क्रिसमस

क्रिसमस

क़ुरआन-मजीद और इंजीले-मुक़द्दस की कॉमन तालीमात का ख़ुलासा

(आओ ऐसी बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान कॉमन हैं)

अल्लाह ने इंसान को पैदा किया और उसे अक़्ल व शुऊर से नवाज़ा। इंसान को बहुत-से मामलों में आज़ादी और इख़्तियार अता किया ताकि अल्लाह ये देख सके कि अपनी मर्ज़ी और आज़ादी के बावजूद इंसान उसकी बन्दगी को क़बूल करता है या नहीं। यह अल्लाह की इंसान पर अज़ीम मेहरबानी है कि उसने सिर्फ़ इख़्तियार की आज़ादी देकर इंसान को छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसकी रहनुमाई के लिये नबी और रसूल भी भेजे। इन नबियों का मक़सद इंसान तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना और अपनी ज़िन्दगी के ज़रिये उस पर अमल करके दिखाना था।

यह सिलसिला जिसे नुबूवत और रिसालत कहा जाता है, इंसानियत के लिये रहनुमाई और रहमत का ज़रिआ रहा है। तमाम आसमानी मज़ाहिब इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि अल्लाह ने इंसान को सीधा रास्ता दिखाने के लिये नबी भेजे। यहूदी, ईसाई और मुसलमान इन नबियों के पैग़ाम को मानने वालों में शामिल हैं। मगर फ़र्क यह है कि यहूदियों का सिलसिला-ए-नुबूवत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर, ईसाइयों का हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर और मुसलमानों का हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर खत्म होता है। इन तमाम अंबिया की ख़ास बात ये थी कि ये अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहते और करते थे, वही कहते थे जो उन पर वह्य किया जाता था और उसी के मुताबिक़ अमल करते थे जो उनके ऊपर नाज़िल किया जाता था। इंजील में है कि:

“मैं ख़ुद से कुछ नहीं कर सकता। मैं जैसा सुनता हूँ, वैसा फ़ैसला करता हूँ, और मेरा फ़ैसला इंसाफ़ पर मबनी है, क्योंकि मैं अपनी मर्ज़ी नहीं बल्कि अपने भेजने वाले की मर्ज़ी पूरी करता हूँ।” (योहन्ना 5:30)

क़ुरआन मजीद में भी मुहम्मद (सल्ल०) के हवाले से कहा गया है कि ये नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहता सिवाय उसके जो कुछ इन पर वह्य किया जाता है। (क़ुरआन सूरा नज्म : 3, 4)

क़ुरआन मजीद जो तालीम मुसलमानों को देता है वो ये है कि नबियों के मक़ाम और मर्तबे में कोई फ़र्क़ न किया जाए, (2 : 285) सिवाय इसके कि अल्लाह ही ने किसी नबी को किसी ऐतिबार से फ़ज़ीलत अता की हो। (2 : 253) इस ऐतिबार से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़ज़ीलत ये है कि आप (सल्ल०) सिलसिलए-नुबूवत की आख़िरी कड़ी हैं। मुसलमानों को इस बात पर एक दर्जा बढ़त हासिल है कि उनका ईमान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ-साथ हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर भी है। यह इत्तेफ़ाक़ का एक ऐसा अनमोल पहलू है जो मुसलमानों और अहले-किताब के बीच बेहतर ताल्लुक़ात का ज़रिआ बन सकता है।

क़ुरआन और इंजील का कॉमन पैग़ाम

क़ुरआन मजीद हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई आख़िरी किताब है। ये न सिर्फ़ पिछली आसमानी किताबों की तस्दीक़ करती है बल्कि उनके पैग़ाम का ख़ुलासा भी पेश करती है। ये अहले-किताब को बार-बार दावत देती है कि वे उन कॉमन बातों पर मुत्तफ़िक़ होकर साथ में आएँ जो सभी आसमानी किताबों में मौजूद हैं। क़ुरआन मजीद में फरमाया गया:

“आओ हम और तुम उन बातों पर इत्तेफ़ाक़ कर लें जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान समान हैं। यानी हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें और किसी को उसका शरीक न ठहराएँ।” (सूरा आले-इमरान 3:64)

इंजील (जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई) और क़ुरआन मजीद के मुताले से कई ऐसी बातें सामने आती हैं जो दोनों में कॉमन हैं। इनमें से कुछ सबसे अहम तालीमात का ज़िक्र क्रिसमस के मौक़े की मुनासिबत से यहाँ किया जा रहा है, ताकि मुसलामानों और ईसाई भाइयों के दरम्यान मुवाफ़िक़त की राहें हमवार हो सकें।

1. तौहीद: एक ख़ुदा का तसव्वुर

यूँ तो तौहीद तमाम आसमानी मज़ाहिब की बुनियाद है। लेकिन इस्लाम और ईसाइयत इस मामले में नुमायाँ हैसियत रखते हैं। इंजील का मुताला करने से मालूम होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने हमेशा अल्लाह की वहदानियत (एकेश्वरवाद) का दर्स दिया। इंजील में फ़रमाया गया:

