Kirdar ki khushbu ko phailney sey roka nahi ja sakta

Kirdar ki khushbu ko phailney sey roka nahi ja sakta

किरदार की ख़ुशबू को फैलने से रोका नहीं जा सकता

—   —   —

रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उसवा (नमूनाए-ज़िन्दगी) हमें ये बताता है कि लोग शिर्क की गन्दगी में लिप्त थे, ज़ुल्म व बरबरियत का चारों तरफ़ बाज़ार गर्म था लेकिन आपने उन्ही के दरम्यान रहकर सब्र और हिकमत के साथ लोगों के दिलों में ईमान (अम्न) का बीज बोया और उसे अपने अख़लाक़-व-किरदार से सींचा। जब-जब झाड़-झंकाड़ उस पौधे को दबाने की कोशिश करते तब-तब हुस्ने-अख़ालाक़ का खाद देकर लोगों के दिलों में उपजे अम्न के उस पौधे को बाक़ी रखने की जिद्दोजुहद करते। इस तरह देखते ही देखते जब उस उजड्ड मुआशरे में अम्न-व-सलामती (इस्लाम) की खेती लहलहाने लगी तो उस खेती को उजाड़ने के दर पे जो लोग हुए उस वक़्त रसूलुल्लाह (सल्ल०) के अम्न-पसन्द और बा-किरदार जाँ-निसार साथियों ने इन्तिहाई ख़ैर-ख़ाहाना जज़्बे के साथ पुरज़ोर दिफ़ा किया। इस दिफ़ा में ताक़त का इस्तेमाल ज़रूर था लेकिन किसी से ज़ाती इन्तिक़ाम लेना मक़सूद हरगिज़ नहीं था, अम्न व सलामती के ग़लबे के लिये बाज़ू में ज़ोर और आवाज़ में बुलन्दी ज़रूर थी लेकिन किसी की तज़लील और तौहीन हरगिज़ मक़सूद नहीं थी, बल्कि दिल में एक दर्द था कि काश ये बात को समझ लें। और इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन ऐसा आया कि सख़्त से सख़्त दुश्मन को भी बात समझ में आई, चाहे वो अबू-जहल के घरवाले हों या ताइफ़ के मग़रूर सरदार, अब्दुल्लाह-बिन-सलाम जैसे पाकीज़ा नुफ़ूस हों या अबू-सूफ़ियान जैसे अड़ियल सरदार, इन सबका रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़रिए से मक़ाम बुलन्द हुआ। फिर ये भी कि जिनको समझना ही नहीं था वो या तो मग़लूब और ख़ामोश होकर रहे या अम्न-व-सलामती के रास्ते से उनको बज़ोर हटा दिया गया।

हमें उस पाक सीरत से यही पैग़ाम मिलता है कि हमारे दिलों में पूरी इन्सानियत की ख़ैरख़ाही का जज़्बा ही ठाठें मार रहा हो। हमारा दिल हर क़िस्म के ज़ाती इन्तिक़ामी जज़्बे से ख़ाली हो। पूरी इन्सानियत की भलाई हमारे पेशे-नज़र हो। यक़ीन जानिये अब रहती दुनिया तक इस जज़्बे के अमीन सिर्फ़ हम ही हैं। अगर हमारे दिलों में भी नफ़रत हो, ज़ाती इन्तिक़ाम का जज़्बा हो, किसी की तज़लील और तौहीन हमारे पेशे-नज़र हो तो फिर दुनियाए-इन्सानियत अम्न-व-सलामती की आख़िरी किरण से भी मायूस हो जाएगी।

