इस्लाम और ग़ैर-इस्लाम

इस्लाम और ग़ैर-इस्लाम

दोस्तो, यूँ तो तमाम मज़ाहिब में अच्छी-अच्छी बातें ही हैं, लेकिन किसी भी मज़हब की असल पहचान उसका अक़ीदा और उसमें पाए जाने इबादत के तौर-तरीक़ों से ही होती है।

इस्लाम का अक़ीदा ये है कि इस कायनात को पैदा करने वाला, चलाने वाला और एक दिन इसे ख़त्म कर देने पर क़ुदरत रखनेवाला एक ही है जिसका नाम अल्लाह है, हालाँकि लोग इसे और भी दूसरे नामों से पुकारते हैं।(17:110)

अल्लाह को एक मानने का ये अक़ीदा सिर्फ़ इतना नहीं है कि उसे एक मान लिया जाए, बल्कि इस मानने पर ही उसकी पूरी ज़िन्दगी का रवैया मुनहसिर (Dependant) है। यानी इन्सान की ज़िन्दगी का रवैया ही ये बताएगा कि क्या वो हक़ीक़त में एक ख़ुदा को मानता है या नहीं?

मसलन अगर वो एक ख़ुदा को मानता है तो ज़िन्दगी में उसका रवैया ये होना चाहिये कि चूँकि तमाम इन्सानों को उसी ने पैदा किया है, तो इस लिहाज़ से इन्सानों और इन्सानों के दरम्यान कोई फ़र्क़ और भेदभाव नहीं है, न रंग और नस्ल की बुनियाद पर, न ज़ात और ब्रादरी की बुनियाद पर; न ज़बान और इलाक़े की बुनियाद पर और न ही मर्द या औरत होने की हैसियत से लिंग (Sex) की बुनियाद पर।

ख़ुदा को एक मान लेने के बाद ये रवैया भी ज़ाहिर होना चाहिये कि अब सिवाए उस एक ख़ुदा के ज़िन्दगी के किसी भी मामले में किसी और की बात न मानी जाए। न अपने मन की ख़ाहिशात की और न बाप-दादा की ख़ाहिशात की; न ख़ानदान में बरसों से चली आ रही रस्मो-रिवाज की और न सामाजिक परम्पराओं की ; न मज़हबी पेशवाओं की और न सियासी रहनुमाओं की। यानी ज़िन्दगी के हर शोबे में हुक्म चले तो सिर्फ़ उसका। (6:57; 12:40,67)
दुनिया के सभी मज़हबों में अपने-अपने अक़ीदे के मुताबिक़ अपने ख़ुदा (बहुत से ख़ुदाओं या एक ख़ुदा का जो भी तसव्वुर वो रखते हैं उन) को ख़ुश करने और उनकी क़ुरबत हासिल करने के लिये इबादत का कोई न कोई तरीक़ा भी पाया जाता है। अक़ीदे ही की तरह इबादात के इन तौर-तरीक़ों ही पर ज़िन्दगी का रवैया भी मुनहसिर (Dependant) है।इस्लाम में इबादात के तौर-तरीक़ों के बग़ौर मुताले से ये बात मालूम होती है कि चूँकि अल्लाह को बन्दों की इबादत की कोई ज़रूरत नहीं है (क़ुरआन 29:6) इसलिए इस्लाम में इबादत (पूजा-उपासना) का जो निज़ाम है वो एक मक़सद रखता है। यानी इस्लाम में इबादात का सारा निज़ाम इन्सान की बलन्दी, उसकी शख़्सियत में इर्तिक़ा (वयक्तित्व के विकास), इन्सानी भाईचारा और समाज में अम्न व अमान के क़ियाम का ज़रिआ है।
इस्लाम में इबादत का असली मक़सद ये है कि इनके ज़रिए जहाँ एक तरफ़ इन्सान का ताल्लुक़ उसके अल्लाह (ख़ालिक़, मालिक व परवरदिगार) से मज़बूत हो जाए, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान का इन्सान से रिश्ता मज़बूत हो जाए। लोग भलाई और ख़ैर के कामों में एक-दूसरे का तआवुन (सहयोग) करें, पूरे समाज में ख़ुदा की मर्ज़ी का डंका बजने लगे ताकि लोग अम्न व सलामती के साथ ज़िन्दगी बसर कर सकें।
1) नमाज़ इन्सान के अन्दर जहाँ एक तरफ़ ख़ुदा की याद पैदा करती है (20:14) और उसे ख़ुदा के क़रीब करती है (96:19) वहीं दूसरी तरफ़ वो इन्सान को बुराइयों और अश्लील कामों से भी रोकती है। (29:45)
जमाअत से नमाज़ का निज़ाम समाज में एक-दूसरे की ख़बरगीरी और नज़्म व डिसिप्लिन सिखाती है।

