَمِیۡنَ(10:10)

“वहाँ उनकी पुकार होगी कि ‘पाक है तू ऐ ख़ुदा!’….. और उनकी हर बात इस पर ख़त्म होगी कि “सारी तारीफ़ अल्लाह रब्बुल-आलमीन के लिये है।“

दावत के इस्तिलाही माना: दावत का इस्तिलाही माना होगा लोगों को एक अल्लाह की तरफ़ बुलाना या लोगों को उस दीन और निज़ामे-ज़िन्दगी की तरफ़ पुकारना जिसे अल्लाह की तरफ़ से मुहम्मद (सल्ल) ने हम तक पहुँचाया था।

दीन में दावत की अहमियत: जिस चीज़ या जिस बात की हमारी नज़र में बहुत ज़्यादा अहमियत होती है उसे हम बार-बार और मुख़्तलिफ़ नामों से जानते और पुकारते हैं। क़ुरआन में दावत की अहमियत के ताल्लुक़ से भी ये बात सच साबित होती है। क़ुरआन में इस दावत को बहुत बार और मुख़्तलिफ़ नामों से पुकारा गया है मसलन कहीं इसे शहादत-अलन्नास (यानी लोगों पर गवाही) के नाम से पुकारा गया है। (देखें क़ुरआन 2:143; 22:78) और कहीं इसे बयान और तबयीन का नाम दिया गया है। (देखें 2:160; 16:44) कहीं इसे नसीहत कहा गया; तो कहीं इसे तब्लीग़ का नाम दिया गया। (5:67) कहीं इसे इंज़ार और तबशीर (डराना और ख़ुशख़बरी) कहा है। (48:8) तो कहीं इसे तज़्कीर का नाम दिया गया। (87:9) ग़रज़ ये कि नाम भले ही मुख़्तलिफ़ हों लेकिन बात एक ही कही गई है कि लोगों को बुलाओ, पुकारो, नसीहत करो, डराओ या उसके पैग़ाम को पहुँचाओ वग़ैरा।

दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमियाँ : दावत के सिलसिले में ग़लतफ़हमी ये है कि ये फ़र्ज़ नहीं है बस उसी तरह का कोई अमल है कि न भी किया जाए तो कोई हरज नहीं है। ये ग़लतफ़हमी दरअस्ल दो-तीन वजह से पैदा हुई :

1) ये ग़लतफ़हमी इस वजह से है कि दावत का लफ़्ज़ हमने ग़ैर-मुस्लिम हज़रात के लिये ख़ास कर दिया कि दावत तो सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों को दी जाएगी मुसलमान इससे मुराद नहीं है, मुसलमानों में तो इस्लाह का काम किया जाएगा। हालाँकि क़ुरआन व हदीस में कहीं नहीं है कि दावत सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम को ही दी जाएगी। अब चूंकि ग़ैर-मुस्लिम को दावत देने के लिये ख़ास सलाहियत होनी चाहिये और वो सलाहियत हममें मौजूद नहीं है इसलिये हम ये काम नहीं कर सकते।

2) दूसरी वजह ये रही है कि क़ुरआन में एक आयत में अल्लाह ने फ़रमाया है कि

وَ لْتَكُنْ مِّنْكُمْ اُمَّةٌ يَّدْعُوْنَ اِلَى الْخَيْرِ وَ يَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ يَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ١ؕ وَ اُولٰٓىِٕكَ هُمُ الْمُفْلِحُوْنَ

“तुम में से कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही होने चाहियें जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ, भलाई का हुक्म दें, और बुराइयों से रोकते रहें। जो लोग ये काम करेंगे वही लोग कामयाब होंगे।”

इस आयत से ये समझ लिया गया कि इसमें कहा गया कि तुममें से कुछ लोग ऐसे होने चाहियें, लिहाज़ा सबके लिये ज़रूरी नहीं है। इसलिये ये फ़र्ज़े-किफ़ाया है न की फ़र्ज़े-ऐन। यानी अगर कुछ लोग कर लें तो सब पर से ये फ़र्ज़ अदा हो जाएगा। हालाँकि ख़ुद आयत इस बात की तरदीद करती है कि जो लोग ये काम करेंगे वही कामयाब होंगे। अल्लामा इब्ने-कसीर फ़रमाते हैं कि “इस आयत का मक़सूद ये है कि इस उम्मत का एक तबक़ा इस फ़रीज़े और हुक्म की अदायगी के लिये मौजूद होना चाहिये हालाँकि ये काम इस उम्मत के एक-एक फ़र्द पर इनफ़िरादी तौर पर अपनी-अपनी ताक़त और सलाहियत के मुताबिक़ वाजिब है।”

