घर पर कुछ मेहमान आने वाले थे तो उनकी मेहमान-नवाज़ी में गोश्त की ज़रूरत महसूस हुई। मैं अपने एक क़स्साब दोस्त की दुकान पर गया तो देखा कि दुकान बन्द है। मैंने उनको फ़ोन मिलाया और पूछा कि भाई आपकी दुकान नहीं खुली है, तबीअत वग़ैरा तो ठीक है न? उन्होंने बताया कि भाई अभी तो बक़राईद गुज़री है अभी कैसे दुकान खुलेगी, अभी तो कोई भी गोश्त नहीं ख़रीदेगा।
मैंने कहा भाई ईदे-क़ुरबां को गुज़रे हुए तो 15 दिन बीत चुके हैं।
उन्होंने कहा कि भाई लोग पूरा-पूरा महीना बक़राईद का गोश्त खाते हैं। मैं सर खुजलाता हुआ घर आ गया।
मैं सोच रहा था कि अगर क़ुर्बानी का गोश्त ख़ुद खाने की इजाज़त न होती सारा गोश्त बाँट देने का हुक्म होता तो क्या फिर भी मुसलमान इसी शौक़ के साथ क़ुर्बानियाँ करते?
शायद नहीं!
अगर क़ुर्बानी के गोश्त को खाने की इजाज़त न होती तो यक़ीनन इस इबादत का हश्र भी नमाज़, रोज़े और ज़कात जैसे फ़र्ज़ कामों का सा होता। हर शख़्स यही उज़्र कर देता कि अभी मेरी गुंजाइश नहीं है।
ज़रा सोचिये कि मुसलमान (नमाज़, रोज़ा, ज़कात, विरासत अच्छे अख़लाक़ अपनाने और अद्ल क़ायम करने की जिद्दोजुहद करने जैसे) फ़र्ज़ कामों में कितने कोताह हैं और क़ुर्बानी जैसे (सुन्नत) अमल पर कितनी पाबन्दी से अमल करते हैं!
यक़ीनन हमारी तर्जीहात बदली हुई हैं।
अहम कामों को हमने ग़ैर-अहम या कम अहम बना रखा है; जबकि ग़ैर-अहम या कम अहम कामों को ग़ैर-मामूली अहमियत दे रखी है।
क्या यही अल्लाह से क़ुरबत की निशानी है?
क्या इस तरह मुसलमानों को अल्लाह की ख़ास मदद नसीब हो सकती है?
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