“सुनो, ऐ इस्राईल! ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा एक ही ख़ुदावन्द है।” (मरक़ुस 12:29)

एक और जगह कहा गया कि:

“और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपरऔर सब के मध्य में, और सब में है।” (इफ़िसियों 4:6)

एक और जगह कहा गया कि :

“और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।” (मत्ती : 23: 9)

एक और जगह कहा गया कि :

“क्या हम सभों का एक ही पिता नहीं? क्या एक ही परमेश्वर ने हमको उत्पन्न नहीं किया? हम क्यों एक दूसरे का विश्वासघात करके अपने पूर्वजों की वाचा को तोड़ देते हैं?” (मलाकी 2 : 10)

क़ुरआन मजीद में भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हवाले से तौहीद का पैग़ाम इस तरह बयान किया गया है कि :

“बेशक अल्लाह मेरा रब और तुम्हारा रब है, सो तुम उसकी इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (सूरा मरयम 19:36)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को चाहिये कि वे ख़ुदा के एक होने पर मुत्तफ़िक़ होकर दुनिया में काम करें ताकि इन्सानों पर एक ख़ुदा को मानने के जो असरात पड़ने चाहियें वो नुमायाँ तौर पर नज़र आने लगें और लोग एक ख़ुदा के रंग में रंग कर उसकी इस दुनिया को बेहतरीन और ख़ुशनुमा बनाने में अपना रोल अदा कर सकें।

2. अल्लाह की इबादत और इताअत

दूसरी बात जो हमें क़ुरआन और इंजीले-मुक़द्दस में कॉमन नज़र आती है वो है एक अल्लाह की इबादत और इताअत। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िन्दगी में अल्लाह की इबादत को अहमियत दी और दूसरों को भी इसी की तल्क़ीन की। इंजील में है कि:

“तुम शैतान की इबादत न करो बल्कि ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा की इबादत करो और सिर्फ़ उसी की ख़िदमत (इताअत) करो।” (मती 4:10)

ये तालीम वाज़ेह करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और इबादत को ममनू और हराम क़रार दिया।

सूरा आले-इमरान (3:52) में बिलकुल साफ़ तौर पर लिखा है,

“और मसीह ने कहा, ऐ इस्राईल के बेटो! मेरे रब और अपने रब अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि जो शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा।”

क़ुरआन मजीद में एक और जगह फ़रमाया गया:

“और उन्हें इसके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि वह इख़लास के साथ अल्लाह की इबादत करें।” (सूरा अल-बैय्यिना 98:5)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाई हज़रात को इन तालीमात पर ग़ौर करना चाहिये कि वे एक अल्लाह के अलावा न किसी की इबादत करें और न इताअत।

3. एक अल्लाह की हाकिमियत का तसव्वुर

आसमानी मज़ाहिब का एक ख़ास पैग़ाम ये भी है कि उनमें अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की हाकमियत का तसव्वुर पेश किया गया है। इंजील में है कि :

“सो तुम इस तरह दुआ किया करो कि ‘ऐ हमारे ख़ुदा, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पाक माना जाए। तेरी हाकमियत आए; तेरी मर्ज़ी जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे ज़मीन पर भी हो।'” (मत्ती : 6 : 9, 10)

क़ुरआन मजीद में इस तसव्वुर को इस तरह पेश किया गया है कि हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही का है। वही सबसे बेहतर हाकिम है। क़ुरआन मजीद में ये तसव्वुर इतना आम और वाज़ेह है की शायद ही कोई पेज ऐसा हो जिसमें ख़ुदा की बड़ाई और उसकी ख़ुदाई को तस्लीम करने और अल्लाह की ज़मीन पर उसको क़ायम करने का ज़िक्र न मिलता हो।

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को मिलकर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह का हुक्म लागू हो ताकि समाज में अम्न व सलामती क़ायम हो सके।

4. आख़िरत का तसव्वुर और जवाबदेही

तमाम आसमानी मज़ाहिब की एक और ख़ास बात जो सभी में कॉमन नज़र आती है वो है आख़िरत में अल्लाह के सामने अपनी ज़िन्दगी के बारे में जवाबदेही का तसव्वुर। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों को अल्लाह के आगे जवाबदेही का एहसास दिलाया। इंजील में फरमाया गया:

“इस (क़ियामत के दिन) से हैरत में मत पड़ो, क्योंकि वह वक़्त आएगा कि जितने क़ब्रों में हैं, उसकी पुकार को सुनकर निकलेंगे। (और उस दिन) जिन्होंने भलाई की है वे नई ज़िन्दगी जीने के लिये जी उठेंगे (यानी अपने नेक आमाल की जज़ा के लिये ज़िन्दा हो उठेंगे) और जिन्होंने बुराई की है वे सज़ा पाने के लिये जी उठेंगे।” (योहन्ना 5:28, 29)