इसलिये मेरे भाइयो ख़ैरख़ाही के जज़्बे से सरशार होकर, इस्लाम का वो तआरुफ़ पेश करो जिससे लोगों को यक़ीन हो जाए कि इन्सानियत के दर्द का दरमाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम है। बल्कि मैं तो कहता हूँ कि किसी को जा जाकर और बुला बुलाकर इस्लाम का तआरुफ़ कराने की ज़रूरत ही नहीं है, अगर हम ख़ुद इस्लाम के उस साँचे में ढल जाएँ जो साँचा अल्लाह ने रसूलुल्लाह के उसवे और आख़िरी किताब क़ुरआन की शक्ल में हमारे सामने क़ियामत तक के लिये महफ़ूज़ कर दिया है, तो तआरुफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा। अगर हम ख़ुद इस्लाम के साँचे में ढल जाएँ अपने समाज को क़ुरआन के साँचे में ढालने की कोशिश करें तो यक़ीन जानिये पूरे मुआशरे में हमारे किरदार की ख़ुशबू को फैलने से कोई रोक नहीं पाएगा। यक़ीन जानिये मुसलमान ही वो क़ौम है जो पूरी इन्सानियत को राहे-नजात दिखा सकती है क्योंकि इसी के पास अल्लाह का वो आख़िरी हिदायतनामा है जिसके मुताबिक़ पूरे मुआशरे की तक़दीर को बदला जा सकता है। लेकिन इसके लिये उसी तरह बहुत कुछ सहना पड़ेगा जिस तरह रसूलुल्लाह ने सहा था, हर आनेवाले पत्थर का जवाब बेहतरीन भलाई से देना होगा जिसका हुक्म हमें ख़ुद अल्लाह ने दिया है।

The life example of the Prophet Muhammad ﷺ teaches us that when people were drowned in the filth of polytheism, and oppression and brutality were widespread —
He ﷺ stayed among them and, with patience and wisdom, sowed the seeds of faith and peace in their hearts and nurtured those seeds through his noble character and conduct.

Whenever the thorns of ignorance and injustice tried to suffocate that tender plant,
He ﷺ would revive it with the nourishment of good manners and mercy.

Gradually, in that wild and savage society, the field of peace and submission (Islam) began to bloom.

Then came those who sought to destroy this field, but the peace-loving, principled, and devoted companions of the Prophet ﷺ stood up with sincere hearts to defend it.

Yes, strength was used in that defense,
but never with the intention of personal revenge.
Their arms were strong and voices firm,
but humiliation or insult was never the goal.
There was always a deep ache in the heart, a hope —
“If only they understood…”

And indeed, a day came when even the harshest of enemies came to understand —
whether it was the household of Abu Jahl, the arrogant chiefs of Ta’if,
pure souls like Abdullah ibn Salam, or unyielding leaders like Abu Sufyan —
their hearts were elevated through the Messenger of Allah ﷺ.

As for those who refused to understand, they were either subdued into silence,
or forcibly removed from the path of peace.

The Prophet’s ﷺ life gives us this timeless message:
Our hearts should overflow with goodwill for all of humanity.
Our souls should be free from personal revenge or hatred.
The welfare of humanity should be our ultimate concern.

Believe me — until the end of time,
We Muslims are the only bearers of this sacred responsibility.

If our hearts, too, become filled with hatred,
If we are driven by revenge and the desire to humiliate others,
Then humanity will lose its final hope for peace.

So, O my brothers!
With hearts filled with compassion,
present Islam in such a way that people are convinced that
Islam alone is the cure for the pains of humanity.

In fact, I say:
There is no need to go out and promote Islam forcefully.
If we ourselves mould our lives according to the true spirit of Islam,
as preserved in the life of the Prophet ﷺ and the Qur’an,
Then Islam will introduce itself.

If we live by the Qur’an,
and strive to reshape our society in the Qur’anic mold,
Then surely —
No one will be able to stop the fragrance of our character from spreading across the world.

Truly, Muslims are the only people capable of guiding humanity toward salvation,
because it is they who possess the final guidance from Allah — the Qur’an,
through which the destiny of any society can be transformed.

But for this,
we will have to endure just as the Prophet ﷺ endured.
We will have to respond to every stone with beauty and goodness,
just as Allah Himself has commanded us to do.

رسول اللہ ﷺ کی سیرتِ طیبہ ہمیں یہ سبق دیتی ہے کہ جب لوگ شرک کی گندگی میں لت پت تھے، ظلم و بربریت کا بازار گرم تھا،
تب آپ ﷺ نے انہی کے درمیان صبر اور حکمت کے ساتھ ایمان اور امن کا بیج لوگوں کے دلوں میں بویا،
اور اپنے اخلاق و کردار سے اس کی آبیاری فرمائی۔

جب جب جھاڑ جھنکار اس پودے کو دبانے کی کوشش کرتے،
تب تب حسنِ اخلاق کی کھاد دے کر آپ ﷺ اس پودے کو زندہ رکھتے۔

یہی مسلسل جدوجہد تھی کہ دیکھتے ہی دیکھتے اس اجڈ اور بگڑے ہوئے معاشرے میں امن و سلامتی (اسلام) کی کھیتی لہلہانے لگی۔