क़ुरआन से भी ये बात वाज़ेह होती है; चुनांचे कहा गया कि :

كُنْتُمْ خَيْرَ اُمَّةٍ اُخْرِجَتْ لِلنَّاسِ تَاْمُرُوْنَ بِالْمَعْرُوْفِ وَ تَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَ تُؤْمِنُوْنَ بِاللّٰهِ١ؕ۱۱۰{البقرہ}

दुनिया में बेहतरीन गरोह तुम हो जिसे इन्सानों की हिदायत और इस्लाह के लिये मैदान में लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो, बदी से रोकते और अल्लाह पर ईमान रखते हो।

फिर ये भी कि وَ كَذٰلِكَ جَعَلْنٰكُمْ اُمَّةً وَّسَطًا لِّتَكُوْنُوْا شُهَدَآءَ عَلَى النَّاسِ وَ يَكُوْنَ الرَّسُوْلُ عَلَيْكُمْ شَهِيْدًا

“और इसी तरह तो हमने तुम मुसलमानों को एक “बीच की उम्मत” बनाया है ताकि तुम दुनिया के लोगों पर गवाह हो और रसूल तुम पर गवाह हो।” (2:143)

दावत का काम क्यों ज़रूरी है : इस्लाम चूँकि दीने-रहमत है, चूँकि ये सलामती और शान्ति का दीन है और सलामती और शान्ति हर शख्स की बुनियादी ज़रूरत है इस लिहाज़ है दावत का काम ज़रूरी है। सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम ही को नहीं मुसलमानों को भी सलामती की ज़रूरत है; इसलिये इस काम का किया जाना ज़रूरी है। हक़ीक़त में पूरी दुनिया को तबाही से बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है कि लोगों को अम्न और सलामती यानी इस्लाम की दावत दी जाए उनको रहमत की तरफ़ बुलाया जाए। अब चूँकि ख़ुद मुसलमान अम्न व सलामती के इस दीन से बहुत दूर हैं लिहाज़ा उन्हें सबसे पहले इसकी तरफ़ पुकारा जाए।

दावत का काम इसलिये भी ज़रूरी है कि क़ुरआन कहता है कि अगर तुम्हारे पास हक़ है और तुम उसको छिपा लो तो ये ज़ुल्मे-अज़ीम है :

وَ مَنْ اَظْلَمُ مِمَّنْ كَتَمَ شَهَادَةً عِنْدَهٗ مِنَ اللّٰه

इसके बरख़िलाफ़ ये भी कहा कि जो हक़ बात को पहुँचा दे तो इससे बड़ी भलाई का कोई काम नहीं है : وَمَنْ اَحْسَنُ قَوْلً مِّمّنْ دَعَ اِلَیْ اللہ وَعَمِلَ صاَلِحاًوَّقاَلَ اِنَّنیِ مِنَ الْمُسْلِمیِنْ

उस शख़्स से बढ़कर अच्छी बात और किसकी होगी जो लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाए और ख़ुद नेका अमल करे और कहे कि मैं मुसलमान हूँ।

एक आयत में अल्लाह फ़रमाता है कि जो हक़ को छिपा ले और लोगों तक न पहुँचाए उस पर अल्लाह की लानत और तमाम लानत करने वालों की लानत :

اِنَّ الَّذِيْنَ يَكْتُمُوْنَ مَاۤ اَنْزَلْنَا مِنَ الْبَيِّنٰتِ وَ الْهُدٰى مِنْۢ بَعْدِ مَا بَيَّنّٰهُ لِلنَّاسِ فِي الْكِتٰبِ١ۙ اُولٰٓىِٕكَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰهُ وَ يَلْعَنُهُمُ اللّٰعِنُوْنَۙ 2:259

दावत क्या देनी है? दावत का मतलब और उसकी अहमियत समझ लेने के बाद एक बात ये भी समझने की है कि दावत क्या है जो लोगों तक पहुँचानी है। प्यारे नबी (सल्ल०) के सामने तो बस लोग थे जिनको आपने दावत पहुँचाई, लेकिन इस वक़्त मसला ये है कि हमारे सामने दो तरह के लोग हैं एक तो वो हैं जो इस्लाम को मानने का दावा करते हैं लेकिन इस्लाम से दूर हैं, और दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं जो सिरे से इस्लाम को मानते ही नहीं हैं। चुनांचे इन दोनों तरह के लोगों को सामने रखते हुए हमारी दावत में तीन बातें हो सकती हैं जो बेलाग हैं :