इंजीले-मुक़द्दस की इन दोनों आयतों को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि क़ुरआन मजीद में जो जगह-जगह क़ियामत का नक़्शा खींचा गया है (देखें सूरा ज़िलज़ाल) वही नक़्शा यहाँ भी खींचा गया है। इस बात को क़ुरआन में इस तरह भी बयान किया गया है कि :

“जो कोई नेक काम करेगा, चाहे वह मर्द हो या औरत, और वह (अल्लाह और आख़िरत पर) ईमान रखता होगा, तो उसे जन्नत में दाख़िल किया जाएगा। और उनकी ज़रा भी हक़-तलफ़ी न की जाएगी।” (सूरा निसा 4:124) “जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी। (सूरा ज़िलज़ाल : 7, 😎

मुसलमानों और ईसाई भाइयों से इस बात की भरपूर तवक़्क़ो की जा सकती है कि उनकी ज़िन्दगी के मामलात इस तरह हों कि उनके ज़ेहनों में आख़िरत में अल्लाह के सामने जवाबदेही का यक़ीन मज़बूत रहे।

5. इंसानी बराबरी और भाईचारा

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों के दरम्यान मसावात (बराबरी) और महब्बत का पैग़ाम दिया। उन्होंने फ़रमाया:

“तुम अपने पड़ोसी से वैसी ही महब्बत करो जैसी तुम अपने आप से करते हो।” (मत्ती 22:39)

इस सिलसिले में क़ुरआन मजीद की तालीमात भी हमारी रहनुमाई करती हैं और मुसलमानों को इस बात के लिये उभरती हैं कि वो इन्सानों की भलाई और ख़ैरख़ाही के मामले में आगे आएँ। क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया:

“ऐ नबी, हमने जो तुमको भेजा है तो असल में दुनियावालों के हक़ में रहमत बनाकर भेजा है।”

क़ुरआन ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि तुम वो बेहतरीन गरोह हो जिसे दुनियाए-इन्सानियत की भलाई के लिये बरपा किया गया है, तुम्हारा काम ये है कि तुम लोगों को भलाइयों की तरफ़ बुलाओ और बुराइयों से रोको। (सूरा-3 : 110)

आख़िरी बात

क्रिसमस के मौक़े पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तालीमात को याद करना और उनकी रौशनी में तौहीद, इंसानी बराबरी, इख़लास और आख़िरत के तसव्वुर को आम करना न सिर्फ़ हमारी ज़िम्मेदारी है बल्कि यह हमारे और ईसाई भाइयों के दरम्यान इत्तेफ़ाक़ का ज़रिआ भी बन सकता है।

क़ुरआन-मजीद और इंजील-मुक़द्दस दोनों की तालीमात हमें नफ़रत, तफ़रक़े और ग़लतफहमियों को दूर करके महब्बत, भाईचारे और इत्तेफ़ाक़ की राह पर चलने का पैग़ाम देती हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम इन तालीमात को कैसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाते हैं और दुनिया को अमन और महब्बत का गहवारा बनाते हैं।

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क़ुरआन-मजीद और इंजीले-मुक़द्दस की कॉमन तालीमात का ख़ुलासा

(आओ ऐसी बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान कॉमन हैं)

अल्लाह ने इंसान को पैदा किया और उसे अक़्ल व शुऊर से नवाज़ा। इंसान को बहुत-से मामलों में आज़ादी और इख़्तियार अता किया ताकि अल्लाह ये देख सके कि अपनी मर्ज़ी और आज़ादी के बावजूद इंसान उसकी बन्दगी को क़बूल करता है या नहीं। यह अल्लाह की इंसान पर अज़ीम मेहरबानी है कि उसने सिर्फ़ इख़्तियार की आज़ादी देकर इंसान को छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसकी रहनुमाई के लिये नबी और रसूल भी भेजे। इन नबियों का मक़सद इंसान तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना और अपनी ज़िन्दगी के ज़रिये उस पर अमल करके दिखाना था।

यह सिलसिला जिसे नुबूवत और रिसालत कहा जाता है, इंसानियत के लिये रहनुमाई और रहमत का ज़रिआ रहा है। तमाम आसमानी मज़ाहिब इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि अल्लाह ने इंसान को सीधा रास्ता दिखाने के लिये नबी भेजे। यहूदी, ईसाई और मुसलमान इन नबियों के पैग़ाम को मानने वालों में शामिल हैं। मगर फ़र्क यह है कि यहूदियों का सिलसिला-ए-नुबूवत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर, ईसाइयों का हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर और मुसलमानों का हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर खत्म होता है। इन तमाम अंबिया की ख़ास बात ये थी कि ये अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहते और करते थे, वही कहते थे जो उन पर वह्य किया जाता था और उसी के मुताबिक़ अमल करते थे जो उनके ऊपर नाज़िल किया जाता था। इंजील में है कि:

“मैं ख़ुद से कुछ नहीं कर सकता। मैं जैसा सुनता हूँ, वैसा फ़ैसला करता हूँ, और मेरा फ़ैसला इंसाफ़ पर मबनी है, क्योंकि मैं अपनी मर्ज़ी नहीं बल्कि अपने भेजने वाले की मर्ज़ी पूरी करता हूँ।” (योहन्ना 5:30)

क़ुरआन मजीद में भी मुहम्मद (सल्ल०) के हवाले से कहा गया है कि ये नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहता सिवाय उसके जो कुछ इन पर वह्य किया जाता है। (क़ुरआन सूरा नज्म : 3, 4)

क़ुरआन मजीद जो तालीम मुसलमानों को देता है वो ये है कि नबियों के मक़ाम और मर्तबे में कोई फ़र्क़ न किया जाए, (2 : 285) सिवाय इसके कि अल्लाह ही ने किसी नबी को किसी ऐतिबार से फ़ज़ीलत अता की हो। (2 : 253) इस ऐतिबार से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़ज़ीलत ये है कि आप (सल्ल०) सिलसिलए-नुबूवत की आख़िरी कड़ी हैं। मुसलमानों को इस बात पर एक दर्जा बढ़त हासिल है कि उनका ईमान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ-साथ हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर भी है। यह इत्तेफ़ाक़ का एक ऐसा अनमोल पहलू है जो मुसलमानों और अहले-किताब के बीच बेहतर ताल्लुक़ात का ज़रिआ बन सकता है।

क़ुरआन और इंजील का कॉमन पैग़ाम

क़ुरआन मजीद हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई आख़िरी किताब है। ये न सिर्फ़ पिछली आसमानी किताबों की तस्दीक़ करती है बल्कि उनके पैग़ाम का ख़ुलासा भी पेश करती है। ये अहले-किताब को बार-बार दावत देती है कि वे उन कॉमन बातों पर मुत्तफ़िक़ होकर साथ में आएँ जो सभी आसमानी किताबों में मौजूद हैं। क़ुरआन मजीद में फरमाया गया:

“आओ हम और तुम उन बातों पर इत्तेफ़ाक़ कर लें जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान समान हैं। यानी हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें और किसी को उसका शरीक न ठहराएँ।” (सूरा आले-इमरान 3:64)

इंजील (जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई) और क़ुरआन मजीद के मुताले से कई ऐसी बातें सामने आती हैं जो दोनों में कॉमन हैं। इनमें से कुछ सबसे अहम तालीमात का ज़िक्र क्रिसमस के मौक़े की मुनासिबत से यहाँ किया जा रहा है, ताकि मुसलामानों और ईसाई भाइयों के दरम्यान मुवाफ़िक़त की राहें हमवार हो सकें।

1. तौहीद: एक ख़ुदा का तसव्वुर

यूँ तो तौहीद तमाम आसमानी मज़ाहिब की बुनियाद है। लेकिन इस्लाम और ईसाइयत इस मामले में नुमायाँ हैसियत रखते हैं। इंजील का मुताला करने से मालूम होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने हमेशा अल्लाह की वहदानियत (एकेश्वरवाद) का दर्स दिया। इंजील में फ़रमाया गया:

“सुनो, ऐ इस्राईल! ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा एक ही ख़ुदावन्द है।” (मरक़ुस 12:29)

एक और जगह कहा गया कि:

“और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपरऔर सब के मध्य में, और सब में है।” (इफ़िसियों 4:6)

एक और जगह कहा गया कि :

“और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।” (मत्ती : 23: 9)

एक और जगह कहा गया कि :

“क्या हम सभों का एक ही पिता नहीं? क्या एक ही परमेश्वर ने हमको उत्पन्न नहीं किया? हम क्यों एक दूसरे का विश्वासघात करके अपने पूर्वजों की वाचा को तोड़ देते हैं?” (मलाकी 2 : 10)

क़ुरआन मजीद में भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हवाले से तौहीद का पैग़ाम इस तरह बयान किया गया है कि :

“बेशक अल्लाह मेरा रब और तुम्हारा रब है, सो तुम उसकी इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (सूरा मरयम 19:36)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को चाहिये कि वे ख़ुदा के एक होने पर मुत्तफ़िक़ होकर दुनिया में काम करें ताकि इन्सानों पर एक ख़ुदा को मानने के जो असरात पड़ने चाहियें वो नुमायाँ तौर पर नज़र आने लगें और लोग एक ख़ुदा के रंग में रंग कर उसकी इस दुनिया को बेहतरीन और ख़ुशनुमा बनाने में अपना रोल अदा कर सकें।

2. अल्लाह की इबादत और इताअत

दूसरी बात जो हमें क़ुरआन और इंजीले-मुक़द्दस में कॉमन नज़र आती है वो है एक अल्लाह की इबादत और इताअत। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िन्दगी में अल्लाह की इबादत को अहमियत दी और दूसरों को भी इसी की तल्क़ीन की। इंजील में है कि:

“तुम शैतान की इबादत न करो बल्कि ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा की इबादत करो और सिर्फ़ उसी की ख़िदमत (इताअत) करो।” (मती 4:10)

ये तालीम वाज़ेह करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और इबादत को ममनू और हराम क़रार दिया।

सूरा आले-इमरान (3:52) में बिलकुल साफ़ तौर पर लिखा है,

“और मसीह ने कहा, ऐ इस्राईल के बेटो! मेरे रब और अपने रब अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि जो शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा।”

क़ुरआन मजीद में एक और जगह फ़रमाया गया:

“और उन्हें इसके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि वह इख़लास के साथ अल्लाह की इबादत करें।” (सूरा अल-बैय्यिना 98:5)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाई हज़रात को इन तालीमात पर ग़ौर करना चाहिये कि वे एक अल्लाह के अलावा न किसी की इबादत करें और न इताअत।

3. एक अल्लाह की हाकिमियत का तसव्वुर

आसमानी मज़ाहिब का एक ख़ास पैग़ाम ये भी है कि उनमें अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की हाकमियत का तसव्वुर पेश किया गया है। इंजील में है कि :

“सो तुम इस तरह दुआ किया करो कि ‘ऐ हमारे ख़ुदा, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पाक माना जाए। तेरी हाकमियत आए; तेरी मर्ज़ी जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे ज़मीन पर भी हो।'” (मत्ती : 6 : 9, 10)

क़ुरआन मजीद में इस तसव्वुर को इस तरह पेश किया गया है कि हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही का है। वही सबसे बेहतर हाकिम है। क़ुरआन मजीद में ये तसव्वुर इतना आम और वाज़ेह है की शायद ही कोई पेज ऐसा हो जिसमें ख़ुदा की बड़ाई और उसकी ख़ुदाई को तस्लीम करने और अल्लाह की ज़मीन पर उसको क़ायम करने का ज़िक्र न मिलता हो।

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को मिलकर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह का हुक्म लागू हो ताकि समाज में अम्न व सलामती क़ायम हो सके।

4. आख़िरत का तसव्वुर और जवाबदेही

तमाम आसमानी मज़ाहिब की एक और ख़ास बात जो सभी में कॉमन नज़र आती है वो है आख़िरत में अल्लाह के सामने अपनी ज़िन्दगी के बारे में जवाबदेही का तसव्वुर। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों को अल्लाह के आगे जवाबदेही का एहसास दिलाया। इंजील में फरमाया गया:

“इस (क़ियामत के दिन) से हैरत में मत पड़ो, क्योंकि वह वक़्त आएगा कि जितने क़ब्रों में हैं, उसकी पुकार को सुनकर निकलेंगे। (और उस दिन) जिन्होंने भलाई की है वे नई ज़िन्दगी जीने के लिये जी उठेंगे (यानी अपने नेक आमाल की जज़ा के लिये ज़िन्दा हो उठेंगे) और जिन्होंने बुराई की है वे सज़ा पाने के लिये जी उठेंगे।” (योहन्ना 5:28, 29)

इंजीले-मुक़द्दस की इन दोनों आयतों को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि क़ुरआन मजीद में जो जगह-जगह क़ियामत का नक़्शा खींचा गया है (देखें सूरा ज़िलज़ाल) वही नक़्शा यहाँ भी खींचा गया है। इस बात को क़ुरआन में इस तरह भी बयान किया गया है कि :

“जो कोई नेक काम करेगा, चाहे वह मर्द हो या औरत, और वह (अल्लाह और आख़िरत पर) ईमान रखता होगा, तो उसे जन्नत में दाख़िल किया जाएगा। और उनकी ज़रा भी हक़-तलफ़ी न की जाएगी।” (सूरा निसा 4:124) “जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी। (सूरा ज़िलज़ाल : 7, 😎

मुसलमानों और ईसाई भाइयों से इस बात की भरपूर तवक़्क़ो की जा सकती है कि उनकी ज़िन्दगी के मामलात इस तरह हों कि उनके ज़ेहनों में आख़िरत में अल्लाह के सामने जवाबदेही का यक़ीन मज़बूत रहे।

5. इंसानी बराबरी और भाईचारा

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों के दरम्यान मसावात (बराबरी) और महब्बत का पैग़ाम दिया। उन्होंने फ़रमाया:

“तुम अपने पड़ोसी से वैसी ही महब्बत करो जैसी तुम अपने आप से करते हो।” (मत्ती 22:39)

इस सिलसिले में क़ुरआन मजीद की तालीमात भी हमारी रहनुमाई करती हैं और मुसलमानों को इस बात के लिये उभरती हैं कि वो इन्सानों की भलाई और ख़ैरख़ाही के मामले में आगे आएँ। क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया:

“ऐ नबी, हमने जो तुमको भेजा है तो असल में दुनियावालों के हक़ में रहमत बनाकर भेजा है।”