پھر جب اس کھیتی کو اجاڑنے والے سامنے آئے،
تو رسول اللہ ﷺ کے امن پسند، باکردار اور جاں نثار صحابہؓ نے انتہائی خیرخواہانہ جذبے کے ساتھ بھرپور دفاع کیا۔

اس دفاع میں قوت کا استعمال ضرور تھا،
لیکن کسی سے ذاتی انتقام لینا مقصد ہرگز نہیں تھا۔
امن کے غلبے کے لیے بازو میں زور اور آواز میں بلندی تھی،
مگر کسی کی تذلیل یا توہین ہرگز مقصود نہ تھی۔
بلکہ دل میں ایک درد تھا کہ کاش وہ لوگ بات کو سمجھ لیں۔

اور پھر ایسا بھی ہوا کہ سخت ترین دشمن بھی بات کو سمجھ گئے —
خواہ وہ ابوجہل کا گھرانہ ہو یا طائف کے متکبر سردار،
عبداللہ بن سلامؓ جیسے پاکیزہ نفوس ہوں یا ابوسفیانؓ جیسے ضدی سردار،
سب کا مقام رسول اللہ ﷺ کے ذریعے بلند ہوا۔

اور جو لوگ سمجھنا ہی نہ چاہتے تھے،
وہ یا تو مغلوب ہو کر خاموش ہو گئے یا امن کے راستے سے زور کے ساتھ ہٹا دیے گئے۔

ہمیں رسول اللہ ﷺ کی پاک سیرت سے یہی پیغام ملتا ہے کہ:
ہمارے دلوں میں پوری انسانیت کی خیرخواہی کا جذبہ موجزن ہو۔
ہمارا دل ہر قسم کے ذاتی انتقام کے جذبے سے پاک ہو۔
انسانیت کی بھلائی ہمارا نصب العین ہو۔

یقین جانیے! اب قیامت تک اس جذبے کے امین صرف ہم مسلمان ہی ہیں۔

اگر ہمارے دلوں میں بھی نفرت ہو، انتقامی سوچ ہو، یا کسی کی تذلیل ہمارے پیشِ نظر ہو،
تو دنیا امن کی آخری کرن سے بھی مایوس ہو جائے گی۔

لہٰذا میرے بھائیو!
خیرخواہی کے جذبے سے سرشار ہو کر اسلام کا وہ تعارف پیش کرو
جس سے لوگوں کو یقین ہو جائے کہ
انسانیت کے ہر درد کا علاج صرف اور صرف اسلام ہے۔

بلکہ میں تو کہتا ہوں کہ کسی کو جا جا کر اسلام کا تعارف کرانے کی ضرورت ہی نہیں،
اگر ہم خود اسلام کے اُس سانچے میں ڈھل جائیں
جو اللہ نے رسول اللہ ﷺ کی سیرت اور قرآن کی صورت میں ہمارے لیے قیامت تک محفوظ رکھا ہے،
تو تعارف خود بخود ہو جائے گا۔

اگر ہم خود اسلام کا پیکر بن جائیں اور
اپنے معاشرے کو قرآن کے سانچے میں ڈھالنے کی کوشش کریں
تو یقین جانیے!
ہمارے کردار کی خوشبو کو معاشرے میں پھیلنے سے کوئی نہیں روک سکے گا۔

یقین رکھیے!
مسلمان ہی وہ قوم ہے جو پوری انسانیت کو نجات کا راستہ دکھا سکتی ہے،
کیونکہ اسی کے پاس اللہ کی آخری ہدایت نامہ — قرآن ہے،
جس کے مطابق معاشرے کی تقدیر بدلی جا سکتی ہے۔

مگر اس کے لیے ہمیں ویسے ہی صبر، ایثار اور قربانی سے گزرنا ہوگا
جیسے رسول اللہ ﷺ گزرے۔
ہر آنے والے پتھر کا جواب بہترین بھلائی سے دینا ہوگا،
جس کا حکم ہمیں خود اللہ تعالیٰ نے دیا ہے۔