1) तमाम बन्दगाने ख़ुदा को आम तौर से और मुसलमानों को ख़ास तौर से अल्लाह की बन्दगी की दावत दी जाए कि यही तमाम नबियों की दावत रही है।

2) जो लोग मुसलमान होने का दावा करते हैं उन्हें इस बात की तरफ़ दावत दी जाए कि जब वो मुसलमान हैं तो इस्लाम की सही-सही नुमाइन्दगी करें।

3) जिस समाज में हम रहते हैं उसमें जो ज़िम्मेदार हैं उन्हें इस बात की दावत दी जाए कि वो समाज में लोगों के साथ ख़ुदा से डरकर मामला करें या उन पदों पर ऐसे लोगों को बिठाने की दावत जो ख़ुदा से डरकर लोगों के साथ मामला करें।

दावत का तरीक़ा क्या होगा? इस सिलसिले में क़ुरआन ने रहनुमाई की है कि-

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

हिकमत से मुराद ये है कि लोगों को अल्लाह की तरफ़ बुलाने में पूरी सूझ-बूझ और अक़लमन्दी से काम लिया जाए। उम्दा नसीहत से मुराद ये है कि कोई बात ग़लत न हो, ख़िलाफ़े-वाक़िआ न हो और हमदर्दी से भरी हुई हो। और फिर उनके साथ ऐसे तरीक़े से डिस्कशन करो कि वो बात को समझने के लिये आमादा हो जाएँ, जहाँ बात झगड़े और कठहुज्जती पर आ जाए तो रुक जाओ और किसी मुनासिब वक़्त का इन्तिज़ार करो ताकि वो बात को समझ सके। इस सिलसिले में सूरा यूसुफ़ का मुताला बहुत मुफ़ीद होगा कि हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपनी बात किस तरह लोगों तक पहुँचाई।

कुछ तरीक़े जो हमें दावत के सिलसिले में इख़्तियार करने चाहियें वो इस तरह हो सकते हैं : (अमन का ये पैग़ाम चाहे किसी ऐसे शख़्स को पहुँचाया जा रहा हो मुसलमान होने का दावा कर रहा हो या उसे जो इस्लाम को न मानता हो)

(1) कॉमन इशूज़ पर बात की शुरूआत करें (2) अपनी क़ौम का या अपने मसलक का ख़ाह-मख़ाह दिफ़ाअ (Deffence) न किया जाए। हम मुसलमानों की तरफ़ दावत देने या मसलक की तरफ़ दावत देने के लिये खड़े नहीं हुए हैं। (3) सामने वाले के मैयार और उसकी ज़बान का लिहाज़ रखा जाए ताकि उसे बात को समझने में आसानी हो। (4) किसी के मज़हब या मसलक की मुख़ालिफ़त न की जाए और न उनके बुज़ुर्गों को बुरा भला कहा जाए। (5) जिससे भी बात की जाए ख़ैर-ख़ाही के जज़्बे के साथ की जाए, उसे लगे कि आप उसकी और पूरे समाज की भलाई की बात कर रहे हैं। (6) बन्दों से अपने काम की अजर की तवक़्क़ो न रखें (7) लोगों की हिदायत के लिये अल्लाह से दुआ भी करें। कि हिदायत देनेवाला अल्लाह है

اِنَّكَ لَا تَهْدِيْ مَنْ اَحْبَبْتَ وَ لٰكِنَّ اللّٰهَ يَهْدِيْ مَنْ يَّشَآءُ١ۚ وَ هُوَ اَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِيْنَ ط

ऐ नबी, तुम जिसे चाहो उसे हिदायत नहीं दे सकते, मगर अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और वो उन लोगों को ख़ूब जानता है जो हिदायत क़बूल करनेवाले हैं।

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नोट : हिफ़्ज़ करने के लिये आज की आयत सूरा-16, आयत-125

اُدْعُ اِلٰى سَبِيْلِ رَبِّكَ بِالْحِكْمَةِ وَ الْمَوْعِظَةِ الْحَسَنَةِ وَ جَادِلْهُمْ بِالَّتِيْ هِيَ اَحْسَنُ١ؕ

लोगों को अल्लाह के रास्ते की तरफ़ बुलाओ हिकमत और उम्दा नसीहत के साथ और उनके साथ डिस्कशन करो बेहतरीन तरीक़े से (ताकि उनकी बात समझ में आए)

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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