क़ुरआन ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि तुम वो बेहतरीन गरोह हो जिसे दुनियाए-इन्सानियत की भलाई के लिये बरपा किया गया है, तुम्हारा काम ये है कि तुम लोगों को भलाइयों की तरफ़ बुलाओ और बुराइयों से रोको। (सूरा-3 : 110)

आख़िरी बात

क्रिसमस के मौक़े पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तालीमात को याद करना और उनकी रौशनी में तौहीद, इंसानी बराबरी, इख़लास और आख़िरत के तसव्वुर को आम करना न सिर्फ़ हमारी ज़िम्मेदारी है बल्कि यह हमारे और ईसाई भाइयों के दरम्यान इत्तेफ़ाक़ का ज़रिआ भी बन सकता है।

क़ुरआन-मजीद और इंजील-मुक़द्दस दोनों की तालीमात हमें नफ़रत, तफ़रक़े और ग़लतफहमियों को दूर करके महब्बत, भाईचारे और इत्तेफ़ाक़ की राह पर चलने का पैग़ाम देती हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम इन तालीमात को कैसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाते हैं और दुनिया को अमन और महब्बत का गहवारा बनाते हैं।

क़ुरआन-मजीद और इंजीले-मुक़द्दस की कॉमन तालीमात का ख़ुलासा

(आओ ऐसी बात पर मुत्तफ़िक़ हो जाएँ जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान कॉमन हैं)

अल्लाह ने इंसान को पैदा किया और उसे अक़्ल व शुऊर से नवाज़ा। इंसान को बहुत-से मामलों में आज़ादी और इख़्तियार अता किया ताकि अल्लाह ये देख सके कि अपनी मर्ज़ी और आज़ादी के बावजूद इंसान उसकी बन्दगी को क़बूल करता है या नहीं। यह अल्लाह की इंसान पर अज़ीम मेहरबानी है कि उसने सिर्फ़ इख़्तियार की आज़ादी देकर इंसान को छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसकी रहनुमाई के लिये नबी और रसूल भी भेजे। इन नबियों का मक़सद इंसान तक अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाना और अपनी ज़िन्दगी के ज़रिये उस पर अमल करके दिखाना था।

यह सिलसिला जिसे नुबूवत और रिसालत कहा जाता है, इंसानियत के लिये रहनुमाई और रहमत का ज़रिआ रहा है। तमाम आसमानी मज़ाहिब इस बात पर यक़ीन रखते हैं कि अल्लाह ने इंसान को सीधा रास्ता दिखाने के लिये नबी भेजे। यहूदी, ईसाई और मुसलमान इन नबियों के पैग़ाम को मानने वालों में शामिल हैं। मगर फ़र्क यह है कि यहूदियों का सिलसिला-ए-नुबूवत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर, ईसाइयों का हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर और मुसलमानों का हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर खत्म होता है। इन तमाम अंबिया की ख़ास बात ये थी कि ये अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहते और करते थे, वही कहते थे जो उन पर वह्य किया जाता था और उसी के मुताबिक़ अमल करते थे जो उनके ऊपर नाज़िल किया जाता था। इंजील में है कि:

“मैं ख़ुद से कुछ नहीं कर सकता। मैं जैसा सुनता हूँ, वैसा फ़ैसला करता हूँ, और मेरा फ़ैसला इंसाफ़ पर मबनी है, क्योंकि मैं अपनी मर्ज़ी नहीं बल्कि अपने भेजने वाले की मर्ज़ी पूरी करता हूँ।” (योहन्ना 5:30)

क़ुरआन मजीद में भी मुहम्मद (सल्ल०) के हवाले से कहा गया है कि ये नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कहता सिवाय उसके जो कुछ इन पर वह्य किया जाता है। (क़ुरआन सूरा नज्म : 3, 4)

क़ुरआन मजीद जो तालीम मुसलमानों को देता है वो ये है कि नबियों के मक़ाम और मर्तबे में कोई फ़र्क़ न किया जाए, (2 : 285) सिवाय इसके कि अल्लाह ही ने किसी नबी को किसी ऐतिबार से फ़ज़ीलत अता की हो। (2 : 253) इस ऐतिबार से हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फ़ज़ीलत ये है कि आप (सल्ल०) सिलसिलए-नुबूवत की आख़िरी कड़ी हैं। मुसलमानों को इस बात पर एक दर्जा बढ़त हासिल है कि उनका ईमान हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ-साथ हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर भी है। यह इत्तेफ़ाक़ का एक ऐसा अनमोल पहलू है जो मुसलमानों और अहले-किताब के बीच बेहतर ताल्लुक़ात का ज़रिआ बन सकता है।

क़ुरआन और इंजील का कॉमन पैग़ाम

क़ुरआन मजीद हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुई आख़िरी किताब है। ये न सिर्फ़ पिछली आसमानी किताबों की तस्दीक़ करती है बल्कि उनके पैग़ाम का ख़ुलासा भी पेश करती है। ये अहले-किताब को बार-बार दावत देती है कि वे उन कॉमन बातों पर मुत्तफ़िक़ होकर साथ में आएँ जो सभी आसमानी किताबों में मौजूद हैं। क़ुरआन मजीद में फरमाया गया:

“आओ हम और तुम उन बातों पर इत्तेफ़ाक़ कर लें जो हमारे और तुम्हारे दरम्यान समान हैं। यानी हम सिर्फ़ अल्लाह की इबादत करें और किसी को उसका शरीक न ठहराएँ।” (सूरा आले-इमरान 3:64)

इंजील (जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई) और क़ुरआन मजीद के मुताले से कई ऐसी बातें सामने आती हैं जो दोनों में कॉमन हैं। इनमें से कुछ सबसे अहम तालीमात का ज़िक्र क्रिसमस के मौक़े की मुनासिबत से यहाँ किया जा रहा है, ताकि मुसलामानों और ईसाई भाइयों के दरम्यान मुवाफ़िक़त की राहें हमवार हो सकें।

1. तौहीद: एक ख़ुदा का तसव्वुर

यूँ तो तौहीद तमाम आसमानी मज़ाहिब की बुनियाद है। लेकिन इस्लाम और ईसाइयत इस मामले में नुमायाँ हैसियत रखते हैं। इंजील का मुताला करने से मालूम होता है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने हमेशा अल्लाह की वहदानियत (एकेश्वरवाद) का दर्स दिया। इंजील में फ़रमाया गया:

“सुनो, ऐ इस्राईल! ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा एक ही ख़ुदावन्द है।” (मरक़ुस 12:29)

एक और जगह कहा गया कि:

“और सब का एक ही परमेश्वर और पिता है, जो सब के ऊपरऔर सब के मध्य में, और सब में है।” (इफ़िसियों 4:6)

एक और जगह कहा गया कि :

“और पृथ्वी पर किसी को अपना पिता न कहना, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।” (मत्ती : 23: 9)

एक और जगह कहा गया कि :

“क्या हम सभों का एक ही पिता नहीं? क्या एक ही परमेश्वर ने हमको उत्पन्न नहीं किया? हम क्यों एक दूसरे का विश्वासघात करके अपने पूर्वजों की वाचा को तोड़ देते हैं?” (मलाकी 2 : 10)

क़ुरआन मजीद में भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के हवाले से तौहीद का पैग़ाम इस तरह बयान किया गया है कि :

“बेशक अल्लाह मेरा रब और तुम्हारा रब है, सो तुम उसकी इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (सूरा मरयम 19:36)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को चाहिये कि वे ख़ुदा के एक होने पर मुत्तफ़िक़ होकर दुनिया में काम करें ताकि इन्सानों पर एक ख़ुदा को मानने के जो असरात पड़ने चाहियें वो नुमायाँ तौर पर नज़र आने लगें और लोग एक ख़ुदा के रंग में रंग कर उसकी इस दुनिया को बेहतरीन और ख़ुशनुमा बनाने में अपना रोल अदा कर सकें।

2. अल्लाह की इबादत और इताअत

दूसरी बात जो हमें क़ुरआन और इंजीले-मुक़द्दस में कॉमन नज़र आती है वो है एक अल्लाह की इबादत और इताअत। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपनी ज़िन्दगी में अल्लाह की इबादत को अहमियत दी और दूसरों को भी इसी की तल्क़ीन की। इंजील में है कि:

“तुम शैतान की इबादत न करो बल्कि ख़ुदावन्द अपने ख़ुदा की इबादत करो और सिर्फ़ उसी की ख़िदमत (इताअत) करो।” (मती 4:10)

ये तालीम वाज़ेह करती है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और इबादत को ममनू और हराम क़रार दिया।

सूरा आले-इमरान (3:52) में बिलकुल साफ़ तौर पर लिखा है,

“और मसीह ने कहा, ऐ इस्राईल के बेटो! मेरे रब और अपने रब अल्लाह की इबादत करो, क्योंकि जो शिर्क करेगा अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा।”

क़ुरआन मजीद में एक और जगह फ़रमाया गया:

“और उन्हें इसके सिवा कोई हुक्म नहीं दिया गया कि वह इख़लास के साथ अल्लाह की इबादत करें।” (सूरा अल-बैय्यिना 98:5)

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाई हज़रात को इन तालीमात पर ग़ौर करना चाहिये कि वे एक अल्लाह के अलावा न किसी की इबादत करें और न इताअत।

3. एक अल्लाह की हाकिमियत का तसव्वुर

आसमानी मज़ाहिब का एक ख़ास पैग़ाम ये भी है कि उनमें अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की हाकमियत का तसव्वुर पेश किया गया है। इंजील में है कि :

“सो तुम इस तरह दुआ किया करो कि ‘ऐ हमारे ख़ुदा, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पाक माना जाए। तेरी हाकमियत आए; तेरी मर्ज़ी जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे ज़मीन पर भी हो।'” (मत्ती : 6 : 9, 10)