Hindi

किरदार की ख़ुशबू को फैलने से रोका नहीं जा सकता

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रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उसवा (नमूनाए-ज़िन्दगी) हमें ये बताता है कि लोग शिर्क की गन्दगी में लिप्त थे, ज़ुल्म व बरबरियत का चारों तरफ़ बाज़ार गर्म था लेकिन आपने उन्ही के दरम्यान रहकर सब्र और हिकमत के साथ लोगों के दिलों में ईमान (अम्न) का बीज बोया और उसे अपने अख़लाक़-व-किरदार से सींचा। जब-जब झाड़-झंकाड़ उस पौधे को दबाने की कोशिश करते तब-तब हुस्ने-अख़ालाक़ का खाद देकर लोगों के दिलों में उपजे अम्न के उस पौधे को बाक़ी रखने की जिद्दोजुहद करते। इस तरह देखते ही देखते जब उस उजड्ड मुआशरे में अम्न-व-सलामती (इस्लाम) की खेती लहलहाने लगी तो उस खेती को उजाड़ने के दर पे जो लोग हुए उस वक़्त रसूलुल्लाह (सल्ल०) के अम्न-पसन्द और बा-किरदार जाँ-निसार साथियों ने इन्तिहाई ख़ैर-ख़ाहाना जज़्बे के साथ पुरज़ोर दिफ़ा किया। इस दिफ़ा में ताक़त का इस्तेमाल ज़रूर था लेकिन किसी से ज़ाती इन्तिक़ाम लेना मक़सूद हरगिज़ नहीं था, अम्न व सलामती के ग़लबे के लिये बाज़ू में ज़ोर और आवाज़ में बुलन्दी ज़रूर थी लेकिन किसी की तज़लील और तौहीन हरगिज़ मक़सूद नहीं थी, बल्कि दिल में एक दर्द था कि काश ये बात को समझ लें। और इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन ऐसा आया कि सख़्त से सख़्त दुश्मन को भी बात समझ में आई, चाहे वो अबू-जहल के घरवाले हों या ताइफ़ के मग़रूर सरदार, अब्दुल्लाह-बिन-सलाम जैसे पाकीज़ा नुफ़ूस हों या अबू-सूफ़ियान जैसे अड़ियल सरदार, इन सबका रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़रिए से मक़ाम बुलन्द हुआ। फिर ये भी कि जिनको समझना ही नहीं था वो या तो मग़लूब और ख़ामोश होकर रहे या अम्न-व-सलामती के रास्ते से उनको बज़ोर हटा दिया गया।

हमें उस पाक सीरत से यही पैग़ाम मिलता है कि हमारे दिलों में पूरी इन्सानियत की ख़ैरख़ाही का जज़्बा ही ठाठें मार रहा हो। हमारा दिल हर क़िस्म के ज़ाती इन्तिक़ामी जज़्बे से ख़ाली हो। पूरी इन्सानियत की भलाई हमारे पेशे-नज़र हो। यक़ीन जानिये अब रहती दुनिया तक इस जज़्बे के अमीन सिर्फ़ हम ही हैं। अगर हमारे दिलों में भी नफ़रत हो, ज़ाती इन्तिक़ाम का जज़्बा हो, किसी की तज़लील और तौहीन हमारे पेशे-नज़र हो तो फिर दुनियाए-इन्सानियत अम्न-व-सलामती की आख़िरी किरण से भी मायूस हो जाएगी।

इसलिये मेरे भाइयो ख़ैरख़ाही के जज़्बे से सरशार होकर, इस्लाम का वो तआरुफ़ पेश करो जिससे लोगों को यक़ीन हो जाए कि इन्सानियत के दर्द का दरमाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम है। बल्कि मैं तो कहता हूँ कि किसी को जा जाकर और बुला बुलाकर इस्लाम का तआरुफ़ कराने की ज़रूरत ही नहीं है, अगर हम ख़ुद इस्लाम के उस साँचे में ढल जाएँ जो साँचा अल्लाह ने रसूलुल्लाह के उसवे और आख़िरी किताब क़ुरआन की शक्ल में हमारे सामने क़ियामत तक के लिये महफ़ूज़ कर दिया है, तो तआरुफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा। अगर हम ख़ुद इस्लाम के साँचे में ढल जाएँ अपने समाज को क़ुरआन के साँचे में ढालने की कोशिश करें तो यक़ीन जानिये पूरे मुआशरे में हमारे किरदार की ख़ुशबू को फैलने से कोई रोक नहीं पाएगा। यक़ीन जानिये मुसलमान ही वो क़ौम है जो पूरी इन्सानियत को राहे-नजात दिखा सकती है क्योंकि इसी के पास अल्लाह का वो आख़िरी हिदायतनामा है जिसके मुताबिक़ पूरे मुआशरे की तक़दीर को बदला जा सकता है। लेकिन इसके लिये उसी तरह बहुत कुछ सहना पड़ेगा जिस तरह रसूलुल्लाह ने सहा था, हर आनेवाले पत्थर का जवाब बेहतरीन भलाई से देना होगा जिसका हुक्म हमें ख़ुद अल्लाह ने दिया है।