2) रोज़ा जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर (ख़ुदा का) तक़वा पैदा करता है (2:183) वहीं दूसरी तरफ़ अल्लाह के बन्दों से हमदर्दी व ग़मगुसारी का जज़्बा भी पैदा करता है। (हदीस)
3) ज़कात जहाँ एक तरफ़ इन्सान के दिल के अन्दर माल की महब्बत कम करके ख़ुदा की महब्बत का जज़्बा परवान चढ़ाती है, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान के दिल से बुख़्ल और कंजूसी को निकालकर ख़ुदा के बन्दों पर ख़र्च करने की तरग़ीब देती है। फिर सदक़ात व ख़ैरात के ज़रिए इन्सान इन्सानियत की मैराज (पराकाष्ठा) को पहुँच जाता है।
4) हज जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर ख़ुदा से परवानावार महब्बत की अलामत है वहीं दूसरी तरफ़ इन्सानी मसावात (बराबरी) और भाईचारे की ऐसी आलमगीर तस्वीर पेश करता है, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती।

इन तमाम इबादात के पीछे जो असल मक़सद कारफ़रमा है वो असल में ये है कि एक तरफ़ तो इन्सान का ताल्लुक़ ख़ुदा से मज़बूत हो जाए और दूसरी तरफ़ पूरा समाज अल्लाह की मर्ज़ी के साँचे में ढल जाए, यानी समाज का कोई शोबा ख़ुदा की इताअत से ख़ाली न रहे; चाहे इन्सान की अपनी इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो चाहे इज्तिमाई और समाजी ज़िन्दगी; चाहे इन्सान की मआशी (आर्थिक) ज़िन्दगी हो चाहे सियासी (राजनीतिक) ज़िन्दगी।याद रखें दोस्तो अगर हमारा दीन हमें सिर्फ़ ख़ुदा से क़रीब करने की तरग़ीब देता हो और इन्सानों (चाहे वो दूसरे धर्म के माननेवाले ही क्यों हों) से नफ़रत सिखाता हो वो दीन हमारा अपना घड़ा हुआ दीन ही हो सकता है ख़ुदा का अता किया हुआ दीन तो हरगिज़ नहीं हो सकता।

यक़ीन जानियेगा दोस्तो कि हम इबादात तो कर रहे हों लेकिन उनके मक़ासिद पूरे न कर रहे हों तो अल्लाह की नज़र में हमारी इन इबादात की कोई हैसियत नहीं। इस तरह की सब इबादात मुँह पर मार दी जाएँगी, चाहे रात-रात भर की नमाज़ें हों या दिन भर की भूख-प्यास का रोज़ा। चाहे लाखों रुपये ख़र्च करके हज किया हो या ज़कात अदा की हो और चाहे अल्लाह की राह में जान देकर शहीद का लक़ब ही क्यों न पा लिया हो। क्योंकि इस तरह की सब इबादात बेरूह हैं और बेरूह चीज़ मुर्दा या महज़ एक ढाँचा होती है, जिसकी हक़ीक़त में कोई हैसियत नहीं होती।

