जिस तरह अमानत के तौर पर रखे हुए माल में ख़ियानत करने से इन्सान के ऊपर से भरोसा उठ जाता है जिससे इन्सानी समाज में एक तरह का फ़साद बरपा हो जाता है।
उसी तरह लोगों के दरम्यान राज़ की बातें भी अमानत होती हैं, जिनमें ख़ियानत करने से चुग़ली और ग़ीबत जैसी मोहलिक बीमारियाँ पनपने लगती हैं जो पूरे समाज के अम्नो-अमान को तबाह कर सकती हैं।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि लोगों की राज़ की बातों की भी उसी तरह हिफ़ाज़त की जाए जिस तरह अपने पास रखी हुई अमानतों की हिफ़ाज़त की जाती है। इससे उम्मीद है कि हम समाज में एक मुस्बत (Positive) फ़िज़ा को बहाल रखने में कामयाब होंगे।
“तुम में से कोई किसी की ग़ीबत न करे। क्या तुम्हारे अन्दर कोई ऐसा है जो अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसन्द करेगा?” (क़ुरआन 49 : 12)
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जिस तरह कमज़ोर दीवारें भारी छत को बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं। नतीजतन पहले तो दीवारों में दरारें ज़ाहिर होती हैं, फिर उनमें टेढ़ आती है और फिर गिर जाती हैं और पूरा मकान ध्वस्त होकर रह जाता है।
उसी तरह ज़र्फ़ के कमज़ोर (ओछापन) होने पर इन्सान माल-दौलत और इक़्तिदार के भारी बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। नतीजतन पहले तो रियाकारी ज़ाहिर होती है और फिर ज़ुल्म-व-ज़्यादती में इज़ाफ़ा होता चला जाता है और फिर एक दिन ऐसा आता है कि पूरी शख़्सियत भरभराकर गिर जाती है और ध्वस्त होकर रह जाती है।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि माल की तमन्ना करने के साथ-साथ अपने अन्दर आला-ज़रफ़ी पैदा करके दिल की दुनिया को वसीअ और बड़ा किया जाए ताकि माल के मिलने पर रियाकारी जैसी घिनौनी बीमारी क़रीब भी न फटकने पाए और इन्सान ज़ुल्म-व-ज़्यादती से बाज़ रह सके।
“जो अपने दिल की तंगी से महफ़ूज़ रह गए बस वही फ़लाह पानेवाले हैं।” (क़ुरआन 64 : 16)