The life example of the Prophet Muhammad ﷺ teaches us that when people were drowned in the filth of polytheism, and oppression and brutality were widespread —
He ﷺ stayed among them and, with patience and wisdom, sowed the seeds of faith and peace in their hearts and nurtured those seeds through his noble character and conduct.

Whenever the thorns of ignorance and injustice tried to suffocate that tender plant,
He ﷺ would revive it with the nourishment of good manners and mercy.

Gradually, in that wild and savage society, the field of peace and submission (Islam) began to bloom.

Then came those who sought to destroy this field, but the peace-loving, principled, and devoted companions of the Prophet ﷺ stood up with sincere hearts to defend it.

Yes, strength was used in that defense,
but never with the intention of personal revenge.
Their arms were strong and voices firm,
but humiliation or insult was never the goal.
There was always a deep ache in the heart, a hope —
“If only they understood…”

And indeed, a day came when even the harshest of enemies came to understand —
whether it was the household of Abu Jahl, the arrogant chiefs of Ta’if,
pure souls like Abdullah ibn Salam, or unyielding leaders like Abu Sufyan —
their hearts were elevated through the Messenger of Allah ﷺ.

As for those who refused to understand, they were either subdued into silence,
or forcibly removed from the path of peace.

The Prophet’s ﷺ life gives us this timeless message:
Our hearts should overflow with goodwill for all of humanity.
Our souls should be free from personal revenge or hatred.
The welfare of humanity should be our ultimate concern.

Believe me — until the end of time,
We Muslims are the only bearers of this sacred responsibility.

If our hearts, too, become filled with hatred,
If we are driven by revenge and the desire to humiliate others,
Then humanity will lose its final hope for peace.

So, O my brothers!
With hearts filled with compassion,
present Islam in such a way that people are convinced that
Islam alone is the cure for the pains of humanity.

In fact, I say:
There is no need to go out and promote Islam forcefully.
If we ourselves mould our lives according to the true spirit of Islam,
as preserved in the life of the Prophet ﷺ and the Qur’an,
Then Islam will introduce itself.

If we live by the Qur’an,
and strive to reshape our society in the Qur’anic mold,
Then surely —
No one will be able to stop the fragrance of our character from spreading across the world.

Truly, Muslims are the only people capable of guiding humanity toward salvation,
because it is they who possess the final guidance from Allah — the Qur’an,
through which the destiny of any society can be transformed.

But for this,
we will have to endure just as the Prophet ﷺ endured.
We will have to respond to every stone with beauty and goodness,
just as Allah Himself has commanded us to do.

رسول اللہ ﷺ کی سیرتِ طیبہ ہمیں یہ سبق دیتی ہے کہ جب لوگ شرک کی گندگی میں لت پت تھے، ظلم و بربریت کا بازار گرم تھا،
تب آپ ﷺ نے انہی کے درمیان صبر اور حکمت کے ساتھ ایمان اور امن کا بیج لوگوں کے دلوں میں بویا،
اور اپنے اخلاق و کردار سے اس کی آبیاری فرمائی۔

جب جب جھاڑ جھنکار اس پودے کو دبانے کی کوشش کرتے،
تب تب حسنِ اخلاق کی کھاد دے کر آپ ﷺ اس پودے کو زندہ رکھتے۔

یہی مسلسل جدوجہد تھی کہ دیکھتے ہی دیکھتے اس اجڈ اور بگڑے ہوئے معاشرے میں امن و سلامتی (اسلام) کی کھیتی لہلہانے لگی۔

پھر جب اس کھیتی کو اجاڑنے والے سامنے آئے،
تو رسول اللہ ﷺ کے امن پسند، باکردار اور جاں نثار صحابہؓ نے انتہائی خیرخواہانہ جذبے کے ساتھ بھرپور دفاع کیا۔

