ख़वातीन को जब तक मआशरे की इस्लाह और तामीर में शरीक न किया जाएगा तब तक कोई भी समाज तरक़्क़ी नहीं कर सकता। जाहिलीयत के समाज में पल कर जवान होने वाली मुस्लिम ख़वातीन को इस्लाम की तालीमात और निजी घरेलू ज़िन्दगी के इस्लामी अहकामात से आगाह करना लाज़िमी है और ये काम ख़वातीन ही बेहतरीन तरीक़े से अंजाम दे सकती हैं जिनसे ख़वातीन अपने हर तरह के मामलों पर बात कर सकती हैं। प्यारे नबी (सल्ल०) ने समाज को इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ ढालने के लिए ये ज़िम्मेदारी अपनी पत्नियों (मुसलमानों की माओं) को सौंप दिया था। अगर मर्दों की तालीम व तरबियत का इदारा मस्जिदे-नबवी से मिला हुआ ‘सुफ्फ़ा’ नामी चबूतरा था तो मुस्लिम ख़वातीन की तालीम व तरबियत की दर्सगाह मस्जिदे-नबवी से सटे हुए आप (सल्ल०) की पत्नियों के हुजरे थे। मदीना की औरतों को जब भी कोई मुश्किल पेश आती थी, निजी ज़िन्दगी में ख़ानदानी मामलों में या किसी और मामले के बारे में कोई बात मालूम करनी होती तो वे आप (सल्ल०) की पत्नियों के पास जातीं और उनसे पूछ लिया करतीं और आप (सल्ल०) की पत्नियाँ आप (सल्ल०) से मालूम करके उनकी रहनुमाई कर दिया करतीं। कभी मदीना की ख़वातीन ख़ुद जाकर भी आप (सल्ल०) से सीधे तौर पर सवाल कर लिया करती थीं।
अगर देखा जाए तो आज मुसलमानों में जितनी मज़हबी तंज़ीमें या तहरीकें चल रही हैं उनमें किसी में भी ख़वातीन की तरबियत का वो निज़ाम मौजूद नहीं है जो इस्लाम को मतलूब है। दीनी प्रोग्रामों में ख़्वातीन की शिरकत आज भी महज़ सुनने-सुनाने की हद तक ही है। आज ज़रूरत इस बात की है कि ख़वातीन की इस्लामी तरबियत इस तरह की जाए कि वे दीन की इक़ामत के काम में अपनी ज़िम्मेदारियों को (अपने दायराए-इख़्तियार में) उसी तरह बख़ूबी निभा सकें जिस तरह मर्दों को निभाना है।