इस्लाम के लिए रुकावट की एक वजह हमारी कट्टर और बेरूह धार्मिकता है, जिसे आजकल इस्लाम समझा जा रहा है।
इस बेरूह दीन का पहला बुनियादी नुक़्स यह है कि इसमें इस्लाम के अक़ीदे सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान बनाकर रख दिए गए हैं, हालांकि यह अक़ीदे एक संपूर्ण सामुदायिक और सांस्कृतिक व्यवस्था के आधार हैं। इसी तरह इसकी इबादतें सिर्फ पूजा-पाठ बनाकर रख दी गईं हैं, हालांकि यह उन वैचारिक और नैतिक आधार का निर्माण और विकास करती हैं, जिस पर इस्लाम ने अपनी सामुदायिक व्यवस्था का निर्माण किया है। इस वैचारिक बदलाव का नतीजा यह है कि लोगों की समझ में यह बात नहीं आ पाती है कि आखि़र एक राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को चलाने के लिए इन अक़ीदों और इन इबादतों की ज़रूरत ही क्या है।
दूसरा बुनियादी नुक़्स इस बदली हुई मज़हबियत का यह है कि इसमें इस्लामी शरीयत को मात्र एक शास्त्र बनाकर रख दिया गया है। इसमें सदियों से इज्तिहाद का दरवाज़ा बंद है, जिसकी वजह से इस्लाम एक ज़िंदा तहरीक की बजाए सिर्फ़ गुज़रे हुए ज़माने की यादगार बन कर रह गया है और इस्लाम की तालीम देने वाली दर्सगाहें प्राचीन पुस्तकों की पुस्तकालय में तब्दील हो गईं हैं। ज़ाहिर है कि अजनबी लोग इस चीज़ को देखकर ज़्यादा से ज़्यादा इतिहास-प्रेम की वजह से इसकी तारीफ़ तो कर सकते हैं, लेकिन यह उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती कि वह वर्तमान के उपाय और भविष्य के निर्माण के लिए इससे हिदायत और रहनुमाई हासिल करने की ज़रूरत भी महसूस करेंगे।
तीसरा बुनियादी नुक़्स इसमें यह है कि हिस्सों की नाप-तौल, उनकी ग़ैर-ज़रूरी मात्राओं को तय करना, तक़वा से बढ़कर बाहरी दिखावे पर दीनदारी की बुनियाद रखने की बीमारी इसमें हद से ज़्यादा बढ़ गयी है। ये ग़ैरों को पास क्या लाएगी, उल्टा अपनों के दूर जाने की वजह बन रही है। इस ग़लत मज़हबियत के अलमबरदारों की ज़िन्दगी को देखकर और उनकी बातें सुनकर आदमी सोच में पड़ जाता है कि इन्सान की हमेशा की ज़िन्दगी की क़ामयाबी और नाक़ामयाबी का दारोमदार क्या इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों पर है, जिन पर यह लोग इतना ज़ोर देते हैं।
इस्लाम के रास्ते में यह बहुत बड़ी रुकावट है। मगर यह इस्लाम का क़सूर नहीं है, हमारा क़सूर है। यह हमारा फ़र्ज़ है कि हम अपनी शिक्षा-व्यवस्था को बदल दें, जिसने दीन के तसव्वुर को इतना ग़लत और शरीयत के इल्म को इतना कट्टर बना दिया है। ज़ाहिर है कि एक ज़िंदा तहरीक अपने अक़ीदों को हुक्म देकर मनवा लेने के बल पर तो नहीं चल सकती। हमें इसके अक़ीदों को सार्थक तर्कों के साथ पेश करना होगा, फिर अक़ीदों के साथ इबादतों का, और इबादतों के साथ क़ानून का सम्बन्ध स्पष्ट करना होगा, फिर इन नियम-क़ानूनों को ज़िन्दगी की तमाम समस्याओं का हल साबित करना होगा। तब कहीं जाकर लोग इस निज़ाम को सार्थक व्यवस्था के रूप में समझ सकेंगे। यह काम चूँकि सख़्त मेहनत चाहता है इसलिए इस मेहनत से जी चुराकर लोग अपने बनाए हुए आसान तरीक़ों की तरफ़ दौड़े चले जाते हैं, लेकिन यह नहीं सोचते कि अपने मक़सद तक पहुँचने के लिए रास्ता बनाने की तकलीफ़ हमें उठानी ही पड़ेगी, और अगर हम अपने मक़सद में सच्चे हैं तो हमें इसके लिए तैयार होना चाहिए।