اس دفاع میں قوت کا استعمال ضرور تھا،
لیکن کسی سے ذاتی انتقام لینا مقصد ہرگز نہیں تھا۔
امن کے غلبے کے لیے بازو میں زور اور آواز میں بلندی تھی،
مگر کسی کی تذلیل یا توہین ہرگز مقصود نہ تھی۔
بلکہ دل میں ایک درد تھا کہ کاش وہ لوگ بات کو سمجھ لیں۔

اور پھر ایسا بھی ہوا کہ سخت ترین دشمن بھی بات کو سمجھ گئے —
خواہ وہ ابوجہل کا گھرانہ ہو یا طائف کے متکبر سردار،
عبداللہ بن سلامؓ جیسے پاکیزہ نفوس ہوں یا ابوسفیانؓ جیسے ضدی سردار،
سب کا مقام رسول اللہ ﷺ کے ذریعے بلند ہوا۔

اور جو لوگ سمجھنا ہی نہ چاہتے تھے،
وہ یا تو مغلوب ہو کر خاموش ہو گئے یا امن کے راستے سے زور کے ساتھ ہٹا دیے گئے۔

ہمیں رسول اللہ ﷺ کی پاک سیرت سے یہی پیغام ملتا ہے کہ:
ہمارے دلوں میں پوری انسانیت کی خیرخواہی کا جذبہ موجزن ہو۔
ہمارا دل ہر قسم کے ذاتی انتقام کے جذبے سے پاک ہو۔
انسانیت کی بھلائی ہمارا نصب العین ہو۔

یقین جانیے! اب قیامت تک اس جذبے کے امین صرف ہم مسلمان ہی ہیں۔

اگر ہمارے دلوں میں بھی نفرت ہو، انتقامی سوچ ہو، یا کسی کی تذلیل ہمارے پیشِ نظر ہو،
تو دنیا امن کی آخری کرن سے بھی مایوس ہو جائے گی۔

لہٰذا میرے بھائیو!
خیرخواہی کے جذبے سے سرشار ہو کر اسلام کا وہ تعارف پیش کرو
جس سے لوگوں کو یقین ہو جائے کہ
انسانیت کے ہر درد کا علاج صرف اور صرف اسلام ہے۔

بلکہ میں تو کہتا ہوں کہ کسی کو جا جا کر اسلام کا تعارف کرانے کی ضرورت ہی نہیں،
اگر ہم خود اسلام کے اُس سانچے میں ڈھل جائیں
جو اللہ نے رسول اللہ ﷺ کی سیرت اور قرآن کی صورت میں ہمارے لیے قیامت تک محفوظ رکھا ہے،
تو تعارف خود بخود ہو جائے گا۔

اگر ہم خود اسلام کا پیکر بن جائیں اور
اپنے معاشرے کو قرآن کے سانچے میں ڈھالنے کی کوشش کریں
تو یقین جانیے!
ہمارے کردار کی خوشبو کو معاشرے میں پھیلنے سے کوئی نہیں روک سکے گا۔

یقین رکھیے!
مسلمان ہی وہ قوم ہے جو پوری انسانیت کو نجات کا راستہ دکھا سکتی ہے،
کیونکہ اسی کے پاس اللہ کی آخری ہدایت نامہ — قرآن ہے،
جس کے مطابق معاشرے کی تقدیر بدلی جا سکتی ہے۔

مگر اس کے لیے ہمیں ویسے ہی صبر، ایثار اور قربانی سے گزرنا ہوگا
جیسے رسول اللہ ﷺ گزرے۔
ہر آنے والے پتھر کا جواب بہترین بھلائی سے دینا ہوگا،
جس کا حکم ہمیں خود اللہ تعالیٰ نے دیا ہے۔

