क्या ये कोई सोची-समझी साज़िश है कि मुसलमानों को दिफ़ा (डिफ़ेंस) के कामों में ही लगाए रखो। कोई न कोई इशू ताज़ा रखो ताकि इस क़ौम का कुछ सोचने-समझने वाला तबक़ा मुसलमानों के हुक़ूक़ और तहफ़्फ़ुज़ की आवाज़ उठाने ही में लगा रहे और करने के असल काम से ग़ाफ़िल रहे। पहले किसी नौजवान को ग़ायब कर दिया तो पढ़े-लिखे और समझदार क़िस्म के मुख़्तसर से नौजवान सड़कों पर उतर आए। फिर गौ-रक्षा के नाम पर हत्याएँ होना शुरू हुईं तो यही नौजवान फिर सड़कों पर, कभी तीन तलाक़ का इशू उठा दिया तो वही नौजवान फिर सड़कों पर, बर्मा में मुसलमानों पर ज़ुल्म हुआ तो यही नौजवान फिर सड़कों पर। NRC और CAA का इशू उछाला गया तो वही नौजवान फिर सड़कों पर, कल को कोई और इशू खड़ा कर दिया जाएगा तो यही नौजवान फिर सड़कों पर होंगे। हक़ बात ये है कि इन नौजवानों के जज़्बे और हौसले को सलाम करने को दिल चाहता है।
लेकिन एक हक़ीक़त और भी है जो ज़रा कड़वी है लेकिन चूँकि हक़ीक़त है तो कहनी पड़ती है। वो हक़ीक़त ये है कि तमाम मुसलमानों का इस बात पर यक़ीन है (पुख़्ता है कि नहीं ये तो मैं नहीं कह सकता लेकिन तक़रीरों और किताबों में तो यही है और क़ुरआन भी यही कहता है) कि मुसलमानों (ही के नहीं बल्कि पूरी इन्सानियत) के तमाम मसाएल का हल अल्लाह की किताब (क़ुरआन) को मज़बूती से पकड़ने ही में है। लेकिन इसके बावजूद इस किताब की तरफ़ आने की ज़हमत गवारा नहीं की जा रही है। मसाएल को हल करने के लिए जितनी ज़ोर-शोर के साथ दुनियावी, ख़ुद-साख़्ता और इन्सानी तदबीरों की तरफ़ लोगों को बुलाया जा रहा है उसका एक फ़ीसद ज़ोर भी क़ुरआन की तरफ़ बुलाने और इसके मुताबिक़ अमल करने पर नहीं लगाया जा रहा है।
जो नौजवान इन्सानों (ख़ास तौर से मुसलमानों) के मसाएल को लेकर रात-दिन फ़िक्रमन्द हैं (मैं उनके इस जज़्बे की क़द्र करता हूँ) वो अगर क़ुरआन की तरफ़ बुलाने, इस किताब के साँचे में मुसलमानों के किरदार को ढालने, अल्लाह और रोज़े-आख़िरत पर ईमान मज़बूत करने को दूसरा या तीसरा दर्जा भी देने लगें तो (मैं नहीं कहता बल्कि) अल्लाह का वादा है कि बहुत जल्द हालात का रुख़ बदल जाएगा। लेकिन अफ़सोस! कि कुछ लोग तो उम्मत की हर तरह की फ़िक्र से ख़ाली हैं और कुछ लोगों को उम्मत की इस क़द्र फ़िक्र है कि अल्लाह पर भरोसा कम और मुल्क के कम्युनिस्टों और ख़ुदा-बेज़ारों पर भरोसा ज़्यादा है कि मुसलमानों पर अगर कोई मुसीबत आई तो ये हमारे साथ होंगे। इसलिए वो कोई काम उनको साथ लिये बग़ैर करना ही नहीं चाहते। हालाँकि ये बात भी किसी हक़ीक़त से कम नहीं है कि अगर इन कम्युनिस्ट लोगों के हाथों में ताक़त होती तो मुसलमानों के साथ इनका भी यही रवैया होता जो इस वक़्त दूसरे लोगों का है।
अल्लाह से दुआ है कि हमें हक़ को उसी तरह देखने की तौफ़ीक़ दे जिस तरह कि वो है और उस पर जमा दे और बातिल को भी उसी तरह देखने की तौफ़ीक़ दे जिस तरह कि वो है और उससे बचने की तौफ़ीक़ दे। आमीन या रब्बल-आलमीन
मुहम्मद अली शाह शुऐब