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दोस्तो, यूँ तो तमाम मज़ाहिब में अच्छी-अच्छी बातें ही हैं, लेकिन किसी भी मज़हब की असल पहचान उसका अक़ीदा और उसमें पाए जाने इबादत के तौर-तरीक़ों से ही होती है।

इस्लाम का अक़ीदा ये है कि इस कायनात को पैदा करने वाला, चलाने वाला और एक दिन इसे ख़त्म कर देने पर क़ुदरत रखनेवाला एक ही है जिसका नाम अल्लाह है, हालाँकि लोग इसे और भी दूसरे नामों से पुकारते हैं।(17:110)

अल्लाह को एक मानने का ये अक़ीदा सिर्फ़ इतना नहीं है कि उसे एक मान लिया जाए, बल्कि इस मानने पर ही उसकी पूरी ज़िन्दगी का रवैया मुनहसिर (Dependant) है। यानी इन्सान की ज़िन्दगी का रवैया ही ये बताएगा कि क्या वो हक़ीक़त में एक ख़ुदा को मानता है या नहीं?

मसलन अगर वो एक ख़ुदा को मानता है तो ज़िन्दगी में उसका रवैया ये होना चाहिये कि चूँकि तमाम इन्सानों को उसी ने पैदा किया है, तो इस लिहाज़ से इन्सानों और इन्सानों के दरम्यान कोई फ़र्क़ और भेदभाव नहीं है, न रंग और नस्ल की बुनियाद पर, न ज़ात और ब्रादरी की बुनियाद पर; न ज़बान और इलाक़े की बुनियाद पर और न ही मर्द या औरत होने की हैसियत से लिंग (Sex) की बुनियाद पर।

ख़ुदा को एक मान लेने के बाद ये रवैया भी ज़ाहिर होना चाहिये कि अब सिवाए उस एक ख़ुदा के ज़िन्दगी के किसी भी मामले में किसी और की बात न मानी जाए। न अपने मन की ख़ाहिशात की और न बाप-दादा की ख़ाहिशात की; न ख़ानदान में बरसों से चली आ रही रस्मो-रिवाज की और न सामाजिक परम्पराओं की ; न मज़हबी पेशवाओं की और न सियासी रहनुमाओं की। यानी ज़िन्दगी के हर शोबे में हुक्म चले तो सिर्फ़ उसका। (6:57; 12:40,67)
दुनिया के सभी मज़हबों में अपने-अपने अक़ीदे के मुताबिक़ अपने ख़ुदा (बहुत से ख़ुदाओं या एक ख़ुदा का जो भी तसव्वुर वो रखते हैं उन) को ख़ुश करने और उनकी क़ुरबत हासिल करने के लिये इबादत का कोई न कोई तरीक़ा भी पाया जाता है। अक़ीदे ही की तरह इबादात के इन तौर-तरीक़ों ही पर ज़िन्दगी का रवैया भी मुनहसिर (Dependant) है।इस्लाम में इबादात के तौर-तरीक़ों के बग़ौर मुताले से ये बात मालूम होती है कि चूँकि अल्लाह को बन्दों की इबादत की कोई ज़रूरत नहीं है (क़ुरआन 29:6) इसलिए इस्लाम में इबादत (पूजा-उपासना) का जो निज़ाम है वो एक मक़सद रखता है। यानी इस्लाम में इबादात का सारा निज़ाम इन्सान की बलन्दी, उसकी शख़्सियत में इर्तिक़ा (वयक्तित्व के विकास), इन्सानी भाईचारा और समाज में अम्न व अमान के क़ियाम का ज़रिआ है।
इस्लाम में इबादत का असली मक़सद ये है कि इनके ज़रिए जहाँ एक तरफ़ इन्सान का ताल्लुक़ उसके अल्लाह (ख़ालिक़, मालिक व परवरदिगार) से मज़बूत हो जाए, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान का इन्सान से रिश्ता मज़बूत हो जाए। लोग भलाई और ख़ैर के कामों में एक-दूसरे का तआवुन (सहयोग) करें, पूरे समाज में ख़ुदा की मर्ज़ी का डंका बजने लगे ताकि लोग अम्न व सलामती के साथ ज़िन्दगी बसर कर सकें।
1) नमाज़ इन्सान के अन्दर जहाँ एक तरफ़ ख़ुदा की याद पैदा करती है (20:14) और उसे ख़ुदा के क़रीब करती है (96:19) वहीं दूसरी तरफ़ वो इन्सान को बुराइयों और अश्लील कामों से भी रोकती है। (29:45)
जमाअत से नमाज़ का निज़ाम समाज में एक-दूसरे की ख़बरगीरी और नज़्म व डिसिप्लिन सिखाती है।