क़ुरआन मजीद में इस तसव्वुर को इस तरह पेश किया गया है कि हुक्म सिर्फ़ अल्लाह ही का है। वही सबसे बेहतर हाकिम है। क़ुरआन मजीद में ये तसव्वुर इतना आम और वाज़ेह है की शायद ही कोई पेज ऐसा हो जिसमें ख़ुदा की बड़ाई और उसकी ख़ुदाई को तस्लीम करने और अल्लाह की ज़मीन पर उसको क़ायम करने का ज़िक्र न मिलता हो।

लिहाज़ा मुसलमानों और ईसाइयों को मिलकर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह का हुक्म लागू हो ताकि समाज में अम्न व सलामती क़ायम हो सके।

4. आख़िरत का तसव्वुर और जवाबदेही

तमाम आसमानी मज़ाहिब की एक और ख़ास बात जो सभी में कॉमन नज़र आती है वो है आख़िरत में अल्लाह के सामने अपनी ज़िन्दगी के बारे में जवाबदेही का तसव्वुर। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों को अल्लाह के आगे जवाबदेही का एहसास दिलाया। इंजील में फरमाया गया:

“इस (क़ियामत के दिन) से हैरत में मत पड़ो, क्योंकि वह वक़्त आएगा कि जितने क़ब्रों में हैं, उसकी पुकार को सुनकर निकलेंगे। (और उस दिन) जिन्होंने भलाई की है वे नई ज़िन्दगी जीने के लिये जी उठेंगे (यानी अपने नेक आमाल की जज़ा के लिये ज़िन्दा हो उठेंगे) और जिन्होंने बुराई की है वे सज़ा पाने के लिये जी उठेंगे।” (योहन्ना 5:28, 29)

इंजीले-मुक़द्दस की इन दोनों आयतों को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि क़ुरआन मजीद में जो जगह-जगह क़ियामत का नक़्शा खींचा गया है (देखें सूरा ज़िलज़ाल) वही नक़्शा यहाँ भी खींचा गया है। इस बात को क़ुरआन में इस तरह भी बयान किया गया है कि :

“जो कोई नेक काम करेगा, चाहे वह मर्द हो या औरत, और वह (अल्लाह और आख़िरत पर) ईमान रखता होगा, तो उसे जन्नत में दाख़िल किया जाएगा। और उनकी ज़रा भी हक़-तलफ़ी न की जाएगी।” (सूरा निसा 4:124) “जिसने ज़र्रा बराबर नेकी की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी, और जिसने ज़र्रा बराबर बुराई की होगी वो भी उसको दिखा दी जाएगी। (सूरा ज़िलज़ाल : 7, 😎

मुसलमानों और ईसाई भाइयों से इस बात की भरपूर तवक़्क़ो की जा सकती है कि उनकी ज़िन्दगी के मामलात इस तरह हों कि उनके ज़ेहनों में आख़िरत में अल्लाह के सामने जवाबदेही का यक़ीन मज़बूत रहे।

5. इंसानी बराबरी और भाईचारा

हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने इंसानों के दरम्यान मसावात (बराबरी) और महब्बत का पैग़ाम दिया। उन्होंने फ़रमाया:

“तुम अपने पड़ोसी से वैसी ही महब्बत करो जैसी तुम अपने आप से करते हो।” (मत्ती 22:39)

इस सिलसिले में क़ुरआन मजीद की तालीमात भी हमारी रहनुमाई करती हैं और मुसलमानों को इस बात के लिये उभरती हैं कि वो इन्सानों की भलाई और ख़ैरख़ाही के मामले में आगे आएँ। क़ुरआन में अल्लाह ने फ़रमाया:

“ऐ नबी, हमने जो तुमको भेजा है तो असल में दुनियावालों के हक़ में रहमत बनाकर भेजा है।”

क़ुरआन ने मुसलमानों को हुक्म दिया कि तुम वो बेहतरीन गरोह हो जिसे दुनियाए-इन्सानियत की भलाई के लिये बरपा किया गया है, तुम्हारा काम ये है कि तुम लोगों को भलाइयों की तरफ़ बुलाओ और बुराइयों से रोको। (सूरा-3 : 110)

आख़िरी बात

क्रिसमस के मौक़े पर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तालीमात को याद करना और उनकी रौशनी में तौहीद, इंसानी बराबरी, इख़लास और आख़िरत के तसव्वुर को आम करना न सिर्फ़ हमारी ज़िम्मेदारी है बल्कि यह हमारे और ईसाई भाइयों के दरम्यान इत्तेफ़ाक़ का ज़रिआ भी बन सकता है।

क़ुरआन-मजीद और इंजील-मुक़द्दस दोनों की तालीमात हमें नफ़रत, तफ़रक़े और ग़लतफहमियों को दूर करके महब्बत, भाईचारे और इत्तेफ़ाक़ की राह पर चलने का पैग़ाम देती हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम इन तालीमात को कैसे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाते हैं और दुनिया को अमन और महब्बत का गहवारा बनाते हैं।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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