गरोह-बन्दी अल्लाह का अज़ाब है
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क़ुरआन मजीद की सूरा अनआम आयत-65 में अल्लाह फ़रमाता है
قُلۡ ہُوَ الۡقَادِرُ عَلٰۤی اَنۡ یَّبۡعَثَ عَلَیۡکُمۡ عَذَابًا مِّنۡ فَوۡقِکُمۡ اَوۡ مِنۡ تَحۡتِ اَرۡجُلِکُمۡ اَوۡ یَلۡبِسَکُمۡ شِیَعًا وَّ یُذِیۡقَ بَعۡضَکُمۡ بَاۡسَ بَعۡضٍ ؕ اُنۡظُرۡ کَیۡفَ نُصَرِّفُ الۡاٰیٰتِ لَعَلَّہُمۡ یَفۡقَہُوۡنَ
कहो : वो इसकी क़ुदरत रखता है कि तुम पर कोई अज़ाब ऊपर से नाज़िल कर दे, या तुम्हारे क़दमों के नीचे से बरपा कर दे, या तुम्हें गरोहों में बाँट कर एक गरोह को दूसरे गरोह की ताक़त का मज़ा चखवा दे। देखो, हम किस तरह बार-बार अलग-अलग तरीक़ों से अपनी निशानियाँ उनके सामने पेश कर रहे हैं, शायद कि ये हक़ीक़त को समझ लें।
इस आयत की तशरीह बुख़ारी शरीफ़ में इस तरह मिलती है कि जब ये आयत नाज़िल हुई
قل هو القادر على أن يبعث عليكم عذابا من فوقكم
“आप कह दीजिये कि वो क़ादिर है इस पर कि तुम पर तुम्हारे ऊपर से अज़ाब नाज़िल करे।”
तो नबी करीम (सल्ल०) ने कहा, “मैं (इस तरह के अज़ाब से) तेरी पनाह माँगता हूँ।” फिर आयत के ये अलफ़ाज़ नाज़िल हुए
أو من تحت أرجلكم
“या वो (उस अज़ाब को) तुम्हारे क़दमों के नीचे से बरपा कर दे।”
तो नबी करीम (सल्ल०) ने फिर ये दुआ की कि “मैं (इस तरह के किसी भी अज़ाब से) तेरी पनाह चाहता हूँ।”
फिर ये आयत नाज़िल हुई।
أو يلبسكم شيعا
“या तुम्हें फ़िरक़ा-बन्दी (गरोह-बन्दी) में मुब्तला कर दे (कि ये भी अज़ाब की क़िस्म है)”
तो नबी करीम (सल्ल०) ने फ़रमाया कि ये आसान है बनिस्बत अगले अज़ाबों के। (बुख़ारी : 7406)
यानी फ़िरक़ा-बन्दी या गरोह-बन्दी भी अज़ाब की एक शक्ल है और लोग इस अज़ाब में आसानी से मुब्तला हो जाते हैं। पहले दोनों अज़ाबों में तो उम्मतें तबाह कर दी जाती हैं लेकिन इस तीसरे अज़ाब की सख़्ती ये है कि उम्मत अज़ाब में मुब्तला होकर अल्लाह के अज़ाब का शिकार बनी रहती है लेकिन उम्मत को इसका एहसास तक नहीं होता। लिहाज़ा आज ज़रूरत है मुसलमान मसलकी, जमाअती और इलाक़ाई हर क़िस्म की गिरोहबन्दी के अज़ाब से निकलें क्योंकि किसी अज़ाब-याफ़्ता क़ौम पर अल्लाह की तरफ़ से मदद कभी नाज़िल नहीं हुआ करती। और इस गरोह-बन्दी से निकलने का एक ही तरीक़ा है कि हम सब मिलकर अल्लाह की रस्सी क़ुरआन को मज़बूती से थाम लें।
وَ اعۡتَصِمُوۡا بِحَبۡلِ اللّٰہِ جَمِیۡعًا وَّ لَا تَفَرَّقُوۡا ۪
सब मिलकर अल्लाह की रस्सी (क़ुरआन) को मज़बूत पकड़ लो और तफ़रक़े (गरोह-बन्दी) में न पड़ो। (आले-इमरान :103)