2) रोज़ा जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर (ख़ुदा का) तक़वा पैदा करता है (2:183) वहीं दूसरी तरफ़ अल्लाह के बन्दों से हमदर्दी व ग़मगुसारी का जज़्बा भी पैदा करता है। (हदीस)
3) ज़कात जहाँ एक तरफ़ इन्सान के दिल के अन्दर माल की महब्बत कम करके ख़ुदा की महब्बत का जज़्बा परवान चढ़ाती है, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान के दिल से बुख़्ल और कंजूसी को निकालकर ख़ुदा के बन्दों पर ख़र्च करने की तरग़ीब देती है। फिर सदक़ात व ख़ैरात के ज़रिए इन्सान इन्सानियत की मैराज (पराकाष्ठा) को पहुँच जाता है।
4) हज जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर ख़ुदा से परवानावार महब्बत की अलामत है वहीं दूसरी तरफ़ इन्सानी मसावात (बराबरी) और भाईचारे की ऐसी आलमगीर तस्वीर पेश करता है, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती।

इन तमाम इबादात के पीछे जो असल मक़सद कारफ़रमा है वो असल में ये है कि एक तरफ़ तो इन्सान का ताल्लुक़ ख़ुदा से मज़बूत हो जाए और दूसरी तरफ़ पूरा समाज अल्लाह की मर्ज़ी के साँचे में ढल जाए, यानी समाज का कोई शोबा ख़ुदा की इताअत से ख़ाली न रहे; चाहे इन्सान की अपनी इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो चाहे इज्तिमाई और समाजी ज़िन्दगी; चाहे इन्सान की मआशी (आर्थिक) ज़िन्दगी हो चाहे सियासी (राजनीतिक) ज़िन्दगी।याद रखें दोस्तो अगर हमारा दीन हमें सिर्फ़ ख़ुदा से क़रीब करने की तरग़ीब देता हो और इन्सानों (चाहे वो दूसरे धर्म के माननेवाले ही क्यों हों) से नफ़रत सिखाता हो वो दीन हमारा अपना घड़ा हुआ दीन ही हो सकता है ख़ुदा का अता किया हुआ दीन तो हरगिज़ नहीं हो सकता।

यक़ीन जानियेगा दोस्तो कि हम इबादात तो कर रहे हों लेकिन उनके मक़ासिद पूरे न कर रहे हों तो अल्लाह की नज़र में हमारी इन इबादात की कोई हैसियत नहीं। इस तरह की सब इबादात मुँह पर मार दी जाएँगी, चाहे रात-रात भर की नमाज़ें हों या दिन भर की भूख-प्यास का रोज़ा। चाहे लाखों रुपये ख़र्च करके हज किया हो या ज़कात अदा की हो और चाहे अल्लाह की राह में जान देकर शहीद का लक़ब ही क्यों न पा लिया हो। क्योंकि इस तरह की सब इबादात बेरूह हैं और बेरूह चीज़ मुर्दा या महज़ एक ढाँचा होती है, जिसकी हक़ीक़त में कोई हैसियत नहीं होती।