किरदार की ख़ुशबू को फैलने से रोका नहीं जा सकता

—   —   —

रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उसवा (नमूनाए-ज़िन्दगी) हमें ये बताता है कि लोग शिर्क की गन्दगी में लिप्त थे, ज़ुल्म व बरबरियत का चारों तरफ़ बाज़ार गर्म था लेकिन आपने उन्ही के दरम्यान रहकर सब्र और हिकमत के साथ लोगों के दिलों में ईमान (अम्न) का बीज बोया और उसे अपने अख़लाक़-व-किरदार से सींचा। जब-जब झाड़-झंकाड़ उस पौधे को दबाने की कोशिश करते तब-तब हुस्ने-अख़ालाक़ का खाद देकर लोगों के दिलों में उपजे अम्न के उस पौधे को बाक़ी रखने की जिद्दोजुहद करते। इस तरह देखते ही देखते जब उस उजड्ड मुआशरे में अम्न-व-सलामती (इस्लाम) की खेती लहलहाने लगी तो उस खेती को उजाड़ने के दर पे जो लोग हुए उस वक़्त रसूलुल्लाह (सल्ल०) के अम्न-पसन्द और बा-किरदार जाँ-निसार साथियों ने इन्तिहाई ख़ैर-ख़ाहाना जज़्बे के साथ पुरज़ोर दिफ़ा किया। इस दिफ़ा में ताक़त का इस्तेमाल ज़रूर था लेकिन किसी से ज़ाती इन्तिक़ाम लेना मक़सूद हरगिज़ नहीं था, अम्न व सलामती के ग़लबे के लिये बाज़ू में ज़ोर और आवाज़ में बुलन्दी ज़रूर थी लेकिन किसी की तज़लील और तौहीन हरगिज़ मक़सूद नहीं थी, बल्कि दिल में एक दर्द था कि काश ये बात को समझ लें। और इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन ऐसा आया कि सख़्त से सख़्त दुश्मन को भी बात समझ में आई, चाहे वो अबू-जहल के घरवाले हों या ताइफ़ के मग़रूर सरदार, अब्दुल्लाह-बिन-सलाम जैसे पाकीज़ा नुफ़ूस हों या अबू-सूफ़ियान जैसे अड़ियल सरदार, इन सबका रसूलुल्लाह (सल्ल०) के ज़रिए से मक़ाम बुलन्द हुआ। फिर ये भी कि जिनको समझना ही नहीं था वो या तो मग़लूब और ख़ामोश होकर रहे या अम्न-व-सलामती के रास्ते से उनको बज़ोर हटा दिया गया।

हमें उस पाक सीरत से यही पैग़ाम मिलता है कि हमारे दिलों में पूरी इन्सानियत की ख़ैरख़ाही का जज़्बा ही ठाठें मार रहा हो। हमारा दिल हर क़िस्म के ज़ाती इन्तिक़ामी जज़्बे से ख़ाली हो। पूरी इन्सानियत की भलाई हमारे पेशे-नज़र हो। यक़ीन जानिये अब रहती दुनिया तक इस जज़्बे के अमीन सिर्फ़ हम ही हैं। अगर हमारे दिलों में भी नफ़रत हो, ज़ाती इन्तिक़ाम का जज़्बा हो, किसी की तज़लील और तौहीन हमारे पेशे-नज़र हो तो फिर दुनियाए-इन्सानियत अम्न-व-सलामती की आख़िरी किरण से भी मायूस हो जाएगी।

इसलिये मेरे भाइयो ख़ैरख़ाही के जज़्बे से सरशार होकर, इस्लाम का वो तआरुफ़ पेश करो जिससे लोगों को यक़ीन हो जाए कि इन्सानियत के दर्द का दरमाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लाम है। बल्कि मैं तो कहता हूँ कि किसी को जा जाकर और बुला बुलाकर इस्लाम का तआरुफ़ कराने की ज़रूरत ही नहीं है, अगर हम ख़ुद इस्लाम के उस साँचे में ढल जाएँ जो साँचा अल्लाह ने रसूलुल्लाह के उसवे और आख़िरी किताब क़ुरआन की शक्ल में हमारे सामने क़ियामत तक के लिये महफ़ूज़ कर दिया है, तो तआरुफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगा। अगर हम ख़ुद इस्लाम के साँचे में ढल जाएँ अपने समाज को क़ुरआन के साँचे में ढालने की कोशिश करें तो यक़ीन जानिये पूरे मुआशरे में हमारे किरदार की ख़ुशबू को फैलने से कोई रोक नहीं पाएगा। यक़ीन जानिये मुसलमान ही वो क़ौम है जो पूरी इन्सानियत को राहे-नजात दिखा सकती है क्योंकि इसी के पास अल्लाह का वो आख़िरी हिदायतनामा है जिसके मुताबिक़ पूरे मुआशरे की तक़दीर को बदला जा सकता है। लेकिन इसके लिये उसी तरह बहुत कुछ सहना पड़ेगा जिस तरह रसूलुल्लाह ने सहा था, हर आनेवाले पत्थर का जवाब बेहतरीन भलाई से देना होगा जिसका हुक्म हमें ख़ुद अल्लाह ने दिया है।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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