दोस्तो, यूँ तो तमाम मज़ाहिब में अच्छी-अच्छी बातें ही हैं, लेकिन किसी भी मज़हब की असल पहचान उसका अक़ीदा और उसमें पाए जाने इबादत के तौर-तरीक़ों से ही होती है।

इस्लाम का अक़ीदा ये है कि इस कायनात को पैदा करने वाला, चलाने वाला और एक दिन इसे ख़त्म कर देने पर क़ुदरत रखनेवाला एक ही है जिसका नाम अल्लाह है, हालाँकि लोग इसे और भी दूसरे नामों से पुकारते हैं।(17:110)

अल्लाह को एक मानने का ये अक़ीदा सिर्फ़ इतना नहीं है कि उसे एक मान लिया जाए, बल्कि इस मानने पर ही उसकी पूरी ज़िन्दगी का रवैया मुनहसिर (Dependant) है। यानी इन्सान की ज़िन्दगी का रवैया ही ये बताएगा कि क्या वो हक़ीक़त में एक ख़ुदा को मानता है या नहीं?

मसलन अगर वो एक ख़ुदा को मानता है तो ज़िन्दगी में उसका रवैया ये होना चाहिये कि चूँकि तमाम इन्सानों को उसी ने पैदा किया है, तो इस लिहाज़ से इन्सानों और इन्सानों के दरम्यान कोई फ़र्क़ और भेदभाव नहीं है, न रंग और नस्ल की बुनियाद पर, न ज़ात और ब्रादरी की बुनियाद पर; न ज़बान और इलाक़े की बुनियाद पर और न ही मर्द या औरत होने की हैसियत से लिंग (Sex) की बुनियाद पर।

ख़ुदा को एक मान लेने के बाद ये रवैया भी ज़ाहिर होना चाहिये कि अब सिवाए उस एक ख़ुदा के ज़िन्दगी के किसी भी मामले में किसी और की बात न मानी जाए। न अपने मन की ख़ाहिशात की और न बाप-दादा की ख़ाहिशात की; न ख़ानदान में बरसों से चली आ रही रस्मो-रिवाज की और न सामाजिक परम्पराओं की ; न मज़हबी पेशवाओं की और न सियासी रहनुमाओं की। यानी ज़िन्दगी के हर शोबे में हुक्म चले तो सिर्फ़ उसका। (6:57; 12:40,67)
दुनिया के सभी मज़हबों में अपने-अपने अक़ीदे के मुताबिक़ अपने ख़ुदा (बहुत से ख़ुदाओं या एक ख़ुदा का जो भी तसव्वुर वो रखते हैं उन) को ख़ुश करने और उनकी क़ुरबत हासिल करने के लिये इबादत का कोई न कोई तरीक़ा भी पाया जाता है। अक़ीदे ही की तरह इबादात के इन तौर-तरीक़ों ही पर ज़िन्दगी का रवैया भी मुनहसिर (Dependant) है।इस्लाम में इबादात के तौर-तरीक़ों के बग़ौर मुताले से ये बात मालूम होती है कि चूँकि अल्लाह को बन्दों की इबादत की कोई ज़रूरत नहीं है (क़ुरआन 29:6) इसलिए इस्लाम में इबादत (पूजा-उपासना) का जो निज़ाम है वो एक मक़सद रखता है। यानी इस्लाम में इबादात का सारा निज़ाम इन्सान की बलन्दी, उसकी शख़्सियत में इर्तिक़ा (वयक्तित्व के विकास), इन्सानी भाईचारा और समाज में अम्न व अमान के क़ियाम का ज़रिआ है।
इस्लाम में इबादत का असली मक़सद ये है कि इनके ज़रिए जहाँ एक तरफ़ इन्सान का ताल्लुक़ उसके अल्लाह (ख़ालिक़, मालिक व परवरदिगार) से मज़बूत हो जाए, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान का इन्सान से रिश्ता मज़बूत हो जाए। लोग भलाई और ख़ैर के कामों में एक-दूसरे का तआवुन (सहयोग) करें, पूरे समाज में ख़ुदा की मर्ज़ी का डंका बजने लगे ताकि लोग अम्न व सलामती के साथ ज़िन्दगी बसर कर सकें।
1) नमाज़ इन्सान के अन्दर जहाँ एक तरफ़ ख़ुदा की याद पैदा करती है (20:14) और उसे ख़ुदा के क़रीब करती है (96:19) वहीं दूसरी तरफ़ वो इन्सान को बुराइयों और अश्लील कामों से भी रोकती है। (29:45)
जमाअत से नमाज़ का निज़ाम समाज में एक-दूसरे की ख़बरगीरी और नज़्म व डिसिप्लिन सिखाती है।

2) रोज़ा जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर (ख़ुदा का) तक़वा पैदा करता है (2:183) वहीं दूसरी तरफ़ अल्लाह के बन्दों से हमदर्दी व ग़मगुसारी का जज़्बा भी पैदा करता है। (हदीस)
3) ज़कात जहाँ एक तरफ़ इन्सान के दिल के अन्दर माल की महब्बत कम करके ख़ुदा की महब्बत का जज़्बा परवान चढ़ाती है, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान के दिल से बुख़्ल और कंजूसी को निकालकर ख़ुदा के बन्दों पर ख़र्च करने की तरग़ीब देती है। फिर सदक़ात व ख़ैरात के ज़रिए इन्सान इन्सानियत की मैराज (पराकाष्ठा) को पहुँच जाता है।
4) हज जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर ख़ुदा से परवानावार महब्बत की अलामत है वहीं दूसरी तरफ़ इन्सानी मसावात (बराबरी) और भाईचारे की ऐसी आलमगीर तस्वीर पेश करता है, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती।

इन तमाम इबादात के पीछे जो असल मक़सद कारफ़रमा है वो असल में ये है कि एक तरफ़ तो इन्सान का ताल्लुक़ ख़ुदा से मज़बूत हो जाए और दूसरी तरफ़ पूरा समाज अल्लाह की मर्ज़ी के साँचे में ढल जाए, यानी समाज का कोई शोबा ख़ुदा की इताअत से ख़ाली न रहे; चाहे इन्सान की अपनी इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो चाहे इज्तिमाई और समाजी ज़िन्दगी; चाहे इन्सान की मआशी (आर्थिक) ज़िन्दगी हो चाहे सियासी (राजनीतिक) ज़िन्दगी।याद रखें दोस्तो अगर हमारा दीन हमें सिर्फ़ ख़ुदा से क़रीब करने की तरग़ीब देता हो और इन्सानों (चाहे वो दूसरे धर्म के माननेवाले ही क्यों हों) से नफ़रत सिखाता हो वो दीन हमारा अपना घड़ा हुआ दीन ही हो सकता है ख़ुदा का अता किया हुआ दीन तो हरगिज़ नहीं हो सकता।

यक़ीन जानियेगा दोस्तो कि हम इबादात तो कर रहे हों लेकिन उनके मक़ासिद पूरे न कर रहे हों तो अल्लाह की नज़र में हमारी इन इबादात की कोई हैसियत नहीं। इस तरह की सब इबादात मुँह पर मार दी जाएँगी, चाहे रात-रात भर की नमाज़ें हों या दिन भर की भूख-प्यास का रोज़ा। चाहे लाखों रुपये ख़र्च करके हज किया हो या ज़कात अदा की हो और चाहे अल्लाह की राह में जान देकर शहीद का लक़ब ही क्यों न पा लिया हो। क्योंकि इस तरह की सब इबादात बेरूह हैं और बेरूह चीज़ मुर्दा या महज़ एक ढाँचा होती है, जिसकी हक़ीक़त में कोई हैसियत नहीं होती।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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